भूख से मुक्ति का राष्ट्रीय संकल्प है अटल कैंटीन योजना

Atal Canteen Scheme is a national pledge to get rid of hunger

ललित गर्ग

भूख केवल एक शारीरिक पीड़ा नहीं है, वह सामाजिक असंतुलन, मानसिक कुंठा और नैतिक विचलन की जननी भी है। इतिहास साक्षी है कि जब पेट खाली होता है, तो विचार उग्र हो जाते हैं, व्यवस्था के प्रति विश्वास डगमगाने लगता है और विद्रोह की भावना पनपती है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे पहली जिम्मेदारी यह होती है कि उसका कोई भी नागरिक भूखा न रहे। इसी बुनियादी और मानवीय सोच के साथ दिल्ली की रेखा गुप्ता सरकार द्वारा शुरू की गई रुपये 5 में भोजन उपलब्ध कराने की ‘अटल कैंटीन योजना’ निस्संदेह एक दूरदर्शी, करुणामय, मानवीय और जनकल्याणकारी पहल है। इस योजना का उद्देश्य अत्यंत स्पष्ट और मानवीय है कि दिल्ली में कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए। राजधानी जैसे महानगर में, जहाँ एक ओर समृद्धि और चमक-दमक है, वहीं दूसरी ओर असंगठित श्रमिक, दिहाड़ी मजदूर, रिक्शाचालक, ठेला-पटरी वाले, घरेलू कामगार और बेघर लोग भी बड़ी संख्या में रहते हैं। इनके लिए दो वक्त का सम्मानजनक और पौष्टिक भोजन आज भी एक चुनौती बना हुआ है। अटल कैंटीन योजना इन्हीं वर्गों के लिए जीवनरेखा बनकर सामने आई है, जो ‘संकल्प से सिद्धि’ के लक्ष्य को दर्शाता है और इसे देश में भोजन सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

इस योजना का शुभारंभ भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की 101वीं जयंती पर किया जाना केवल एक औपचारिक तिथि चयन नहीं, बल्कि एक वैचारिक निरंतरता का प्रतीक है। अटलजी का संपूर्ण राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन अंत्योदय अर्थात समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान के विचार से प्रेरित रहा। वर्ष 2000 में शुरू की गई अंत्योदय अन्न योजना ने यह स्पष्ट कर दिया था कि अटलजी के लिए गरीब केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि नीति का केंद्र था। उस योजना के अंतर्गत अत्यंत गरीब परिवारों को रियायती दरों पर अनाज उपलब्ध कराया गया, जिससे करोड़ों लोगों को भुखमरी से राहत मिली। अटल कैंटीन योजना उसी सोच का आधुनिक शहरी संस्करण है, जहाँ अनाज के बजाय तैयार, पौष्टिक और स्वच्छ भोजन सीधे थाली में परोसा जा रहा है। यह नीतिगत निरंतरता इस बात का प्रमाण है कि सुशासन केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि संवेदनशील क्रियान्वयन से साकार होता है। अटल कैंटीन में भोजन की कीमत रुपये 5 रखी गई है, जबकि सरकार प्रत्येक थाली पर रुपये 25 की सब्सिडी दे रही है। यह मूल्य निर्धारण अत्यंत सोच-समझकर किया गया है। भोजन पूरी तरह मुफ्त न देकर एक न्यूनतम राशि तय करने का उद्देश्य यह है कि भोजन की कद्र बनी रहे और लाभार्थी इसे भीख नहीं, बल्कि अधिकार और सम्मान के रूप में ग्रहण करे। यह नीति सामाजिक मनोविज्ञान को समझने का उत्कृष्ट उदाहरण है।

