डॉ नीलम महेंद्र
हाल ही में जयपुर के एसएमएस और उसके संबद्ध अस्पतालों में की गई रिसर्च में यह बात सामने आई है कि मनुष्यों में एंटीबायोटिक दवाओं का असर 57% से 90% तक कम हो गया है। कुल 9776 मरीजों पर की गई रिसर्च में पता चला कि इनमें से एक भी मरीज ऐसा नहीं था जिसे एंटीबायोटिक का 60% भी असर हुआ हो। इन सभी के शरीर में एंटीबायोटिक्स के प्रति 60% से 98% तक रेजिस्टेंस आ गया है। जिन एंटीबायोटिक्स का असर बिल्कुल खत्म हो गया है उनमें सिप्रोफ्लाक्सासिन, एरोथ्रोमाइसिन, डॉक्सिसाइकिलिन, एमपीसीलिन जैसे ब्रॉड स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक ( एक ऐसा एंटीबायोटिक जो कई तरह के बैक्टीरिया खासकर ग्राम पॉजिटिव और ग्राम नेगेटिव दोनों प्रकार के जीवाणुओं पर असर करता है) शामिल हैं जो अपने आप में अत्यंत चिंताजनक है। दरअसल यह इन एंटीबायोटिक के अत्यधिक प्रयोग का साइड इफेक्ट है।
एलोपैथिक दवाओं के साइड इफेक्ट इतने पर ही सीमित नहीं हैं। अब धीरे धीरे यह बात सामने आने लगी है कि लगभग हर अंग्रेजी दवा का कोई न कोई साइड इफेक्ट होता ही है। हालांकि हर दवा कंपनी दवा की पैकिंग के समय उसके उपयोग से होने वाले दुष्प्रभावों के बारे में एक पर्ची में सारी जानकारी देती है लेकिन फिर भी जब से एलोपैथी अस्तित्व में आई,उसकी दवा से मिलने वाले तात्कालिक राहत को देखते हुए अधिकांश लोगों का झुकाव उसकी ओर होता चला गया। लेकिन पिछले कुछ समय से इस प्रकार की रिसर्च और रिपोर्टें लोगों को सोचने के लिए विवश कर रही है। खास तौर पर सोशल मीडिया के इस डिजिटल दौर में जब कोई भी सूचना क्षण भर में आम हो जाती है, तो आम आदमी भी खास जानकारी से युक्त हो के जागरूक हो जाता है।
नतीजन आज विश्व भर में लोग स्वस्थ्य रहने के लिए प्रकृति, आयुर्वेद, प्राणायाम और योग की ओर लौट रहे हैं।
यही कारण है कि आयुर्वेद, जो कि एक प्राचीन भारतीय चिकित्सा विज्ञान है,वर्तमान में सम्पूर्ण विश्व को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। आज यह न केवल भारत बल्कि दुनिया भर के लोगों को स्वस्थ जीवन जीने के साथ साथ कई जानलेवा बीमारियों से लड़कर पुनः स्वस्थ होने की राह दिखा रहा है।
दअरसल आधुनिक जीवन शैली के परिणाम स्वरूप आजकल लोगों को कम उम्र में ही मधुमेह, उच्च रक्तचाप और मोटापा जैसे रोग हो रहे हैं। लेकिन इन परिस्थितियों में जब अंग्रेजी दवाइयों के दुष्प्रभाव सामने आने लगे हैं, तब जनमानस में एक सुखद बदलाव यह देखने को मिल रहा है कि अब वे अंग्रेजी दवाइयों का सहारा लेने के बजाए अपनी दिनचर्या में बदलाव लाकर इन बीमारियों से बचने के लिए प्राकृतिक आहार विहार को अपनाकर स्वस्थ होने पर बल दे रहे हैं। खास तौर पर कोरोना महामारी के दौरान जिस प्रकार लोग आयुर्वेद के साधारण घरेलू नुस्खों से अपनी इम्युनिटी बढ़ाकर इस जानलेवा बीमारी से लड़कर खुद को बचाए रखने में कामयाब रहे उसने विश्व भर में आयुर्वेद की लोकप्रियता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का काम किया।
परिणाम स्वरूप 2023 तक वैश्विक आयुर्वेद बाजार का आकार लगभग12.9 बिलियन डॉलर आ गया था और यह 2030 तक 76.91 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जो 27.2% की वार्षिक वृद्धि दर को दर्शाता है।
