प्रो. नीलम महाजन सिंह
भारत-चीन विवाद, भारतीय विदेश मंत्रालय के लिए लगातार प्रयास कर राजनयिक संबंधों को सुचारू रखने में गुज़रता है। अहमदाबाद में पीएम नरेंद मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की दोस्ती पर अनेक परिवर्तन हुए हैं। चीन, पाकिस्तान का संरक्षक है। चीन का सबसे सक्षम और दीर्घ दूतावास, पाकिस्तान में ही स्थित है। विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर, आई.एफ.एस. व विदेश सचिव, विक्रम मिस्री, दोनों ही भारत-चीन विशेषज्ञ हैं। वे चीन में भारत के एम्बेसडर भी रह चुके हैं। पिछले कुछ महीनों में दोनों देशों में राजनयिक मतभेद इतने अधिक हुए कि डॉ. जयशंकर और चीनी विदेश मंत्री वांग Yi (Wang Yi) में बैठक होनी अनिवार्य हो गई। उधर अमरीकी राष्ट्रपति डोनाॅल्ड ट्रम्प सरकार द्वारा लगाए 100% व 50% टैक्स लगाये जाने से भारतीय कंपनियों को गहरा नुकसान हुआ है। इसलिए चीन को अपनी ओर रखना अन्तरराष्ट्रीय मज़बूरी है। पिछले सप्ताह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के एक प्रतिनिधिमंडल ने दिल्ली में, कांग्रेस के विदेश मामलों के विभाग (AICC Foreign Affairs Department) के प्रमुख सलमान खुर्शीद से मुलाकात की। मुख्य रूप से यह प्रतिनिधिमंडल भाजपा नेताओं से मिला। फ़िर भाजपा को कॉंग्रेस पर कटाक्ष करना, उचित प्रतीत नहीं हो रहा है। कांग्रेस पार्टी ने कहा कि यह बैठक चीनी मेहमान प्रतिनिधिमंडल के अनुरोध पर व सरकार की मंज़ूरी से हुई थी। उधर पवन खेड़ा ने सरकार संग हुई बैठक का व्याख्यान भी माँगा है। यह बैठक चीनी प्रतिनिधिमंडल, जिसके प्रमुख उनके अंतरराष्ट्रीय विभाग के उप-मंत्री सुन हैयान Sun Hyan) थे। वे दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी मुख्यालय का दौरा करने व सत्ताधारी पार्टी के नेताओं से मिलने के एक दिन बाद हुई। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सलमान खुर्शीद के साथ हुई बैठक के बारे में पूछे जाने पर कहा कि प्रतिनिधिमंडल ने बैठक का अनुरोध किया था, भारत सरकार ने इस अनुरोध को मंज़ूरी दी व इसीलिए, सलमान खुर्शीद, उनसे मिले। सलमान खुर्शीद, पी.एम. डॉ. मनमोहन सिंह के काल में भारत के विदेश मंत्री थे। हाल ही में, ‘शक्सगाम घाटी पर कब्ज़ा’ करने का, चीन का मूल मकसद हिंद महासागर तक पहुंचना है। चीनी लोग पक्के तौर पर मानते हैं कि युद्ध की सबसे बड़ी कला ‘दुश्मन को बिना लड़ाई के हराना है’।रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल संजय कुलकर्णी ने जम्मू-कश्मीर की शक्सगाम घाटी पर चीन के हालिया दावे पर कहा, “चीन, भारत को परेशान करता रहेगा और दबाव डालता रहेगा, कभी सीधे तौर पर, कभी पाकिस्तान या बांग्लादेश या नेपाल या श्रीलंका का इस्तेमाल करके।” जनरल संजय कुलकर्णी ने ‘लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल’ (LOC) पर एक ब्रिगेड व एक डिवीज़न की कमान संभाली थी व सियाचिन ग्लेशियर पर ‘बिलाफोंडला’ में अपनी पलटन को तिरंगा फहराने के लिए; उन्हें शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था। शक्सगाम समस्या की जड़ें, चीन ने पाकिस्तान को अवैध रूप से एक तोहफे में देने के लिए क्यों मजबूर किया? भारत, चीन पर भरोसा क्यों नहीं कर सकता? 