औपनिवेशिक सोच से मुक्ति, विकास की पटरी पर भारतीय रेल

Freedom from colonial thinking, Indian Railways on the path of development

“प्रधानमंत्री नरेन्द्रमोदी का मिशन,केन्द्रीय रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव का विज़न —नए भारत की विकास यात्रा की स्वर्णिम गाथा*

विनोद कुमार सिंह

भारतीय रेल केवल एक परिवहन व्यवस्था नहीं है।यह इस देश की जीवनरेखा है—एक ऐसा विशाल तंत्र,जिसमें भारत की आत्मा धड़कती है।लोहे की पटरियों पर दौड़ती ट्रेनें सिर्फ यात्रियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं पहुँचातीं,बल्कि वे भारत की सामाजिक,आर्थिक और सांस्कृतिक चेतना को भी निरंतर गतिमान रखती हैं।किसान का पसीना,मज़दूर की थकान,विद्यार्थी के सपने,सैनिक का संकल्प और माँ की ममता—सब एक साथ भारतीय रेल में यात्रा करते हैं।करोड़ों यात्री प्रतिदिन भारतीय रेल पर केवल गंतव्य तक पहुँचने का भरोसा नहीं करते,बल्कि सम्मान, सुरक्षा और संवेदनशील व्यवहार की अपेक्षा भी रखते हैं।ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि आज़ादी के पचहत्तर वर्ष बाद भी यदि भारतीय रेल के भीतर औपनिवेशिक सोच के अवशेष दिखाई देते हैं,तो यह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं,बल्कि राष्ट्रीय चेतना के लिए भी गहन आत्ममंथन का विषय बन जाता है। यही पीड़ा व चिंता केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के उस स्पष्ट कथन में अभिव्यक्त होती है,जब वे कहते हैं कि “भारतीय रेल को औपनिवेशिक मानसिकता से पूरी तरह मुक्त करना समय की माँग है।” यह वाक्य किसी औपचारिक भाषण का हिस्सा नहीं, बल्कि दशकों की जड़ता को तोड़ने का वैचारिक उद्घोष है।इसका प्रमाण हमें विगत दिनों नई दिल्ली के यशोभूमि में आयोजित रेलवे कर्मी वार्षिक सम्मान समारोह में रेल मंत्री के उद्गारों में एक सच्चे रेल सेवक का भाव स्पष्ट झलकता था।उनका प्रश्न सीधा और मार्मिक था—जो रेल भारत की आत्मा है,वह अब भी उस सोच के बोझ तले क्यों दबी रहे,जो कभी शासक और शासित के बीच गहरी खाई बनाकर रखती थी?

ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय रेल का निर्माण भारतीयों की सुविधा के लिए नहीं हुआ था।उसका मूल उद्देश्य था—औपनिवेशिक शासन को मज़बूत करना,प्राकृतिक संसाधनों की लूट को आसान बनाना और सैनिक आवाजाही को नियंत्रित करना।उस दौर में रेलयात्री एक नागरिक नहीं,बल्कि एक “प्रजा” था,जिससे सम्मान और मानवीय व्यवहार की अपेक्षा ही नहीं की जाती थी।दुर्भाग्य से,स्वतंत्रता के बाद भी दशकों तक वही मानसिकता व्यवस्था के भीतर किसी न किसी रूप में बनी रही।ट्रेन में बैठा यात्री अकसर स्वयं को व्यवस्था के सामने असहाय महसूस करता रहा।काला कोट पहने टीटी की कठोर भाषा, कर्मचारी का स्वयं को ‘हाकिम’ समझना,यात्रियों को संदेह या अपराधी की दृष्टि से देखना—ये सब औपनिवेशिक मानसिकता के जीवंत उदाहरण रहे।रेल सेवा,सेवा से अधिक सत्ता प्रदर्शन का माध्यम बनती चली गई।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्पष्ट दृष्टिकोण है कि भारतीय रेल को विश्वस्तरीय बनना चाहिए—तकनीक में अग्रणी,सुरक्षा में भरोसेमंद और संवेदनशीलता में मानवीय।उनका सपना केवल तेज़ ट्रेनें चलाने का नहीं,बल्कि एक ऐसी रेल व्यवस्था गढ़ने का है,जो नए भारत की आत्मा को प्रतिबिंबित करे।

रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव उसी सपने को नीतियों से निकालकर पटरियों पर उतारने का कार्य कर रहे हैं।उनके नेतृत्व में भारतीय रेल केवल स्टेशन और ट्रेनें नहीं बदल रही,बल्कि अपना स्वभाव और संस्कार भी बदल रही है।यह परिवर्तन ऊपर से थोपा हुआ नहीं, बल्कि भीतर से उपजा हुआ परिवर्तन है—जहाँ यात्री केंद्र में है, और कर्मचारी सेवा के माध्यम के रूप में स्वयं को देखता है।ऐसे में अश्विनी वैष्णव का मानना है कि भारतीय रेलवे का प्रत्येक कर्मचारी सत्ता का प्रतिनिधि नहीं,बल्कि सेवा का माध्यम है।हमारे यात्री कोई बोझ नहीं,बल्कि सम्मानित अतिथि है। जब यह भाव कर्मचारी के मन में उतरता है,तभी रेल यात्रा केवल एक सफर नहीं,बल्कि सुखद अनुभव बनती है।औपनिवेशिक सोच से मुक्ति का यही वास्तविक आरंभ है।

इंफ्रास्ट्रक्चर बदला जा सकता है, नई तकनीक लाई जा सकती है, लेकिन मन बदलना सबसे कठिन कार्य है।वे इस कटु सत्य को समझते हैं।इसलिए प्रशिक्षण,संवेदनशीलता, जवाबदेही और सम्मान की संस्कृति पर विशेष बल दिया जा रहा है। रेलकर्मी को यह एहसास कराया जा रहा है कि वह डर पैदा करने वाला अधिकारी नहीं,बल्कि यात्रा को आसान बनाने वाला साथी है।
आज भारतीय रेल का चेहरा और चाल—दोनों बदले हुए दिखाई देते हैं।जहाँ पहले रेल विस्तार की गति सुस्त थी,वहीं अब हर वर्ष हज़ारों किलोमीटर नई रेल लाइनों का निर्माण हो रहा है।बजट और निवेश के आँकड़े बताते हैं कि रेल अब केवल एक विभाग नहीं,बल्कि राष्ट्र निर्माण का प्रमुख औज़ार बन चुकी है। यह बदलाव केवल धन का नहीं, बल्कि दृष्टि का है।पुनर्विकसित स्टेशन,समयबद्ध ट्रेनें,सवच्छ वातावरण,डिजिटल टिकटिंग, पारदर्शी प्रक्रियाएँ—ये सब उस नई सोच के प्रमाण हैं,जिसमें यात्री केंद्र में है,न कि व्यवस्था।ऐसे में वंदे भारत ट्रेन इस बदली हुई दृष्टि का सबसे सशक्त प्रतीक है।यह केवल गति या आधुनिक सुविधाओं का नाम नहीं,बल्कि आत्मनिर्भर भारत की जीवंत अभिव्यक्ति है।भारत में डिज़ाइन की गई,भारत में निर्मित और भारतीय यात्रियों की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित—वंदे भारत औपनिवेशिक मानसिक गुलामी पर करारा प्रहार है,जिसने हमें दशकों तक विदेशी तकनीक पर निर्भर बनाए रखा।

वंदे भारत में बैठा यात्री स्वयं को सम्मानित महसूस करता है।यही बदलाव की असली पहचान है।वहीं अमृत भारत ट्रेन यह सिद्ध करती है कि यह परिवर्तन केवल प्रीमियम वर्ग तक सीमित नहीं,बल्कि आम आदमी तक पहुँचा है—जहाँ सुरक्षित,सुलभ और सम्मानजनक यात्रा प्राथमिकता है।

वही जब वंदे भारत की सुरीली सीटी सुनाई देती है,अमृत भारत ट्रेन आम यात्रियों को बेहतर अनुभव देती है, बुलेट ट्रेन भविष्य की रफ्तार का संकेत देती है और हाइड्रोजन ट्रेन हरित सुनहरे भविष्य की उम्मीद जगती है कि भारतीय रेल अब अतीत की परछाईं नहीं,बल्कि भविष्य की प्रतिविम्ब बन चुकी है।

अमृतकाल का नया भारत यह संदेश दे रहा है कि वह केवल तकनीक अपनाने में सक्षम नहीं,बल्कि भविष्य का नेतृत्व करने का आत्मविश्वास भी रखता है।भारतीय रेल केवल पटरियों पर नहीं दौड़ रही, बल्कि देश की आकांक्षाओं को गति दे रही है।

आज भारतीय रेल विकाश की पटरी सचमुच बदल चुकी है।अब केवल ट्रेनें नहीं बदली हैं—सोच बदल रही है।जब सोच बदलती है,तभी यात्रा सच अर्थों में नए भारत की ओर बढ़ती है।औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति केवल एक नारा नहीं,बल्कि एक सतत प्रक्रिया है,जिसे प्रधानमंत्री मोदी के मिशन,केन्द्रीय रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव के विज़न ने स्पष्ट दिशा दी है।भारतीय रेल अब अतीत के अंधकार से मुक्त होकर, उज्जव भविष्य की ओर आत्म विश्वास के साथ अग्रसर हो रही है,जहाँ सेवा,सम्मान और संवेदन शीलता के नए मानक गढ़ते हुए अमृत काल में स्वर्णिम भारत के इतिहास स्वर्णाक्षर में अंकित होने के लिए आतुर है।