प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
विश्व राजनीति के बदलते परिदृश्य में ऊर्जा अब केवल ईंधन नहीं, बल्कि शक्ति, प्रभाव और रणनीति का सबसे बड़ा हथियार बन चुकी है। जब तेल की धाराओं पर राजनीति हावी होती है, तब उसका असर सीधे राष्ट्रों की अर्थव्यवस्था, जनता की जेब और विदेश नीति की स्वतंत्रता पर पड़ता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की धमकी इसी ऊर्जा-राजनीति का सबसे तीखा उदाहरण है। यह धमकी केवल रूस को नहीं, बल्कि भारत जैसे उभरते देशों को भी सीधे चुनौती देती है, जिनकी ऊर्जा सुरक्षा पिछले कुछ वर्षों से रूसी कच्चे तेल पर काफी हद तक निर्भर रही है। यह सवाल अब केवल तेल का नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक मंच पर उसकी निर्णय क्षमता का बन गया है।
ट्रंप की इस घोषणा ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल मचा दी है। यूक्रेन युद्ध को लगभग चार वर्ष पूरे होने के बाद अमेरिका ने रूस पर दबाव बढ़ाने के लिए नए हथकंडे अपनाए हैं। जनवरी 2026 में ट्रंप ने ‘सैंक्शनिंग रशिया एक्ट ऑफ 2025’ को समर्थन देकर स्पष्ट संकेत दिया कि जो भी देश रूसी तेल, गैस या यूरेनियम खरीदेगा, उसे भारी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ेगी। इस कानून के तहत अमेरिका ऐसे देशों के निर्यात पर 500 प्रतिशत तक द्वितीयक टैरिफ लगा सकता है। भारत, चीन और ब्राजील जैसे बड़े आयातक इस नीति के सीधे निशाने पर हैं। यह कदम युद्ध के मैदान से बाहर आर्थिक मोर्चे पर लड़ा जा रहा एक आक्रामक संघर्ष है।
भारत के लिए यह स्थिति इसलिए अधिक गंभीर है क्योंकि पिछले चार वर्षों में रूसी तेल भारत की ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस ने भारी छूट पर कच्चा तेल बेचना शुरू किया, जिससे भारत को महंगे मध्य-पूर्वी तेल पर निर्भरता कम करने का अवसर मिला। 2022 से 2025 के बीच कई महीनों में रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया और कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी 30 से 40 प्रतिशत तक पहुंची। इस सस्ते तेल ने न केवल भारत की रिफाइनरियों को राहत दी, बल्कि घरेलू स्तर पर मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने में भी अहम भूमिका निभाई।
500 प्रतिशत टैरिफ की धमकी वैश्विक व्यापार इतिहास में लगभग अभूतपूर्व है। इतना ऊंचा शुल्क किसी भी देश के लिए अमेरिकी बाजार तक पहुंच को लगभग असंभव बना सकता है। भारत जैसे निर्यात-आधारित अर्थतंत्र के लिए यह बड़ा जोखिम है, क्योंकि अमेरिका भारत का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है। पहले ही 2025 में रूसी तेल खरीदने के कारण कुछ भारतीय उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाए जा चुके हैं। अब अगर यह दर 500 प्रतिशत तक पहुंचती है, तो इसका असर फार्मा, आईटी, टेक्सटाइल और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों पर पड़ सकता है। इस दबाव का उद्देश्य केवल रूस को अलग-थलग करना नहीं, बल्कि भारत जैसे देशों को अमेरिकी ऊर्जा और रणनीतिक ढांचे में मजबूती से बांधना भी है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील पहलू है। देश अपनी कुल तेल आवश्यकता का 85 प्रतिशत से अधिक आयात करता है। ऐसे में सस्ते और स्थिर आपूर्तिकर्ता का महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है। यदि रूसी तेल की आपूर्ति पूरी तरह बाधित होती है, तो भारत को फिर से महंगे विकल्पों की ओर लौटना पड़ेगा। इससे पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है, जिसका सीधा असर आम नागरिक और औद्योगिक उत्पादन पर पड़ेगा। वैश्विक बाजार में आपूर्ति घटने से तेल की कीमतें बढ़ने की आशंका भी बनी रहेगी, जो विकासशील देशों के लिए दोहरी मार साबित हो सकती है।
हालांकि भारत इस दबाव के सामने निष्क्रिय नहीं है। सरकार और तेल कंपनियों ने समय रहते आपूर्ति के विविधीकरण की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। अमेरिका, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अफ्रीकी देशों से तेल आयात बढ़ाया जा रहा है। घरेलू उत्पादन को बढ़ाने के लिए ओएनजीसी और निजी कंपनियों की परियोजनाओं को गति दी गई है। इसके साथ ही 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य की दिशा में तेजी से काम हो रहा है, ताकि भविष्य में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम की जा सके। यह रणनीति भारत को अल्पकालिक झटकों से उबरने और दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता की ओर ले जाने का प्रयास है।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा प्रश्न भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का है। भारत की विदेश नीति हमेशा संतुलन और बहुपक्षीयता पर आधारित रही है। एक ओर अमेरिका के साथ रक्षा, प्रौद्योगिकी और क्वाड जैसी साझेदारियां हैं, तो दूसरी ओर रूस के साथ दशकों पुराने रणनीतिक और सैन्य संबंध। ट्रंप की नीति भारत को स्पष्ट रूप से एक पक्ष चुनने के लिए दबाव में डालती है। भारत ने हमेशा एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध किया है और अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा है। ऐसे में यह चुनौती भारत की कूटनीतिक परिपक्वता और आत्मविश्वास की भी परीक्षा है।
वैश्विक स्तर पर ट्रंप की इस नीति के प्रभाव दूरगामी हो सकते हैं। रूस की अर्थव्यवस्था को झटका जरूर लगेगा, लेकिन चीन और अन्य देशों के साथ व्यापार जारी रहने से वह पूरी तरह अलग-थलग नहीं होगा। दूसरी ओर, तेल की कीमतों में अस्थिरता वैश्विक आर्थिक विकास को धीमा कर सकती है। अमेरिका खुद को एक प्रमुख ऊर्जा निर्यातक के रूप में स्थापित करना चाहता है, लेकिन इससे उसके सहयोगियों में भी असहजता बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह धमकी ट्रंप की पुरानी सौदेबाजी शैली का हिस्सा भी हो सकती है, जिसका उद्देश्य अधिकतम दबाव बनाकर बेहतर सौदा हासिल करना है।
अंततः ट्रंप की 500 प्रतिशत टैरिफ की धमकी भारत के लिए एक कठिन लेकिन निर्णायक मोड़ है। यह संकट भारत को अपनी ऊर्जा नीति, आर्थिक रणनीति और विदेश नीति को नए सिरे से परिभाषित करने का अवसर भी देता है। विविधीकरण, घरेलू उत्पादन, नवीकरणीय ऊर्जा और सशक्त कूटनीति के सहारे भारत इस चुनौती को अवसर में बदल सकता है। आज यह स्पष्ट हो चुका है कि ऊर्जा केवल व्यापार नहीं, बल्कि संप्रभुता और शक्ति का प्रश्न है। भारत को इस वैश्विक ऊर्जा खेल में संतुलन, साहस और दूरदर्शिता के साथ आगे बढ़ना होगा, ताकि उसकी ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता दोनों सुरक्षित रह सकें।





