ललित गर्ग
महाराष्ट्र में हाल ही में संपन्न शहरी निकाय चुनाव राज्य की राजनीति की दिशा, प्रवृत्ति और भविष्य का संकेत देने वाला एक बड़ा जनादेश बनकर सामने आए हैं। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में महायुति गठबंधन की ऐतिहासिक सफलता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि महाराष्ट्र की राजनीति अब एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। यह बदलाव केवल सत्ता के हस्तांतरण तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीतिक सोच, जन अपेक्षाओं और लोकतांत्रिक व्यवहार में गहरे परिवर्तन का द्योतक है। इन चुनावों ने जहां भगवा राजनीति की वैचारिक और संगठनात्मक शक्ति को नए सिरे से रेखांकित किया है, वही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सकारात्मक सोच एवं विकास की राजनीति को आगे बढ़ाया है। यह सफलता ऐसे समय में मिली है जब विधानसभा चुनावों में विपक्ष को करारी शिकस्त दिए जाने को अभी एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ था। इसके बावजूद राज्यव्यापी स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा नीत महायुति गठबंधन का दबदबा यह दर्शाता है कि यह जीत क्षणिक नहीं, बल्कि एक सुदृढ़ राजनीतिक प्रवाह का परिणाम है।
इन परिणामों ने राष्ट्र का ध्यान इसलिए अपनी ओर खींचा, क्योंकि इन चुनावों को मिनी विधानसभा चुनावों की संज्ञा दी गई थी।
दशकों तक शिवसेना के वर्चस्व का प्रतीक रहे बृहन्मुंबई नगर निगम, यानी बीएमसी में शिवसेना का दशकों पुराना किला ढ़ह गया, बीएमसी एवं राज्यभर के शहरी निकाय चुनाव में भाजपा का सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना एवं उसका दबदबा कायम होना, एक बड़े राजनीतिक बदलाव का सबसे सशक्त प्रमाण है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की राजनीतिक सोच और कार्यशैली इस पूरे परिदृश्य में एक निर्णायक कारक के रूप में उभरकर सामने आई है। फडणवीस ने महाराष्ट्र की राजनीति को केवल सत्ता संतुलन की सीमाओं में नहीं बांधा, बल्कि उसे दीर्घकालिक विकास दृष्टि से जोड़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रहे व्यापक राष्ट्रीय विकास कार्यक्रमों जैसे बुनियादी ढांचे का विस्तार, डिजिटल गवर्नेंस, पारदर्शिता, निवेश अनुकूल वातावरण और सुशासन को उन्होंने राज्य की आवश्यकताओं के अनुरूप जमीन पर उतारने का प्रयास किया है। उनकी राजनीति भावनात्मक उत्तेजना या तात्कालिक लोकप्रियता पर नहीं, बल्कि योजनाबद्ध विकास, प्रशासनिक दक्षता और भविष्य की तैयारी पर आधारित रही है। मुंबई से लेकर विदर्भ और मराठवाड़ा तक विकास की समान अवधारणा, शहरी-ग्रामीण संतुलन और रोजगार सृजन पर जोर उनकी सोच को प्रतिबिंबित करता है। इस महाविजय के पीछे फडणवीस की रणनीति के चार प्रमुख स्तंभ रहे हैं- हिंदुत्व और विकास का संतुलन, लोकल मुद्दों पर फोकस, विपक्ष पर प्रभावी जवाब और जनता के साथ जुडाव। यही कारण है कि स्थानीय निकाय चुनावों में जनता ने उन्हें केवल एक प्रशासक के रूप में नहीं, बल्कि एक दूरदृष्टा नेतृत्वकर्ता के रूप में स्वीकार किया है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ की जो राष्ट्रीय अवधारणा गढ़ी गई, देवेंद्र फडणवीस ने उसे महाराष्ट्र की राजनीतिक और प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, और यही दृष्टि महायुति की सफलता की वैचारिक रीढ़ बनती दिखाई देती है।
बीएमसी का महत्व केवल राजनीतिक प्रतीकात्मकता तक सीमित नहीं है। यह देश का सबसे धनी नगर निगम है, जिसका 2025-26 का बजट 74,427 करोड़ रुपये का है, जो कई छोटे राज्यों के बजट से भी अधिक है। इसीलिये बीएमसी शिवसेना का आर्थिक संबल थी, क्योंकि भ्रष्ट तौर-तरीकों के कारण नगर निकाय का पैसा उसके नेताओं के पास पहुंचता था। बीएमसी के इसी भ्रष्टाचार के कारण मुंबई अंतरराष्ट्रीय शहर के रूप में विकसित नहीं हो पा रही थी। ऐसे में बीएमसी पर नियंत्रण का अर्थ है नीतिगत प्राथमिकताओं, शहरी विकास की दिशा और संसाधनों के उपयोग पर निर्णायक प्रभाव। भाजपा नेतृत्व वाली महायुति की सफलता यह संकेत देती है कि आने वाले वर्षों में मुंबई का प्रशासनिक और विकासात्मक स्वरूप नए सिरे से गढ़ा जाएगा।
