डॉ. सत्यवान सौरभ
हरियाणा लोक सेवा आयोग द्वारा हाल ही में जारी प्रेस विज्ञप्ति में अपनी कार्यप्रणाली को लेकर चार बिंदुओं में स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया गया है। पहली दृष्टि में यह स्पष्टीकरण पारदर्शिता और उत्तरदायित्व का आभास कराता है, किंतु जब इन दावों को वास्तविक आँकड़ों, भर्ती परिणामों, न्यायालयीन हस्तक्षेपों तथा अभ्यर्थियों के अनुभवों के संदर्भ में परखा जाता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह सफाई कम और तथ्यों से ध्यान हटाने का प्रयास अधिक है। आयोग का यह कहना कि उसकी छवि के विरुद्ध “झूठा नैरेटिव” गढ़ा जा रहा है, स्वयं अनेक गंभीर प्रश्नों को जन्म देता है।
सबसे पहला और मूल प्रश्न यही है कि क्या हरियाणा लोक सेवा आयोग वास्तव में एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और योग्यता आधारित संवैधानिक संस्था की तरह कार्य कर रहा है। यदि ऐसा है, तो फिर प्रत्येक भर्ती के उपरांत बड़ी संख्या में पदों का रिक्त रह जाना, चयन प्रक्रिया के बीच नियमों का बदला जाना तथा अभ्यर्थियों को बार-बार न्यायालय की शरण लेने के लिए विवश होना कैसे उचित ठहराया जा सकता है।
प्रदेश में प्रशासनिक अधिकारियों, शिक्षकों और तकनीकी विशेषज्ञों की भारी कमी किसी से छिपी नहीं है। इसके बावजूद आयोग द्वारा संचालित भर्तियों में सैकड़ों और हज़ारों पदों को जानबूझकर रिक्त छोड़ा जाना एक गंभीर विसंगति को उजागर करता है। हरियाणा सिविल सेवा में सौ पदों में से केवल इकसठ पदों को भरना, कृषि विकास अधिकारी भर्ती में छह सौ में से मात्र पचास नियुक्तियाँ करना, स्नातकोत्तर अध्यापक, प्रवक्ता तथा महाविद्यालय अध्यापक भर्तियों में आधे या उससे अधिक पदों को रिक्त छोड़ देना यह दर्शाता है कि समस्या योग्य अभ्यर्थियों की कमी नहीं, बल्कि चयन प्रक्रिया की नीयत और दिशा में निहित है।
महाविद्यालय अध्यापक भर्ती का उदाहरण विशेष रूप से चिंताजनक है, जहाँ कुल दो हज़ार चार सौ चौबीस पदों में से लगभग तीन-चौथाई पद रिक्त रह गए। जब देश भर में हज़ारों शोध उपाधि धारक, राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण और कनिष्ठ अनुसंधान अध्येता उपलब्ध हैं, तो यह मानना कठिन है कि योग्य अभ्यर्थी ही नहीं मिले। यह स्थिति तब और अधिक संदेह उत्पन्न करती है जब इन्हीं रिक्त पदों के समानांतर हरियाणा कौशल रोजगार निगम के माध्यम से ठेके पर नियुक्तियाँ की जाती हैं और बाद में उन्हीं में से अनेक को नियमित भी कर दिया जाता है। यह प्रक्रिया योग्यता आधारित चयन व्यवस्था की आत्मा पर सीधा प्रहार है और इसे पिछली राह से प्रवेश कहना पूर्णतः उचित है।
आयोग की कार्यप्रणाली पर उठने वाला दूसरा बड़ा प्रश्न हरियाणा के युवाओं की निरंतर उपेक्षा से संबंधित है। अनेक भर्तियों में अन्य राज्यों के अभ्यर्थियों का अनुपात असामान्य रूप से अधिक रहा है। राजनीति विज्ञान विषय में महाविद्यालय अध्यापक भर्ती में अठारह में से ग्यारह चयन अन्य राज्यों से होना, तकनीकी प्रवक्ता वर्ग में एक सौ सत्तावन में से एक सौ तीन चयन हरियाणा के बाहर के होना, हरियाणा सिविल सेवा परीक्षा में लगभग एक-तिहाई चयन बाहरी होना — ये आँकड़े किसी सामान्य संयोग की ओर संकेत नहीं करते।