1962 में चीन के साथ युद्ध में भारत की हार के बाद 1963 में पाकिस्तान ने शक्सगाम घाटी चीन को तोहफे में दे दी थी। पाकिस्तान को एहसास हुआ कि वह चीन का सामना नहीं कर सकता था, जो 1950 के दशक से शक्सगाम घाटी पर अपना दावा जता रहा था। पाकिस्तान को अच्छी तरह पता था कि 26 अक्टूबर, 1947 को हस्ताक्षरित विलय पत्र के अनुसार पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का था, जिसके माध्यम से महाराजा हरि सिंह ने औपचारिक रूप से भारत में विलय किया था। हालांकि, पाकिस्तान एक बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर रहा था – गिलगित-बाल्टिस्तान व पाक अधिकृत कश्मीर, जिसका कुल क्षेत्रफल लगभग 84,000 वर्ग किलोमीटर है। चीन ने 1950 में अक्साई चिन पर नियंत्रण कर लिया, जो लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर है। जम्मू-कश्मीर राज्य की सेना के ब्रिगेडियर घनसार सिंह को महाराजा ने गिलगित-बाल्टिस्तान का कब्ज़ा लेने के लिए भेजा था व जुलाई 1947 में उन्हें गिलगित का गवर्नर नियुक्त किया गया था। लेकिन मेजर विलियम ब्राउन, जो गिलगित स्काउट्स के इंचार्ज थे, उन्होंने बिना खून-खराबे के तख्तापलट करके उन्हें हटा दिया व जेल में डाल दिया। 1 नवंबर 1947 को आज़ादी की घोषणा कर दी गई। 1984 में, भारत ने सियाचिन ग्लेशियर पर कब्ज़ा कर लिया जो शक्सगाम घाटी से सटा हुआ है। चीन-भारत में भरोसे की कमी है। रक्षा मंत्रालय सेना पर पैसा खर्च करता है, ताकि पड़ोसी देशों से मुकाबला हो सके। भले ही भारत तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाए, चीन चाहता है कि वह उससे पीछे रहे। अगर कोई हलचल होती है, तो हमारे सैनिक उसका पता लगा सकते हैं। भारत इस बात से अनजान नहीं हैं कि चीन क्या कर सकता है। हमें चौकस रहना चाहिए। चीन से सिर्फ़ ताकत की स्थिति में ही बात कर सकते हैं और वह ताकत आर्थिक, तकनीकी व सैन्य होनी चाहिए। रिपब्लिक ऑफ चाइना में भारत के वर्तमान राजदूत प्रदीप कुमार रावत हैं, जो 1990 बैच के भारतीय विदेश सेवा (IFS) अधिकारी हैं, जिन्होंने मार्च 2022 में विक्रम मिसरी से पदभार संभाला था। भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) में संयुक्त सचिव (पूर्वी एशिया, चीन मामलों के लिए ज़िम्मेदार), सुजीत घोष हैं, जो पूर्वी एशिया डिवीजन का नेतृत्व कर रहे हैं। डा. विक्रम कृष्णमूर्ति, निदेशक (चीन) के रूप में कार्यरत हैं, जो उस डिवीजन के भीतर, चीन से संबंधित विशिष्ट पहलुओं को संभालते हैं। सारांंशार्थ भारत-चीन में मैत्री पूर्ण संबंध, एशिया प्रशांत क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं। यह अवश्यक है कि राजनीतिक सलाहकार व प्रबुद्ध विदेश मंत्रालय राजनयिक, भारत-चीन में सद्भाव बनाए रखने का प्रयास करते रहें।





