सुनील कुमार महला
लोहड़ी वैसे तो पूरे उत्तर भारत में मनाया जाता है, लेकिन यह मुख्य रूप से पंजाब की जीवंत संस्कृति और कृषि प्रधान जीवन का दर्पण है।पंजाब कृषि प्रधान राज्य है और लोहड़ी का सीधा संबंध किसान जीवन से है। यह वह समय होता है जब रबी की फसल, विशेषकर गेहूं, खेतों में अच्छी तरह बढ़ रही होती है। कड़ाके की ठंड के बावजूद किसान के श्रम का फल आकार लेने लगता है। लोहड़ी किसानों के लिए परिश्रम के सम्मान और भविष्य की समृद्धि की कामना का पर्व है। यह पर्व प्रकृति, भूमि, सूर्य और अग्नि के प्रति आभार प्रकट करने का माध्यम बनता है।देखा जाए तो यह पर्व एक प्रकार से प्रकृति और संस्कृति का संगम है।प्रतिवर्ष 13 जनवरी को मनाया जाने वाला यह पर्व शीत ऋतु की विदाई और सूर्य के उत्तरायण होने का स्वागत करता है। लोहड़ी पौष के अंतिम दिन, सूर्यास्त के बाद (माघ संक्रांति से पहली रात) यह पर्व मनाया जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो लोहड़ी केवल ऋतु-पर्व नहीं, बल्कि उससे जुड़ी पौराणिक स्मृतियों और पारिवारिक संस्कारों का उत्सव है। अग्नि प्रज्वलन को सती के योगाग्नि-दहन की प्रतीकात्मक स्मृति माना जाता है, वहीं विवाहित बेटियों को मायके से भेजी जाने वाली मिठाइयां, वस्त्र, रेवड़ियां, मूंगफलियां, गज्जक आदि माता-पिता के स्नेह और सामाजिक दायित्व का संकेत है। दक्ष प्रजापति द्वारा यज्ञ में भगवान् शिव का भाग न देने की भूल का प्रायश्चित्त भी इस परंपरा में निहित दिखता है। इसी भावभूमि पर उत्तर भारत के ‘खिचड़वार’ और दक्षिण भारत के ‘पोंगल’ जैसे समकालीन पर्वों में भी बेटियों को भेंट देने की परंपरा दिखाई देती है, जो सांस्कृतिक एकता और पारिवारिक संबंधों की निरंतरता को रेखांकित करती है।बहरहाल,यदि हम यहां पर लोहड़ी के इतिहास की बात करें तो लोहड़ी मुख्यतः पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश का प्रमुख लोकपर्व है, जो रबी की फसल के आगमन का प्रतीक है। वैदिक काल से अग्नि को जीवनदायिनी शक्ति माना जाता रहा है। लोकमान्यताओं के अनुसार यह पर्व दुल्ला भट्टी से भी जुड़ा है, जिन्हें पंजाब का रॉबिनहुड कहा जाता है। जानकारी मिलती है कि दुल्ला भट्टी का असली नाम राय अब्दुल्ला खान भट्टी था।उन्होंने मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान मुगल शासन के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया था।उनका जन्म पंजाब क्षेत्र के ‘संदल बार’ (वर्तमान पाकिस्तान में पिंडी भट्टियां) में एक राजपूत मुस्लिम परिवार(भट्टी राजपूत वंश) में हुआ था तथा आपके पिता का नाम फरीद खान भट्टी और दादा का नाम संदल भट्टी था। लोककथाओं के अनुसार, दुल्ला के जन्म से कुछ समय पहले अकबर ने उनके पिता और दादा को विद्रोह के कारण फांसी दे दी थी। दुल्ला भट्टी को गरीबों का मसीहा कहा जाता है, क्यों कि वे अमीर जमींदारों को लूटते थे और लूट का माल गरीबों और जरूरतमंदों में बांट देते थे। मुगल काल में जब लड़कियों को गुलामी के लिए बेचा जाता था, तब दुल्ला भट्टी ने कई लड़कियों को तस्करों से बचाया। पाठकों को बताता चलूं कि दुल्ला भट्टी की सबसे प्रसिद्ध कहानी सुंदरी और मुंदरी नाम की दो अनाथ लड़कियों से जुड़ी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उनके चाचा उन्हें एक राजा को बेचना चाहते थे, लेकिन दुल्ला भट्टी ने उन्हें बचाया। उन्होंने जंगल में आग जलाकर उन दोनों की शादी योग्य हिंदू लड़कों से करवाई और खुद उनका कन्यादान किया तथा शगुन के तौर पर उस समय उन्होंने लड़कियों को एक सेर शक्कर (चीनी) भेंट की थी।