दिलीप कुमार पाठक
दिल्ली की ठिठुरती हुई जनवरी की सुबह और भारत मण्डपम की भव्यता के बीच एक अलग ही संसार बसा हुआ है। यहाँ की फिजाओं में केवल कागज और ताजी स्याही की खुशबू नहीं है, बल्कि यह उन उम्मीदों की महक है जो बताती हैं कि तकनीक के शोर के बीच भी इंसान का अपनी जड़ों से जुड़ाव बना हुआ है। विश्व पुस्तक मेला 2026 केवल एक बाजार नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक महाकुंभ बन गया है। सबसे सुखद दृश्य यह है कि इस मेले की असली रौनक आज का युवा और छोटे बच्चे हैं। अक्सर यह चिंता जताई जाती है कि ‘रील’ और ‘शॉर्ट वीडियो’ के इस दौर में एकाग्रता खत्म हो रही है, लेकिन यहाँ उमड़ी यह भीड़ गवाही दे रही है कि दुनिया अभी बची रहेगी, क्योंकि यहाँ का युवा पन्नों के सन्नाटे को मोबाइल के शोर पर तरजीह दे रहा है।
यह देखना दिल को सुकून देता है कि आज की पीढ़ी केवल समकालीन लेखकों तक सीमित नहीं है। स्टालों पर घूमते हुए जब आप देखते हैं कि युवा मुंशी प्रेमचंद के ‘गोदान’ के पात्रों की बात कर रहे हैं या हरिवंश राय बच्चन की ‘मधुशाला’ के दर्शन को अपने जीवन से जोड़ रहे हैं, तो लगता है कि साहित्य की मशाल सही हाथों में है। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की ओजस्वी रश्मिरथी की पंक्तियाँ आज भी युवाओं की रगों में वही जोश भर रही हैं, और सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का विद्रोही स्वर आज के दौर के प्रतिवाद की भाषा बन रहा है। उर्दू अदब का जादू भी सिर चढ़कर बोल रहा है; फैज़ अहमद फैज़ की नज़्में और साहिर लुधियानवी की बेबाक कलम आज के युवाओं के लिए प्रेम और क्रांति का नया व्याकरण लिख रही हैं। अंग्रेजी साहित्य में विलियम शेक्सपियर, चार्ल्स डिकेंस और मार्क ट्वेन जैसे दिग्गज आज भी अपनी कहानियों से युवाओं को मंत्रमुग्ध कर रहे हैं।
महिला लेखिकाओं के प्रति बढ़ता रुझान एक प्रगतिशील समाज की ओर इशारा करता है। महादेवी वर्मा की असीम संवेदनशीलता, कृष्णा सोबती की ‘मितरो मरजानी’ वाली बेबाकी और अमृता प्रीतम की ‘रसीदी टिकट’ को ढूँढते युवाओं की आँखें साहित्य की गहराई की तलाश में हैं। विदेशी लेखिकाओं में वर्जीनिया वुल्फ, जेन ऑस्टेन, टोनी मॉरिसन और सिल्विया प्लाथ की कृतियों को लेकर युवतियों में विशेष उत्साह देखा जा रहा है। भारत मण्डपम के इन आधुनिक गलियारों में जब बुजुर्ग और युवा मिलकर सुभद्रा कुमारी चौहान की कविताओं का जि़क्र करते हैं तो पीढ़ियों का फासला सिमट जाता है। यह दृश्य किसी उत्सव से कम नहीं कि जहाँ लोग सेल्फी लेने के लिए नहीं, बल्कि दुर्लभ अनुवादों और पुराने संस्करणों को पाने के लिए धक्का-मुक्की कर रहे हैं।
यहाँ का हर कोना एक नई कहानी कहता है; कहीं कोई युवा चेखव की कहानियों पर बहस कर रहा है, तो कहीं कोई युवती इस्मत चुगताई के अफसानों में अपना अक्स तलाश रही है। चुगताई की बेबाकी के साथ जौन एलिया की दीवानगी और सआदत हसन मंटो का कड़वा सच आज के युवाओं की नई जुबां बन गया है। ग़ालिब की सादगी और मीर की दार्शनिकता को अपने भीतर उतारती यह पीढ़ी बताती है कि रील के शोर में भी रूहानी सुकून की तलाश जारी है। सिनेमाई दिग्गजों की विरासत भी यहाँ कम नहीं, जहाँ देवानंद का ज़िंदादिली भरा अंदाज़ और गुरुदत्त की संजीदगी युवाओं को जीवन के गहरे फलसफे समझा रही है। मीना कुमारी के दर्द को महसूस करते इन चेहरों को देखकर लगता है कि संवेदनाओं का यह पुल आज भी मजबूती से खड़ा है।
साहित्य की यह सरिता केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक वैचारिक क्रांति है जो हमारे समाज को नया आकार दे रही है। यह सच है कि अंग्रेजी के चमकते कवर वाले स्टालों पर भीड़ अधिक है, लेकिन हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के स्टालों पर पाठकों की वह खामोश गहराई है जो लंबे समय तक टिकने वाली है। रील की दुनिया भले ही कुछ क्षणों के लिए हमें लुभा ले, लेकिन ये किताबें ही हैं जो हमें अंधेरों में रास्ता दिखाती हैं। जब हम इन युवाओं को भारी-भरकम किताबों के थैलों के साथ मुस्कुराते हुए देखते हैं, तो यकीन हो जाता है कि इंसानियत की विरासत अभी सुरक्षित है। भारत मण्डपम की यह रौनक आने वाले कई सालों तक हमारे दिलों में साहित्य की अलख जगाती रहेगी और एक बेहतर समाज को गढ़ती रहेगी।