मुंबई को खराब सडकों, ट्रैफिक जाम और प्रदूषण से त्रस्त शहर की छवि से मुक्त करना भाजपा की पहली प्राथमिकता बननी चाहिए। इन चुनावों का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि दो दशक बाद ठाकरे परिवार से जुड़ी पार्टियां एकजुट होकर मैदान में उतरीं, फिर भी वे महायुति की लहर को रोकने में असफल रहीं। उद्धव ठाकरे की शिवसेना और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की प्रतीकात्मक एकता मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर सकी। इसी तरह शरद पवार और अजीत पवार के नेतृत्व वाले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के गुटों का पूणे में गठबंधन भी बुरी तरह विफल रहा। यह पराजय उन राजनीतिक परिवारों के लिए एक चेतावनी है, जिन्होंने लंबे समय तक राज्य की राजनीति में वर्चस्व बनाए रखा था।
इन परिणामों से यह स्पष्ट है कि महाराष्ट्र की जनता ने क्षेत्रीय संकीर्णता और पुराने नारों की बजाय विकास, स्थिरता और विश्वास की राजनीति को प्राथमिकता दी है। ‘मराठी मानुष’ जैसे भावनात्मक मुद्दे इस बार ज्यादा प्रभाव नहीं डाल सके। मतदाताओं ने यह संकेत दिया है कि वे अपनी आकांक्षाओं को केवल पहचान की राजनीति में सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि वे बेहतर बुनियादी ढांचे, पारदर्शी प्रशासन और भविष्य की स्पष्ट दृष्टि चाहते हैं। इन स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस की हाशिये पर मौजूदगी भी एक महत्वपूर्ण संकेत है। यह स्थिति कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का अवसर है। महाराष्ट्र जैसे बड़े और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य में उसकी कमजोर होती पकड़ यह सवाल उठाती है कि क्या पार्टी बदलते राजनीतिक परिदृश्य को समझने और उसके अनुरूप रणनीति बनाने में विफल हो रही है। महा विकास अघाड़ी गठबंधन के भविष्य पर भी इन परिणामों ने प्रश्नचिह्न लगा दिया है। इसके घटक दल पहले ही प्रासंगिक बने रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और यह पराजय उस संघर्ष को और कठिन बना देती है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ठाकरे और पवार जैसे परिवारों को अब अपनी राजनीति का पुनर्मूल्यांकन करना होगा।
केवल विरासत और अतीत की उपलब्धियों के सहारे राजनीति नहीं चलाई जा सकती। जनता अब जवाबदेही, परिणाम और स्पष्ट दिशा चाहती है। इसके विपरीत भाजपा ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह चुनाव जीतने का गणित अच्छी तरह समझ चुकी है। मजबूत बूथ मैनेजमेंट, कैडर आधारित संगठन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वैचारिक व सांगठनिक संबल उसकी सफलता की आधारशिला बने हैं। यही कारण है कि भाजपा न केवल अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकली, बल्कि कई स्थानों पर अपने सहयोगियों पर भी भारी पड़ी। इन चुनावों का व्यापक अर्थ केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। यह परिणाम राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी एक संकेत हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विश्वास, विकास और आश्वासन की राजनीति को जनता लगातार समर्थन दे रही है। यह राजनीति केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं, बल्कि जमीन पर बदलाव की अनुभूति कराती है।
अंधेरों के बीच रोशनी की किरण की तरह यह राजनीति आम नागरिक को यह विश्वास दिलाती है कि उसका भविष्य सुरक्षित हाथों में है। इससे राजनीतिक परिभाषाएं ही नहीं बदलीं, बल्कि इंसान की सोच में भी परिवर्तन आया है। मतदाता अब भावनात्मक उकसावे से अधिक ठोस उपलब्धियों और संभावनाओं को महत्व देने लगा है।
महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव इस बदलाव का सशक्त उदाहरण हैं। बड़े-बड़े दावे करने वालों के बोल ध्वस्त हुए हैं और विकास की राजनीति आगे बढ़ी है। जनता देश को एक नई दिशा, एक नए लोकतांत्रिक परिवेश और एक नई राजनीतिक संस्कृति में देखना चाहती है। यह संस्कृति केवल सत्ता परिवर्तन की नहीं, बल्कि शासन के तौर-तरीकों में बदलाव की मांग करती है। पारदर्शिता, जवाबदेही और परिणामोन्मुखी प्रशासन अब केवल नारे नहीं, बल्कि जन अपेक्षा बन चुके हैं। बीएमसी जैसे शक्तिशाली संस्थान में भाजपा का वर्चस्व न केवल मुंबई की सत्ता संरचना को बदलेगा, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति की धुरी को भी नए सिरे से परिभाषित करेगा। यह जीत बताती है कि लोकतंत्र में वही राजनीतिक ताकत टिकाऊ होती है, जो समय के साथ खुद को बदलने, जनता की नब्ज पहचानने और विकास को केंद्र में रखने का साहस रखती है। महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों ने इसी सच्चाई को एक बार फिर उजागर किया है।