आज भी पंजाब और उत्तर भारत में लोहड़ी का त्योहार दुल्ला भट्टी की याद में मनाया जाता है।लोहड़ी की आग के चारों ओर लोग इकट्ठा होकर प्रसिद्ध लोकगीत गाते हैं-‘सुंदर मुंदरिये हो, तेरा कौन विचारा हो, दुल्ला भट्टी वाला हो…।’ उल्लेखनीय है कि यह गीत लोहड़ी के अग्नि-पूजन, फसल की खुशहाली, नवविवाहितों व नवजात शिशु के मंगलकामना तथा लोकनायक दुल्ला भट्टी के साहस और दानशीलता की स्मृति से जुड़ा है।सच तो यह है कि दुल्ला भट्टी का चरित्र लोहड़ी को केवल पर्व नहीं, बल्कि न्याय, साहस और सामाजिक संवेदना का प्रतीक बनाता है। लोहड़ी गीत गाते हुए लोग अग्नि में लकड़ी, तिल, गुड़, मूंगफली आदि अर्पित करते हैं।दुल्ला भट्टी ने मुग़ल काल में अत्याचारों से पीड़ित बेटियों का विवाह करवाया, इसलिए आज भी लोहड़ी के गीतों में उसका उल्लेख होता है।वास्तव में यह गीत उनकी वीरता और लड़कियों के प्रति उनके सम्मान को समर्पित है।नवविवाहितों और नवजात शिशु के लिए पहली लोहड़ी विशेष महत्व रखती है, जैसा कि इसे समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है।लोहड़ी की अग्नि में डाली जाने वाली सामग्री (तिल, गुड़, मूंगफली) ऊर्जा और उष्मा देने वाली होती है, जो सर्दी के मौसम के अनुरूप है। बहरहाल, यदि हम यहां पर ‘लोहड़ी’ शब्द की उत्पत्ति की बात करें तो इसकी उत्पत्ति ‘लोई’ यानी कि गुड़ की रोटी या ‘लोह’ (अग्नि) से मानी जाती है। कुछ लोग इसे ‘तिलोड़ी’ अर्थात तिल और गुड़ से बनी वस्तुओं से संबंधित मानते हैं। लोकमान्यता यह भी है कि लोहड़ी का नाम सूर्य और अग्नि की आराधना से जुड़ा है, जो जीवन के आधार माने जाते हैं। वास्तव में सच तो यह है कि, यह पर्व खगोलीय परिवर्तन से भी जुड़ा है, क्यों कि सूर्य के मकर राशि में प्रवेश से दिन बड़े होने लगते हैं। पहले लोहड़ी को सामूहिक लोकपर्व के रूप में मनाया जाता था, जहाँ गाँव की स्त्रियाँ बच्चों के साथ घर-घर जाकर गीत गाती थीं।लोहड़ी लोहड़ी लकड़ी,जिवै थारी बकरी।लकड़ी में तोतो, जिवै थारो पोतो। दाने पां दे सेर,तूं जां बच्चा चेर। आगे अग्ग बाले,पिछे घोड़े काले।घोड़ा-काठी आई, लोहड़ी मनाई।’ गीत तो आज भी बच्चों में बहुत लोकप्रिय है। बच्चे घर घर जाते हैं और लोहड़ी की बधाई मांगते हैं। यहां पाठकों को यह भी बताता चलूं कि लोहड़ी के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न नाम हैं। पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में इसे लोहड़ी, हिमाचल प्रदेश में इसे माघी और लोहड़ी दोनों के नाम से जाना जाता है। उत्तर भारत में इसे मकर संक्रांति पर्व कहा जाता है। वैसे मकर संक्रांति पर्व का आगमन लोहड़ी के ठीक एक दिन बाद होता है। गुजरात में लोहड़ी पर्व को उत्तरायण, महाराष्ट्र में मकर संक्रात, बंगाल में पौष संक्रांति, तमिलनाडु में पोंगल तथा असम में इसे भोगाली बिहू के नाम से जाना जाता है जो भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। जो भी हो इस पर्व को अलग-अलग नामों से पूरे देश में मनाया जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो लोहड़ी केवल एक पर्व मात्र नहीं, है बल्कि यह तो हमारी लोकसंस्कृति, ऋतु परिवर्तन और सामाजिक एकता का उत्सव है। यह हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, परंपराओं से जुड़ाव