असली सुंदरता: नाप, रंग या सांचे में नहीं, आत्म-स्वीकृति में

True beauty: not in size, color, or shape, but in self-acceptance

कृति आरके जैन

एक लड़की आईने के सामने खड़ी है। समाज कहता है – पतली हो जाओ, गोरी बनो, परफेक्ट बनो। लेकिन वह मुस्कुराती है और कहती है, “मेरा शरीर, मेरे नियम!” यह नारा आज लाखों महिलाओं की आवाज बन चुका है। बॉडी पॉजिटिविटी आंदोलन ने महिलाओं को सिखाया है कि सुंदरता का मतलब सिर्फ एक सांचे में फिट होना नहीं। यह आंदोलन आत्म-सम्मान, स्वीकृति और स्वतंत्रता का प्रतीक है। बॉलीवुड की चकाचौंध से लेकर सोशल मीडिया की दुनिया तक, महिलाएं अब अपने शरीर को शर्म की बजाय गर्व का विषय बना रही हैं। भारत में यह आंदोलन तेजी से फैल रहा है, जहां सदियों से महिलाओं के शरीर पर नियंत्रण की कोशिशें हुई हैं। अब समय आ गया है कि हम इस बदलाव को समझें और अपनाएं।

बॉडी पॉजिटिविटी का मूल अर्थ है हर प्रकार के शरीर को बिना शर्त स्वीकार करना – चाहे वह दुबला हो, स्थूल, गोरा, सांवला या कोई भी आकार-प्रकार। यह आंदोलन 1960 के दशक में अमेरिका में फैट एक्सेप्टेंस मूवमेंट से शुरू हुआ, और सोशल मीडिया ने इसे वैश्विक बनाया। भारत में लंबे समय तक बॉलीवुड और विज्ञापनों ने ‘जीरो फिगर’ को आदर्श बनाया, जिससे अनगिनत महिलाएं बॉडी इमेज इश्यूज और ईटिंग डिसॉर्डर की शिकार हुईं। लेकिन अब महिलाएं कह रही हैं कि उनका शरीर उनका निजी क्षेत्र है, कोई और तय नहीं करेगा कि वह कैसी दिखेंगी। सोशल मीडिया पर प्लस-साइज इन्फ्लुएंसर्स अपनी अनफिल्टर्ड तस्वीरें शेयर कर रही हैं, और लाखों महिलाएं इससे प्रेरित होकर खुद को प्यार करना सीख रही हैं। यह बदलाव सिर्फ दिखावे का नहीं, बल्कि गहरे मानसिक परिवर्तन का है।

भारत में बॉडी पॉजिटिविटी को नई दिशा और मजबूती देने में सोशल मीडिया की भूमिका बेहद अहम रही है। अनेक महिलाएं अपने डिजिटल मंचों पर बिना झिझक अपनी निजी कहानियां साझा कर रही हैं। वे खुलकर बताती हैं कि बचपन में ‘मोटी’ या ‘काली’ जैसे शब्दों से मिले तानों ने उनके मन पर कितने गहरे घाव छोड़े, और उस पीड़ा से निकलकर आत्मविश्वास तक पहुंचना कितना कठिन रहा। इसी ईमानदारी ने लाखों महिलाओं को खुद को स्वीकार करने की हिम्मत दी है। फैशन इंडस्ट्री में भी यह बदलाव साफ दिखाई देता है, जहां अब रैंप पर विविध शरीर आकारों की मौजूदगी बढ़ी है। कपड़ों के बाजार में भी सोच बदली है और विस्तृत साइज विकल्प सामने आ रहे हैं। महिलाएं अब साफ शब्दों में कह रही हैं कि वे अपने शरीर के अनुसार कपड़े चाहती हैं, न कि कपड़ों के अनुसार खुद को बदलना। यही सोच उन्हें मानसिक स्वतंत्रता दे रही है, जहां बॉडी शेमिंग का डर धीरे धीरे कमजोर पड़ रहा है।

