भारत का युवा देश होना एक ऐतिहासिक अवसर है, लेकिन यह अपने आप में गारंटी नहीं। यह अवसर तभी वरदान बनेगा, जब शिक्षा, कौशल और रोजगार एक ही धागे में बंधेंगे। राष्ट्रीय युवा दिवस केवल प्रेरक भाषणों का दिन न होकर आत्मनिरीक्षण का दिन बने—यह समय की मांग है। क्योंकि सवाल आज भी वही है-हम सबसे बड़ा युवा देश जरूर हैं, लेकिन क्या हमारे युवाओं के पास वह दिशा है, जो उन्हें और देश, दोनों को आगे ले जा सके?
राजेश जैन
भारत आज गर्व से कहता है कि वह दुनिया का सबसे बड़ा युवा देश है। औसत उम्र करीब 28 साल और आबादी का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा 35 साल से कम उम्र का-यह आंकड़ा किसी भी देश को आर्थिक, सामाजिक और वैश्विक नेतृत्व की कतार में खड़ा कर सकता है। 12 जनवरी, राष्ट्रीय युवा दिवस, इसी संभावना की याद दिलाता है। आज आत्ममंथन का अवसर है कि क्या हम सच में अपने युवाओं को वह दिशा दे पाए हैं, जिसकी कल्पना स्वामी विवेकानंद ने की थी।
अवसर या हताशा: युवा किस मोड़ पर
सरकार का दावा है कि भारत का युवा आज पहले से ज्यादा अवसरों के बीच है। डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया: नीतियों की कोई कमी नहीं। आंकड़ों के मुताबिक स्टार्टअप्स की संख्या बढ़ी है, यूनिकॉर्न बने हैं और नई तकनीकों में युवाओं की भागीदारी भी बढ़ी है। लेकिन दूसरी तरफ, यही युवा सोशल मीडिया पर रोज यह सवाल भी पूछ रहा है-पढ़ाई के बाद नौकरी कहां है? एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो लगातार प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में अपनी जवानी झोंक रहा है। सरकारी नौकरी की एक सीट के लिए लाखों आवेदन, सालों का इंतजार और बार-बार टूटती उम्मीद : यह आज के युवा की रोजमर्रा की कहानी बन चुकी है। अवसर मौजूद हैं, लेकिन उन तक पहुंच सभी के लिए समान नहीं है। यही असमानता हताशा की जमीन तैयार करती है।
शिक्षा की चुनौतियां: डिग्री है, दिशा नहीं
भारत में आज डिग्रियों की बाढ़ है। हर साल लाखों इंजीनियर, मैनेजमेंट ग्रेजुएट, आर्ट्स और साइंस के छात्र कॉलेजों से निकलते हैं। लेकिन उद्योग जगत बार-बार यह कहता है कि उन्हें जॉब रेडी युवा नहीं मिलते। यहीं से शुरू होती है असली समस्या-शिक्षा और रोजगार के बीच बढ़ती खाई। सरकार कहती है कि नई शिक्षा नीति के जरिए इस खाई को पाटने की कोशिश की जा रही है। मल्टी-डिसिप्लिनरी एजुकेशन, स्किल आधारित कोर्स और डिजिटल लर्निंग को भविष्य का रास्ता बताया जा रहा है। लेकिन जब तक सरकारी स्कूलों और कॉलेजों की बुनियादी गुणवत्ता नहीं सुधरेगी, तब तक नीति कागजों से आगे नहीं बढ़ेगी। ग्रामीण और कस्बाई भारत का युवा आज भी संसाधनों की कमी से जूझ रहा है, जहां ऑनलाइन क्लास की बात करना अक्सर मजाक जैसा लगता है।
डिग्रीधारी बेरोजगारी और स्किल गैप की सच्चाई
