मुनीष भाटिया
वेनेजुएला में हालिया घटनाएँ एक बार फिर इस कड़वे यथार्थ को सामने लाती हैं कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति आज भी शक्ति के उसी पुराने उसूल पर चल रही है— “जिसकी लाठी, उसकी भैंस।” लोकतंत्र, मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय कानून जैसे शब्द महज़ कूटनीतिक आवरण बनकर रह गए हैं, जबकि वास्तविक निर्णय शक्ति-संतुलन और स्वार्थ तय कर रहे हैं। अमेरिका ने वेनेजुएला के साथ जो किया, वह किसी एक देश की कहानी नहीं, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था का आईना है जिसमें ताकतवर देश नियम बनाते हैं और कमजोर देशों से उनका पालन करवाते हैं।
वेनेजुएला कोई नया उदाहरण नहीं है, लेकिन यह उदाहरण इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाता है कि यदि कोई संप्रभु राष्ट्र अमेरिकी नीतियों, उसके आर्थिक हितों या भू-राजनीतिक एजेंडे के अनुरूप चलने से इनकार करता है, तो उसे किस तरह से “सबक” सिखाया जाता है। कभी आर्थिक प्रतिबंधों के जरिये, कभी तेल व्यापार को हथियार बनाकर, कभी मुद्रा और बैंकिंग प्रणाली पर रोक लगाकर, और जब ये सब नाकाफ़ी साबित हों तो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप तक का रास्ता खोल दिया जाता है।
अमेरिका की यह नीति कोई अचानक उपजी हुई नहीं है। शीत युद्ध के दौर से लेकर आज तक, लैटिन अमेरिका, पश्चिम एशिया और एशिया-अफ्रीका के कई देशों ने इसे झेला है। इराक, लीबिया, सीरिया और अब वेनेजुएला—सूची लंबी है। फर्क बस इतना है कि हर बार हस्तक्षेप को नया नाम दे दिया जाता है—कभी “लोकतंत्र की बहाली”, कभी “तानाशाही के खिलाफ लड़ाई” और कभी “मानवाधिकारों की रक्षा”। लेकिन इन सभी नारों के पीछे असली लक्ष्य संसाधन, प्रभाव और रणनीतिक नियंत्रण ही रहा है।यह स्थिति पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है। खासकर विकासशील और मध्यम शक्ति वाले देशों के लिए। यह मान लेना कि अमेरिकी सहायता, व्यापार या रणनीतिक साझेदारी हमेशा निष्पक्ष और दीर्घकालिक होगी, अब एक खतरनाक भ्रम बन चुका है। इतिहास गवाह है कि अमेरिका दोस्ती भी अपने हित देखकर करता है और दुश्मनी भी।
इसी संदर्भ में भारत के लिए यह सवाल और भी प्रासंगिक हो जाता है। डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने जिस तरह “अमेरिका फर्स्ट” की नीति अपनाई, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि साझेदारी तब तक ही मान्य है, जब तक वह अमेरिकी लाभ में हो। भारत पर टैरिफ बढ़ाने की धमकी, व्यापार घाटे का हवाला देकर दबाव बनाना, रक्षा सौदों को राजनीतिक हथकंडे की तरह इस्तेमाल करना—ये सभी संकेत हैं कि भारत को भी उकसाने और झुकाने की कोशिश समय-समय पर की जाती रही हैं।
भारत के लिए चुनौती यह है कि वह इस दबाव की राजनीति को समय रहते पहचाने और उससे बचे। भारत एक संप्रभु, सभ्यतागत और उभरती वैश्विक शक्ति है। उसकी विदेश नीति का आधार आत्मनिर्भरता, रणनीतिक स्वायत्तता और बहुपक्षीय संतुलन रहा है। यदि भारत किसी एक शक्ति-केंद्र पर अत्यधिक निर्भर होता है—चाहे वह रक्षा हो, तकनीक हो या व्यापार—तो वह भी उसी जाल में फँस सकता है, जिसमें वेनेजुएला जैसे देश फँसे।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत और दुनिया के अन्य देश वेनेजुएला से सबक लें। आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था, विविध व्यापारिक साझेदार, मजबूत घरेलू उत्पादन और स्वतंत्र विदेश नीति—यही वह ढाल है जो किसी भी देश को वैश्विक दादागिरी से बचा सकती है। मित्रता हो, सहयोग हो, लेकिन आत्मसम्मान और राष्ट्रीय हित की कीमत पर नहीं।अतः वेनेजुएला की पीड़ा हमें यह याद दिलाती है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर नैतिकता की बातें अक्सर ताकत की भाषा में दब जाती हैं। इसलिए हर देश को अपनी लाठी मजबूत करनी होगी—कानून की, अर्थव्यवस्था की और जनसमर्थन की—ताकि उसकी भैंस कोई और हांक न ले जाए।