रेखा गुप्ता सरकार ने सीमित संसाधनों के बावजूद जनकल्याण को प्राथमिकता देते हुए जिस संवेदनशीलता, निर्णय क्षमता और प्रशासनिक दक्षता का परिचय दिया है, वह उनके प्रभावी राजनीतिक नेतृत्व को रेखांकित करता है; अटल कैंटीन जैसी योजनाएँ बताती हैं कि वे शासन को सत्ता नहीं, सेवा का माध्यम मानती हैं। किंतु सर्दी के इस कठोर मौसम में दिल्ली की सड़कों, फुटपाथों और फ्लाईओवरों के नीचे ठिठुरती रातें काटने को विवश गरीब और बेघर लोगों के लिए केवल मौसमी रैन-बसेरे पर्याप्त नहीं हैं, आवश्यकता एक स्थायी, समन्वित और मानवीय शीत-रक्षा योजना की है, जिसमें अस्थायी आश्रय के साथ गरम वस्त्र, पौष्टिक भोजन, प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा और पुनर्वास की स्पष्ट व्यवस्था हो, ताकि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी की सड़कों पर कोई भी व्यक्ति सर्द रात में बेसहारा और अदृश्य न रहे; ऐसा कदम न केवल प्रशासनिक संवेदनशीलता का प्रमाण होगा, बल्कि लोकतंत्र की नैतिक जिम्मेदारी का भी सशक्त निर्वाह बनेगा। महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि उपलब्ध कराया जा रहा भोजन पोषण मानकों के अनुरूप है। भोजन की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए एफएसएसएआई मानकों का पालन किया जाता है, जिसमें प्रति थाली 700-800 कैलोरी और 20-25 ग्राम प्रोटीन होता है। डिजिटल टोकन, सीसीटीवी और निगरानी के साथ पारदर्शिता सुनिश्चित की जाती है। प्रत्येक कैंटीन प्रतिदिन लगभग 1000 लोगों को भोजन परोसने की क्षमता रखी है, और 100 कैंटीन खोलने का लक्ष्य है। दाल, सब्जी, रोटी/चावल जैसे संतुलित आहार पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जिसमें आरओ वाटर एवं अचार आदि भी परोसा जा रहा है ताकि यह योजना केवल पेट भरने तक सीमित न रहकर स्वास्थ्य सुधार में भी योगदान दे सके।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार द्वारा गरीबों और निम्न आय वर्ग के लिए मुफ्त एवं रियायती अनाज योजनाएँ लगातार संचालित की जा रही हैं। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना जैसी पहलों ने संकट काल में करोड़ों परिवारों को राहत दी है। इन योजनाओं का मूल दर्शन यही है कि भूखा नागरिक न आत्मनिर्भर बन सकता है और न ही राष्ट्रनिर्माण में भागीदार। रेखा गुप्ता सरकार की अटल कैंटीन योजना इन राष्ट्रीय प्रयासों के साथ सामंजस्य स्थापित करती है। यह दर्शाती है कि केंद्र और राज्य, यदि समान मानवीय दृष्टि से काम करें, तो सामाजिक समस्याओं का समाधान अधिक प्रभावी ढंग से संभव है। समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र दोनों ही इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि भुखमरी और अपराध के बीच गहरा संबंध होता है। जब व्यक्ति की मूल आवश्यकताएँ पूरी नहीं होतीं, तो वह व्यवस्था के प्रति विद्रोही दृष्टिकोण अपनाने लगता है। यही कारण है कि अनेक महान नेताओं ने यह कहा है कि गरीब को पहले रोटी दो, उपदेश बाद में।

भूखे को खिलाना किसी प्रकार का राजनीतिक प्रलोभन नहीं है। यह सच्ची राष्ट्रभक्ति, मानवीय कर्तव्य और सामाजिक सुरक्षा का आधार है। अटल कैंटीन जैसी योजनाएँ अपराध को नियंत्रित करने, सामाजिक असंतोष को कम करने और लोकतंत्र में विश्वास को मजबूत करने का कार्य करती हैं। हालाँकि, किसी भी जनकल्याणकारी योजना की सफलता केवल उसकी घोषणा से नहीं, बल्कि उसके पारदर्शी, निगरानी और ईमानदार क्रियान्वयन से तय होती है। यह अत्यंत आवश्यक है कि अटल कैंटीन योजना को भ्रष्टाचार, अपव्यय और लापरवाही से पूरी तरह मुक्त रखा जाए। खाद्य सामग्री की खरीद, भोजन की गुणवत्ता, लाभार्थियों की पहुँच, वित्तीय प्रबंधन और संचालन व्यवस्था-हर स्तर पर सख्त निगरानी, नियमित ऑडिट और सामाजिक सहभागिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। यदि इस योजना में किसी भी प्रकार का भ्रष्टाचार प्रवेश करता है, तो वह न केवल सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग होगा, बल्कि गरीब के विश्वास के साथ भी विश्वासघात होगा।

दिल्ली की यह पहल देश के अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन सकती है। शहरीकरण के इस दौर में लगभग हर बड़े शहर में श्रमिक और निम्न आय वर्ग भोजन संकट से जूझ रहा है। यदि प्रत्येक राज्य अपनी परिस्थितियों के अनुसार ऐसी योजनाएँ विकसित करे, तो देश से भुखमरी को काफी हद तक समाप्त किया जा सकता है। यह समझना आवश्यक है कि ऐसी योजनाएँ खर्च नहीं, बल्कि सामाजिक निवेश हैं। यह निवेश समाज को स्थिरता, शांति और विश्वास लौटाता है। अंततः रुपये 5 की थाली केवल भोजन नहीं है। यह करुणा, गरिमा और सामाजिक न्याय की अभिव्यक्ति है। यह अटल बिहारी वाजपेयी की अंत्योदय सोच और नरेन्द्र मोदी के वर्तमान नेतृत्व की मानवीय दृष्टि का सार्थक संगम है। रेखा गुप्ता सरकार की यह पहल यह संदेश देती है कि सुशासन वही है, जो सबसे पहले सबसे कमजोर व्यक्ति तक पहुँचे। यदि इस योजना को पारदर्शिता, ईमानदारी और निरंतरता के साथ आगे बढ़ाया गया, तो यह न केवल दिल्ली, बल्कि पूरे देश के लिए भूख-मुक्त भारत की दिशा में एक मजबूत कदम सिद्ध होगी।