यह कड़वा सच है कि भारत में बेरोजगारों का बड़ा हिस्सा पढ़ा-लिखा है। डिग्रीधारी बेरोजगारी आज सिर्फ आंकड़ा नहीं, सामाजिक चिंता बन चुकी है। एक ओर कंपनियां कहती हैं कि उन्हें कुशल कर्मचारी नहीं मिल रहे, दूसरी ओर लाखों युवा कहते हैं कि उन्हें काम नहीं मिल रहा। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता है।
सरकार स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम्स का हवाला देती है-आईटीआई, ट्रेनिंग सेंटर, अप्रेंटिसशिप। लेकिन इसका दूसरा पक्ष है कि इन योजनाओं की पहुंच और गुणवत्ता दोनों सीमित हैं। कई प्रशिक्षण सिर्फ प्रमाणपत्र तक सिमट जाते हैं, रोजगार तक नहीं पहुंचते। नतीजा यह कि युवा या तो कम वेतन वाली अस्थायी नौकरी करता है, या फिर प्रतियोगी परीक्षाओं के चक्रव्यूह में फंस जाता है।
स्टार्टअप इंडिया बनाम सरकारी नौकरी की दौड़
आज के युवा के सामने दो रास्ते बताए जाते हैं-जोखिम लो, स्टार्टअप शुरू करो या सुरक्षित भविष्य के लिए सरकारी नौकरी पाओ। सरकार स्टार्टअप संस्कृति को नई क्रांति के रूप में पेश करती है। कुछ युवाओं ने सचमुच कमाल किया भी है। उन्होंने नवाचार किया, रोजगार पैदा किया और दुनिया में भारत की पहचान बनाई।
लेकिन यह भी सच है कि हर युवा स्टार्टअप नहीं खोल सकता। पूंजी, नेटवर्क और असफलता सहने की क्षमता, ये सब हर किसी के पास नहीं होती। इसलिए सरकारी नौकरी आज भी मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग के युवाओं के लिए सबसे सुरक्षित सपना बनी हुई है। इसलिए जब तक निजी क्षेत्र में स्थिर और सम्मानजनक नौकरियां नहीं बढ़ेंगी, तब तक सरकारी नौकरी की यह दौड़ खत्म नहीं होगी।
विवेकानंद का युवा और आज का रील–मोबाइल वाला युवा
अक्सर कहा जाता है कि आज का युवा मोबाइल और रील्स में उलझा हुआ है। इसमें सच्चाई का एक हिस्सा जरूर है, लेकिन पूरी तस्वीर नहीं। यही युवा सोशल मीडिया के जरिए सवाल भी पूछ रहा है, मुद्दों पर बहस भी कर रहा है और अपनी पहचान भी गढ़ रहा है। फर्क बस इतना है कि विवेकानंद का युवा आत्मबल, चरित्र और राष्ट्र निर्माण की बात करता था, जबकि आज का युवा पहले अपने अस्तित्व और रोजगार की लड़ाई लड़ रहा है।
यह कहना आसान है कि युवा भटक गया है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सिस्टम ने उसे सही दिशा दी? अगर शिक्षा रोजगार से जुड़ी होती, अगर मेहनत का फल समय पर मिलता, तो शायद यही युवा रील्स से ज्यादा रिसर्च और नवाचार में दिखता।
कुल मिलकर, युवा राजनीतिक नारों से ज्यादा समाधान चाहता है। सरकार उपलब्धियों की बात करती है, विपक्ष विफलताओं की। लेकिन युवा के लिए सवाल आज का है, कल नहीं। उसे आज नौकरी चाहिए, आज सम्मान चाहिए, आज भविष्य की स्पष्टता चाहिए। राष्ट्रीय युवा दिवस पर सबसे बड़ा संदेश यही होना चाहिए कि युवा को सिर्फ डेमोग्राफिक डिविडेंड न माना जाए, बल्कि डिसीजन मेकर बनाया जाए। जब तक नीतियों का असर जमीन पर नहीं दिखेगा, तब तक भाषण और आंकड़े युवाओं की बेचैनी कम नहीं कर पाएंगे।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। )