स्थिति यहाँ तक पहुँच चुकी है कि कुछ महाविद्यालय अध्यापक भर्तियों में हरियाणा के अभ्यर्थियों का प्रतिशत आठ प्रतिशत से भी कम रहा, जबकि स्नातकोत्तर अध्यापक भर्तियों में लगभग आधे चयन अन्य राज्यों से हुए। यदि इसमें कृषि विकास अधिकारी और आयुर्विज्ञान अधिकारी जैसी भर्तियों के आँकड़े भी जोड़ दिए जाएँ, तो यह तस्वीर और अधिक भयावह हो जाती है। इसके साथ-साथ आयोग की परीक्षाओं से हरियाणा सामान्य ज्ञान को हटाया जाना तथा न्यायिक सेवा में निवास प्रमाण पत्र की अनिवार्यता समाप्त किया जाना यह संकेत देता है कि नीतिगत स्तर पर हरियाणा के युवाओं के हितों की उपेक्षा की जा रही है।
इन संरचनात्मक प्रश्नों से भी अधिक गंभीर वे अनियमितताएँ हैं, जिनके कारण बार-बार न्यायालयों को हस्तक्षेप करना पड़ा है।
भर्ती प्रक्रिया के बीच नियमों में परिवर्तन, जैसे संस्कृत विषय की स्नातकोत्तर अध्यापक भर्ती में पैंतीस प्रतिशत का मापदंड लागू करना, किसी भी निष्पक्ष परीक्षा व्यवस्था के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है। प्रश्नपत्रों में नकल, पुराने प्रश्नों की पुनरावृत्ति और कई मामलों में सीधे-सीधे प्रश्नों की प्रतिलिपि होना केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सिविल सेवा, स्नातकोत्तर अध्यापक और महाविद्यालय अध्यापक जैसी प्रमुख भर्तियों तक फैला रहा है।
प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाएँ, चाहे वे सिविल सेवा परीक्षा से संबंधित हों या दंत शल्य चिकित्सक भर्ती से, आयोग की विश्वसनीयता को गहरा आघात पहुँचाती हैं। इसके अतिरिक्त लगभग प्रत्येक परीक्षा में गलत उत्तर कुंजी जारी होना और आपत्ति दर्ज कराने के नाम पर प्रति प्रश्न ढाई सौ रुपये की वसूली अभ्यर्थियों के आर्थिक और मानसिक शोषण का स्पष्ट उदाहरण है। इससे भी अधिक चिंताजनक वे प्रकरण हैं, जिनमें कम अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों का चयन हुआ और अधिक अंक प्राप्त करने वाले बाहर कर दिए गए। ऐसे अनेक उदाहरण चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।
आरक्षण और दिव्यांग कोटे के गलत क्रियान्वयन के मामले भी न्यायालयों तक पहुँचे हैं। यह दर्शाता है कि संवैधानिक प्रावधानों का पालन भी चयन प्रक्रिया में सुनिश्चित नहीं किया जा रहा। प्रशासनिक विकास सहायक जैसी भर्तियों में पद से संबंधित प्रश्न न पूछे जाने के कारण न्यायालय द्वारा पूरी भर्ती को निरस्त किया जाना इस बात का प्रमाण है कि समस्याएँ केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मूलभूत हैं।
इन सभी अनियमितताओं के बीच आयोग का यह दावा कि अभ्यर्थियों की शिकायतों और अभ्यावेदनों पर प्रभावी कार्रवाई की जाती है, वास्तविकता से कोसों दूर प्रतीत होता है। हिन्दी विषय की महाविद्यालय अध्यापक भर्ती में प्रश्नपत्र निरस्त होने और पुनः परीक्षा होने के बावजूद गलत और नकल किए गए प्रश्नों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। कई भर्तियों में दो बार आवेदन और दो बार शुल्क लिया गया, किंतु परीक्षा केवल एक ही बार करवाई गई। बार-बार लिखित और मौखिक शिकायतों के बावजूद आयोग की ओर से कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दिया गया।
दिव्यांग अभ्यर्थियों द्वारा आयोग, मुख्यमंत्री शिकायत प्रकोष्ठ तथा मुख्यमंत्री को लिखे गए पत्रों पर भी कोई कार्रवाई न होना इस दावे को और कमजोर करता है कि शिकायत निवारण व्यवस्था प्रभावी है। जब हर मामले में अभ्यर्थियों को न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाना पड़ता है, तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि आयोग की आंतरिक शिकायत निवारण प्रणाली वास्तव में किस हद तक कार्यशील है।