‘मेरा शरीर, मेरे नियम’ का नारा केवल वजन या शरीर के आकार तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि यह महिलाओं के समग्र अधिकारों की मुखर अभिव्यक्ति बन चुका है। इसमें अपने कपड़े खुद चुनने की आज़ादी है, अपने शरीर से जुड़े निर्णय स्वयं लेने का साहस है और प्रजनन से जुड़े फैसलों पर अधिकार की स्पष्ट मांग भी शामिल है। भारतीय समाज में, जहां परिवार और रिश्तेदार अक्सर महिलाओं के शरीर पर टिप्पणी करने या उसे नियंत्रित करने का अधिकार अपने हाथ में समझ लेते हैं, यह नारा एक सशक्त प्रतिरोध की तरह उभरता है। महिलाएं अब ऑनलाइन आलोचनाओं और ट्रोलिंग को चुपचाप सहने के बजाय आत्मविश्वास से जवाब दे रही हैं। डिजिटल मंचों पर शरीर के प्राकृतिक पहलुओं को सामान्य बताने की कोशिशें तेज़ हुई हैं। मध्य आयु की महिलाएं भी इस सोच से जुड़ रही हैं, जो लंबे समय तक चुप्पी ओढ़े रहीं। इससे नई पीढ़ी तक यह संदेश पहुंच रहा है कि सुंदरता किसी एक ढांचे में नहीं, बल्कि विविधता में अपनी असली पहचान पाती है।

इस आंदोलन के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। कई बार बॉडी पॉजिटिविटी को व्यावसायिक ब्रांड केवल प्रचार का साधन बना लेते हैं, जहां असली सामाजिक बदलाव पीछे छूट जाता है। कुछ महिलाएं जब अपनी फिटनेस यात्रा शुरू करती हैं, तो उन्हें ही यह कहकर निशाना बनाया जाता है कि वे आंदोलन की भावना के खिलाफ जा रही हैं। भारत में गोरेपन की क्रीमों, स्लिमिंग उत्पादों और डाइट उद्योग का प्रभाव आज भी गहरा और व्यापक है। इसके बावजूद सकारात्मक परिवर्तन इन बाधाओं से कहीं अधिक मजबूत बनकर उभरा है। स्कूलों और कॉलेजों में अब इस विषय पर खुली चर्चाएं होने लगी हैं। माताएं अपनी बेटियों को यह सिखा रही हैं कि हर शरीर अलग, अनोखा और सुंदर होता है। यह आंदोलन नारीवादी सोच का अहम हिस्सा बन चुका है, जहां महिलाएं अपने शरीर की वास्तविक स्वामिनी बन रही हैं। इसका असर उनके करियर, रिश्तों और पूरे जीवन पर सकारात्मक रूप से दिखाई दे रहा है।

बॉडी पॉजिटिविटी को जीवन में अपनाने के लिए बड़े प्रयास नहीं, बल्कि छोटे और सच्चे कदम ही पर्याप्त होते हैं। हर सुबह आईने में खुद को देखकर प्रशंसा करना आत्मस्वीकृति की शुरुआत हो सकती है। सोशल मीडिया पर उन्हीं मंचों से जुड़ना जरूरी है जो सकारात्मक सोच को बढ़ावा देते हैं। व्यायाम को सजा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और खुशी का माध्यम बनाना चाहिए। दोस्तों और परिवार के साथ शरीर को लेकर खुलकर बातचीत करना भी बेहद जरूरी है। भारत में यह आंदोलन अब महानगरों से निकलकर गांवों तक पहुंच चुका है, जहां महिलाएं अपनी पारंपरिक वेशभूषा में भी पूरा आत्मविश्वास महसूस कर रही हैं। विभिन्न अभियानों के माध्यम से यह सोच और मजबूत हो रही है। महिलाएं यह समझने लगी हैं कि उनका शरीर सम्मान और स्नेह का पात्र है, आलोचना का नहीं। यह परिवर्तन समाज को अधिक समावेशी, संवेदनशील और मानवीय बना रहा है।

‘मेरा शरीर, मेरे नियम’ सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि यह एक पूर्ण क्रांति बन चुका है। यह महिलाओं को सदियों से उनके ऊपर थोपे गए शर्म और सामाजिक दबाव से मुक्त कर रहा है। भारतीय समाज में, जहां सौंदर्य के मानक हमेशा सख्त और कठोर रहे हैं, यह आंदोलन अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली साबित हो रहा है। हर महिला को यह याद रखना चाहिए कि वास्तविक सुंदरता बाहरी रूप में नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, आत्म-सम्मान और आत्म-स्वीकृति में निहित होती है। समाज बदल रहा है, लेकिन हमें भी इसमें सक्रिय भूमिका निभानी होगी। अगली बार जब कोई आपके शरीर पर टिप्पणी करे, तो गर्व के साथ कहें – मेरा शरीर, मेरे नियम! यह आंदोलन तब तक चलेगा जब तक हर महिला खुद को पूरी तरह अपनाने और सम्मान देने के लिए स्वतंत्र न हो जाए। इसमें शामिल होकर, खुद से प्रेम करना और दूसरों को प्रेरित करना न केवल व्यक्तिगत सफलता है, बल्कि यह समाज में सकारात्मक बदलाव की भी जीत है।