सुनील कुमार महला
हर साल 20 जनवरी को राष्ट्रीय पेंगुइन दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य पेंगुइन प्रजातियों और उनके प्राकृतिक आवासों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। यह दिन विशेष रूप से अंटार्कटिका में पेंगुइनों के वार्षिक प्रवास से जुड़ा है, जब वे सर्दियों के बाद अपने प्रजनन और भोजन क्षेत्रों की ओर लौटते हैं। यद्यपि इस दिवस की कोई आधिकारिक वार्षिक थीम नहीं घोषित होती, लेकिन इसका मूल संदेश हमेशा एक ही रहता है-‘पेंगुइनों और उनके आवास की रक्षा करें।’ पेंगुइन केवल आकर्षक और प्यारे दिखने वाले जीव नहीं हैं, बल्कि छोटे कान, छोटी गर्दन और कॉम्पैक्ट शरीर वाले ये पक्षी पृथ्वी के नाजुक पर्यावरण संतुलन के महत्वपूर्ण प्रहरी माने जाते हैं। समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य के संकेतक जीव होने के कारण पेंगुइनों का संरक्षण समुद्री जीवन के लिए अनिवार्य है। दुनिया भर में पेंगुइन की लगभग 18 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से अधिकांश दक्षिणी गोलार्ध और अंटार्कटिका क्षेत्र में रहती हैं, जबकि कुछ प्रजातियाँ गैलापागोस द्वीप, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के अपेक्षाकृत गर्म क्षेत्रों में भी देखी जाती हैं।
पेंगुइन उड़ नहीं सकते, लेकिन वे उत्कृष्ट तैराक होते हैं और पानी में तेज़ी से गोता लगाकर मछलियाँ पकड़ने में सक्षम हैं। वे जीवनभर एक ही साथी के प्रति वफादार रहते हैं और सामूहिक जीवन शैली अपनाते हैं। हालांकि, जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ के तेजी से पिघलने और समुद्र के तापमान में वृद्धि से उन्हें भोजन ढूंढने, अंडे देने और बच्चों को पालने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। दुनिया भर में पेंगुइनों की संख्या अनुमानित रूप से 2 करोड़ से 5 करोड़ के बीच है, लेकिन गैलापागोस और अफ्रीकी पेंगुइन जैसी कई प्रजातियाँ संकट में हैं और उनकी संख्या घटकर केवल हजारों में रह गई है।
भारत में पेंगुइन प्राकृतिक रूप से नहीं पाए जाते, क्योंकि भारतीय जलवायु उनके प्राकृतिक जीवन के अनुकूल नहीं है। हालांकि, संरक्षण और शिक्षा के उद्देश्य से मुंबई के वीरमाता जीजाबाई भोसले उद्यान और ओडिशा के नंदनकानन प्राणी उद्यान में मुख्यतः हम्बोल्ट पेंगुइन रखे गए हैं। पेंगुइन का काला-सफेद ‘टक्सीडो’ रंग शिकारियों से बचाव के लिए प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली (काउंटर-शेडिंग) है। इनके पास सुप्राऑर्बिटल ग्रंथि होती है, जो समुद्री पानी का अतिरिक्त नमक शरीर से निकाल देती है। कुछ प्रजातियाँ साथी को आकर्षित करने के लिए चिकना पत्थर भेंट करती हैं, जबकि इनके मुँह में दाँत नहीं होते, लेकिन जीभ और ऊपरी हिस्से में पीछे की ओर मुड़े कँटीले उभार मछली पकड़ने में मदद करते हैं।
जेंटू पेंगुइन लगभग 36 किमी प्रति घंटे की गति से तैर सकते हैं, जबकि एम्परर पेंगुइन लगभग 1,850 फीट गहराई तक गोता लगाकर 20 मिनट तक साँस रोक सकते हैं। पेंगुइन साल में एक बार ‘कैटास्ट्रॉफिक मोल्ट’ से गुजरते हैं, जब उनके सभी पंख झड़ जाते हैं और वे कई सप्ताह तक भोजन नहीं कर पाते। अत्यधिक ठंड के बावजूद, माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी ये जीवित रहते हैं, इसके पीछे उनके घने पंख, प्राकृतिक इंसुलेशन, विशेष ब्लड सर्कुलेशन सिस्टम और सामूहिक हडलिंग बिहेवियर का योगदान है। यहां यदि हम हडलिंग बिहेवियर की बात करें तो पेंगुइन का हडलिंग व्यवहार प्रकृति में टीमवर्क और उत्तरजीविता (सर्वाइवल) का एक बेजोड़ उदाहरण है। जब अंटार्कटिका में तापमान शून्य से काफी नीचे गिर जाता है और बर्फीली हवाएं चलती हैं, तो हजारों एम्परर पेंगुइन एक-दूसरे से सटकर एक विशाल घेरा बना लेते हैं। इस झुंड के केंद्र में तापमान इतना अधिक बढ़ जाता है कि बाहर की कड़ाके की ठंड के बावजूद अंदर मौजूद पेंगुइन खुद को पसीने जैसी गर्मी में महसूस करते हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह समूह स्थिर नहीं रहता; पेंगुइन बहुत ही धीमी गति से एक ‘लहर’ की तरह चलते रहते हैं, जिससे बाहर की कतार में खड़े पेंगुइन धीरे-धीरे अंदर की ओर आते हैं और अंदर वाले बाहर की ओर जाते हैं।
यह निष्पक्ष प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि समूह के हर सदस्य को ठंड से बचने के लिए गर्मी मिल सके। इस सामाजिक तालमेल के बिना, अकेले रहने पर एक पेंगुइन अपनी ऊर्जा बहुत जल्दी खो देता और उसके जीवित रहने की संभावना न के बराबर होती।बहरहाल, पाठकों को बताता चलूं कि अंटार्कटिका में केवल एम्परर और एडेली पेंगुइन पाए जाते हैं, जबकि चिनस्ट्रैप, जेंटू और मैकरोनी पेंगुइन अंटार्कटिक प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में प्रजनन करते हैं। किंग पेंगुइन उप-अंटार्कटिक द्वीपों में पाए जाते हैं और गैलापागोस पेंगुइन भूमध्य रेखा के पास रहने वाली एकमात्र प्रजाति है।
निष्कर्षतः, राष्ट्रीय पेंगुइन दिवस हमें यह याद दिलाता है कि पेंगुइन जैसे संवेदनशील और अद्भुत पक्षियों का संरक्षण केवल एक प्रजाति की रक्षा नहीं है, बल्कि समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र, जैव-विविधता और पृथ्वी के प्राकृतिक संतुलन को बचाने की वैश्विक जिम्मेदारी भी है।