आयोग का तीसरा प्रमुख दावा यह है कि उसकी संपूर्ण प्रक्रिया सार्वजनिक क्षेत्र में उपलब्ध है। यदि वास्तव में ऐसा है, तो फिर उत्तर पुस्तिकाएँ क्यों नहीं दिखाई जातीं। आदर्श उत्तर कुंजी क्यों उपलब्ध नहीं करवाई जाती। चयन मानदंड को महीनों तक गोपनीय क्यों रखा जाता है। महाविद्यालय अध्यापक भर्ती में एक वर्ष तक चयन मापदंड न बताना और भर्ती पूर्ण होने के बाद भी उसे सार्वजनिक न करना पारदर्शिता नहीं, बल्कि मनमानी का उदाहरण है। सूचना के अधिकार के अंतर्गत बार-बार यह कहना कि विषय विचाराधीन है, सूचना के अधिकार की भावना का उपहास है।
लंबी न्यायिक लड़ाइयों के बाद जब संशोधित उत्तर कुंजी, चयनित अभ्यर्थियों का विवरण और सूचना आवेदन की रसीदें सार्वजनिक की जाती हैं, तो यह प्रश्न और अधिक गहरा हो जाता है कि यदि सब कुछ प्रारंभ से ही सार्वजनिक था, तो फिर यह जानकारी देने में इतना विरोध क्यों किया गया।
आयोग के अध्यक्ष के कथित अपमानजनक बयानों को लेकर यह कहना कि आरोप निराधार हैं, तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। भले ही बंद कमरे में प्रयुक्त भाषा का प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध न हो, किंतु परिणाम स्वयं बहुत कुछ कह देते हैं। अंग्रेज़ी विषय की महाविद्यालय अध्यापक भर्ती में छह सौ तेरह पदों के लिए केवल एक सौ इक्यावन अभ्यर्थियों का साक्षात्कार में उत्तीर्ण होना और अनेक विषयों में आधे से अधिक चयन अन्य राज्यों से होना यह दर्शाता है कि हरियाणा के युवाओं की योग्यता को लेकर शीर्ष स्तर पर गहरी पूर्वधारणाएँ विद्यमान हैं।
यह मानना कठिन है कि प्रत्येक परीक्षा में शोध उपाधि धारक, राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण, स्वर्ण पदक विजेता और विश्वविद्यालय स्तर के टॉपर अभ्यर्थी सामूहिक रूप से अयोग्य सिद्ध हो जाते हैं। डेढ़ सौ अंकों की परीक्षा में पैंतीस प्रतिशत अंक भी न आना, आरक्षित वर्ग की साठ सीटों में केवल एक का चयन होना और प्रत्येक भर्ती में पदों का रिक्त रह जाना — ये सब घटनाएँ किसी संयोग का परिणाम नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और प्रणालीगत समस्या की ओर संकेत करती हैं।
अब प्रश्न यह नहीं रह जाता कि आयोग की छवि को नुकसान पहुँचाया जा रहा है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या आयोग स्वयं अपनी कार्यप्रणाली से अपनी विश्वसनीयता को कमजोर कर रहा है। जब प्रत्येक परीक्षा के बाद वही विवाद, वही प्रश्न और वही न्यायालयीन हस्तक्षेप सामने आते हैं, तो आत्ममंथन की आवश्यकता और भी अधिक बढ़ जाती है।
इस पृष्ठभूमि में यह माँग पूरी तरह तर्कसंगत प्रतीत होती है कि हरियाणा लोक सेवा आयोग की कार्यप्रणाली की स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायिक जाँच करवाई जाए। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय की निगरानी में गठित एक स्वतंत्र समिति ही यह स्पष्ट कर सकती है कि समस्याएँ कहाँ हैं और उनके समाधान क्या हो सकते हैं। इसके साथ ही यह अपेक्षा भी स्वाभाविक है कि आयोग के नेतृत्व में ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति हो जो हरियाणा के युवाओं की सामाजिक वास्तविकताओं, आकांक्षाओं और संवैधानिक अधिकारों के प्रति संवेदनशील हों।
पारदर्शिता केवल प्रेस विज्ञप्ति जारी करने से सिद्ध नहीं होती, बल्कि निर्णयों, प्रक्रियाओं और परिणामों में दिखाई देनी चाहिए। हरियाणा के युवाओं को अब शब्दों में नहीं, बल्कि व्यवस्था में विश्वास चाहिए।