और सामूहिक आनंद का संदेश देती है। मूल भाव यह है कि यह पर्व नई फसल (रबी) की खुशी, सामूहिक भाईचारे और अग्नि की पवित्रता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है। लोहड़ी के दिन लकड़ियों के अलाव के चारों ओर लोकगीत, भांगड़ा और गिद्दा के साथ लोग आपसी भेदभाव भुलाकर एकजुट होते हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि तिल, गुड़ और गजक की मिठास के साथ यह त्योहार जीवन में नई ऊर्जा, संपन्नता और सामाजिक समरसता का संचार करता है। लोहड़ी पर्व में अग्नि का प्रतीकात्मक महत्व है क्यों कि लोहड़ी का सबसे प्रमुख तत्व अग्नि है। सूर्यास्त के बाद खुले मैदान या घर के आंगन में आग जलाई जाती है। अग्नि को साक्षी मानकर लोग उसकी परिक्रमा करते हैं और जैसा कि ऊपर भी इस आलेख में चर्चा कर चुका हूं कि उसमें तिल, मूंगफली, रेवड़ी, गजक, पॉपकॉर्न आदि अर्पित करते हैं। अग्नि यहाँ केवल भौतिक ऊष्मा का स्रोत नहीं, बल्कि शुद्धि, ऊर्जा और नवजीवन का प्रतीक है। यह अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संकेत भी देती है। लोहड़ी पर्व लोकगीतों, ढोल और नृत्य बिना अधूरा है।नृत्य और संगीत ऊर्जा, उत्साह और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को दर्शाते हैं।इस पर्व का सामाजिक और पारिवारिक महत्व है।यह पर्व विशेष रूप से नवविवाहित जोड़ों और नवजात शिशुओं के लिए खास माना जाता है। परिवार और समाज मिलकर उन्हें आशीर्वाद देते हैं, उपहार देते हैं और सामूहिक रूप से उत्सव मनाते हैं। इससे सामाजिक स्वीकृति, पारिवारिक एकता और परंपराओं की निरंतरता बनी रहती है। लोहड़ी रिश्तों में गर्माहट और आपसी सहयोग की भावना को प्रबल करती है।लोहड़ी बच्चों के लिए केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक शिक्षा का माध्यम भी है, जिसके द्वारा वे अपनी जड़ों से जुड़ते हैं। अंत में यही कहूंगा कि आधुनिकता और शहरीकरण के बावजूद भी आज लोहड़ी की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। शहरों में भी सामूहिक कार्यक्रम, सांस्कृतिक संध्याएँ और सामाजिक आयोजन होते हैं। प्रवासी पंजाबी समुदाय, चाहे वह भारत के अन्य राज्यों में हो या विदेशों में, लोहड़ी के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखता है। यह पर्व उन्हें अपनी मातृभूमि और परंपराओं से भावनात्मक रूप से जोड़ता है।यह बहुत ही अच्छी बात है कि आज के समय में लोहड़ी मनाने के तरीकों में पर्यावरणीय चेतना का समावेश भी आवश्यक हो गया है। सीमित और सुरक्षित अग्नि, स्वच्छता और सामूहिक जिम्मेदारी के साथ उत्सव मनाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। यह दर्शाता है कि परंपराएँ समय के साथ स्वयं को संतुलित और प्रासंगिक बनाती हैं।निष्कर्षत: यहां यह बात कही जा सकती है कि लोहड़ी पंजाब की जीवंतता और ‘सांझी विरासत’ का उत्सव है,जो पूरे भारत व विदेशों में भी हर्षोल्लास,खुशी और उमंग के साथ मनाया जाता है।यह पर्व कड़ाके की ठंड (कठिनाइयों) पर अग्नि (आशा, विश्वास और ऊर्जा) की विजय का प्रतीक है। दुल्ला भट्टी जैसी लोककथाओं के माध्यम से यह हमें सामाजिक न्याय और सामूहिकता का पाठ पढ़ाता है। अंततः, लोहड़ी हमें अपनी जड़ों और मिट्टी से जुड़े रहकर, प्रकृति के उपहारों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और समाज के साथ मिल-जुलकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।





