प्रमोद भार्गव
समाज के विकास में मनुष्य की इच्छा और महत्वाकांक्षा की अहम पृष्ठभूमि रही है।इसी आकांक्षा ने परिवार और समाज की संरचना रेखांकित की।किंतु प्राकृतिक अवयवों के बिना यह संभव नहीं थी।व्यक्ति, परिवार ओर समाज में प्रकृति की आश्चर्यजनक विलक्षणताओं ने संस्कृति को गढ़ा।आरंभिक अवस्था में इस संस्कृति के बहुविध रूप हमें गुफा चित्रों में देखने को मिले।आदिम मानव के रहन-सहन और रीति-रिवाज से जुड़े यही चित्र संस्कृति की स्थापना के प्रस्थान बिंदु मान लिए गए।चंबल अंचल के पहाड़गढ़ की गुफाओं में हजारों साल पुराने ये चित्र इस बात के प्रमाण हैं कि सम्पूर्ण ग्वालियर क्षेत्र में सांस्कृतिक विकास की विरासत अत्यंत प्राचीन है।
ग्वालियर अंचल के चंबल क्षेत्र को शताब्दियों से अभिशप्त भूखंड माना जाता रहा है।लेकिन इसके उज्जवल पक्ष की भी एक रचनात्मक तस्वीर है,जो लेखक-पत्रकारों की दृष्टि से लगभग ओझल रही है।इसी प्रछन्न पहलू को सजग और दृष्टि संपन्न,इस अंचल के ख्यातिलब्ध लेखक-पत्रकार देव श्रीमाली ने अपनी नई पुस्तक “चंबल संस्कृति एवं विरासत”में उभारा है।यही इस पुस्तक की प्रमुख विलक्षणता है।इसलिए यह पुस्तक चंबल की सांस्कृतिक विरासत पर लिखी गई अन्य पुस्तकों से भिन्न है।
इस किताब को पढ़ने पर पता चलता है कि चंबल के दुर्गम भू-भाग, गहरे एवं बेडौल बीहड़ और डकैतों के रोमांचक इतिहास के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि यह एक समृद्ध, बहुरंगी और अद्वितीय संस्कृति की पहचान भी अपने आंगन में समेटे हुए है। बुंदेलखंड, राजस्थान और मध्य भारत की सीमाओं से जुड़ा यह क्षेत्र अनेक सांस्कृतिक परंपराओं, लोकमान्यताओं और जीवन-धाराओं का संगम है। यहाँ की मिट्टी में वीरता, संघर्ष, लोककला, अध्यात्म और लोकगीतों की अनूठी खुशबू रची-बसी है।इस अनमोल विरासत के चिन्ह आदिम युग के शैलचित्रों में दिखाई देने लगते हैं।चंबल की संस्कृति का मूल स्वर कठोर जीवन-स्थितियों में भी मानवीय संवेदनाओं, भाईचारे और लोकविश्वास को संजोए रखता है। यहाँ की लोक धुनें,तानसेन के सुर से फूटती हैं।यहां के पचास हजार से भी अधिक वीर सपूत किसी न किसी सीमा पर तैनात रहते हुए, अपने शौर्य की गाथा लिखते रहे हैं।भारतीय सीमाओं को सुरक्षित बनाए रखने में इनका अमूल्य योगदान है।चंबल के शुक्लपक्ष की यह तस्वीर इस पुस्तक में अभिलेखों सहित रेखांकित है।
चंबल की विरासत में प्राचीन मंदिर, पुरास्थल, लोकनाट्य, चित्रकला, वन्यजीवों की विशिष्टता और नदी सभ्यता की विशेष छाप मिलती है।इस भूमि में चंबल, सिंध,पार्वती और पहुज जैसी नदियों का प्रवाह है।नदी हैं,इसीलिये सांस्कृतिक विरासत है।आधुनिकता के प्रभाव के बावजूद यहाँ की सांस्कृतिक पहचान आज भी उतनी ही जीवंत है, जितनी सदियों पहले थी। आतिथ्यपूर्ण जीवनशैली, परंपरागत उत्सव और रीति-रिवाज़ एक ऐसी सांस्कृतिक विरासत गढ़ते हैं, जो पीढ़ियों से चली आ रही लोकचेतना का प्रतीक हैं।इस प्रकार चंबल की संस्कृति और विरासत न केवल इस क्षेत्र की पहचान निर्धारित करती है, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति की विविधता और गहराई को भी समृद्ध बनाती है।यह सब इस पुस्तक में प्रामाणिक रूप में प्रस्तुत है।यहाँ की मिट्टी में संघर्ष, साहस, सरलता और लोकधुनों की मधुर गूँज आज भी जीवंत है।यह सब इस पुस्तक में प्रामाणिक रूप में तेईस अध्यायों में विस्तृत विवरणों के साथ सचित्र प्रस्तुत है।
लेकिन बौद्धिक सोच की विडंबना है कि चंबल की ऐतिहासिक विरासत के शुक्ल पक्ष को किनारे रख इसके डकैत समस्या से जुड़े स्याह पक्ष को ही अब तक पुस्तकों से लेकर फिल्मों तक महिमा मंडित किया जाता रहा है, जबकि चंबल में बहते पानी के प्रवाह ने यहां के उज्ज्वल पक्ष को उजागर कर सुनिश्चित कर दिया है कि दिल्ली का संसद भवन यहीं के मितावली में स्थित चौंसठ योगिनी मंदिर की अनुकृति है।भारत की नाट्य परंपरा का भवभूति द्वारा निर्मित पहला विद्यालय और नाट्यघर आज भी पद्मावती में सिंध नदी के तट पर मौजूद है।पांडवों की मां कुंती इसी चंबल की थीं।केंद्र शासित पहला गणराज्य पद्मावती (वर्तमान पवाया)यहीं था। बावजूद इस क्षेत्र को भय, बंदूक और सामाजिक विषमता के प्रतीक के रूप में आज भी प्रस्तुत किया जाता है। बीहड़ों की भौगोलिक बनावट, सामाजिक असमानताओं और ऐतिहासिक परिस्थितियों ने कुछ समय तक इस क्षेत्र को डकैत गिरोहों की छाया से आच्छादित रखा। जबकि यह समस्या चंबल की सांस्कृतिक और सामाजिक बनावट को समझने का एक महत्वपूर्ण अध्याय हो सकता था, क्योंकि डकैत केवल अपराध का नहीं, बल्कि समय-समय पर उत्पन्न हुई सामाजिक अन्याय, प्रतिशोध और सत्ता-संघर्ष की जटिलता का भी परिणाम थे।फिर भी, चंबल की असली पहचान इन घटनाओं से कहीं आगे है।
आधुनिक सुधारों, विकास कार्यों और सामाजिक चेतना के चलते आज यह क्षेत्र डकैत की छाया से लगभग मुक्त होकर अपनी मूल सांस्कृतिक पहचान की ओर लौट रहा है। उसकी लोकपरंपराएँ, विरासत, स्थल और नदी-संस्कृति पुनः नए रूप में उभर रही हैं।इतिहास परिवर्तन के इस झरोखे का दस्तावेजीकरण है, देव श्रीमाली जी की यह पुस्तक ,जो चंबल की बदली तस्वीर को समग्रता में पेश करती है।यह किताब उन लोगों के लिए भी प्रेरक है,जो सांस्कृतिक विरासत के पुरास्थलों और रीति रिवाजों को नितांत पारंपरिक रूप में देखते चले आ रहे हैं।इसमें राज सत्ताएं हैं तो दुर्ग और गढ़ियां भी हैं।विलुप्त होती सहारिया जनजाति है, तो दूसरी तरफ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम और आध्यात्मिक केंद्र हैं।साहित्य और पत्रकारिता से जुड़े लोगों की की लंबी श्रृंखला है।इनका क्षेत्रीय और राष्ट्रीय योगदान रेखांकित है।अतएव यह किताब चंबल की किसी एक पहलू का दर्शन मात्र न होकर क्षेत्र की समग्र विरासत का ऐतिहासिक चित्रण और सारगर्भित मूल्यांकन भी प्रस्तुत करती है।पुस्तक की भाषा बोधगम्य होने के साथ प्रांजल है।
पुस्तक का नाम:चंबल संस्कृति एवं विरासत /लेखक:देव श्रीमाली/प्रकाशक:राष्ट्रीय पुस्तक न्यास,नेहरू भवन,वसंत कुंज, नाई दिल्ली/कीमत:230 रुपए।