आयुर्वेद के बढ़ते प्रभाव का एक प्रमाण यह भी है कि भारत के आयुष मंत्रालय और विश्व स्वास्थ्य संगठन के बीच पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को प्रोत्साहित करने और उनके वैज्ञानिक आधार को मजबूत करने के लिए 2023 में एक समझौता किया गया। इसका उद्देश्य सम्पूर्ण विश्व में आयुर्वेद की स्वीकार्यता और विभिन्न रोगों के उपचार में आयुर्वेद की प्रभावशीलता को देखते हुए तकनीकी प्रमाण आधारित आयुर्वेदिक उत्पादों का विकास करना है।
दरअसल आज भारत ही नहीं विश्व के विभिन्न शोध संस्थान आयुर्वेद के चिकित्सीय लाभों और इसके औषधीय उपयोगों पर व्यापक अनुसंधान कर रहे हैं।
तुलसी, सर्पगन्धा,अश्वगंधा, गिलोय, नीम, आँवला, हल्दी जैसे पौधों पर किए गए वैज्ञानिक अनुसंधानों के परिणामों ने विश्व भर के वैज्ञानिकों को अचंभित किया है। इन आयुर्वेदिक औषधियों पर रिसर्च करने पर यह बात सामने आई कि ये साधारण पौधे या वनस्पतियाँ नहीं हैं बल्कि औषधीय गुणों की खान हैं। ये सिर्फ मानव शरीर ही नहीं मन पर भी अपना औषधीय प्रभाव डालती हैं।
यही कारण है कि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की बात हो या मानसिक तनाव कम करने की बात हो, शरीर को स्वस्थ रखना हो या फिर युवा रखना हो, आज लोग इन बातों के लिए आयुर्वेद का सहारा ले रहे हैं।
गौरतलब है कि वर्तमान दौर में आयुर्वेद केवल चिकित्सा के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि सौंदर्य और पोषण उत्पादों के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण एवं अग्रणी भूमिका में आ चुका है। असल में आज दुनिया भर के लोग एलोपैथिक दवाइयों के साइड इफेक्ट और और विभिन्न हानिकारक केमिकल से युक्त सौंदर्य प्रसादनों के दुष्प्रभावों से त्रस्त हो चुके हैं। शायद इसलिए जिन्हें लोग पहले जड़ी बूटी कहकर नकार देते थे आज वे हर्बल और नेचुरल या फिर प्राकृतिक उत्पादों के रूप में लोगों की पहली पसन्द बन चुके हैं। नतीजन इन हर्बल उत्पादों की मांग घरेलू के साथ साथ वैश्विक उपभोक्ताओं के बीच भी तेजी से बढ़ रही है। आज वैश्विक स्तर पर भारत ही नहीं बल्कि चीन, जापान और यूरोपीय देशों में भी आयुर्वेदिक उत्पादों और सेवाओं की बढ़ती मांग, आयुर्वेद की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है।
दरअसल विभिन्न वैज्ञानिक अनुसंधानों ने आयुर्वेद को विज्ञान की कसौटी पर मानव स्वास्थ्य के लिए खरा साबित किया है। क्योंकि कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी में जब आधुनिक चिकित्सा पद्धति में खतरनाक रेडिएशन और केमोथेरेपी का सहारा लिया जाता है तो मरीज के शरीर की कैंसर कोशिकाओं को नुकसान पहुँचने के साथ साथ शरीर की स्वस्थ कोशिकाएँ भी नष्ट हो जाती हैं। इससे मरीज को बेहद शारिरिक पीड़ा एवं वेदना से गुजरना पड़ता है। इतना ही नहीं बल्कि स्वस्थ होने के बाद भी दीर्घ काल तक रेडिएशन और केमोथेरेपी के साइड इफेक्ट का सन्ताप भी झेलना पड़ता है। वहीं रिसर्च में हल्दी और गिलोय जैसी आयुर्वेदिक औषधियों में कैंसर-रोधी गुण पाए गए हैं।
खास बात यह है कि आयुर्वेद पर किए गए प्रयोगों के इस प्रकार के नतीजों से उत्साहित वैज्ञानिक अब आयुर्वेदिक औषधियों को आधुनिक तकनीकों, जैसे नैनो टेक्नोलॉजी और बायोटेक्नोलॉजी, के साथ जोड़ रहे हैं।
आज जब पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों गंभीर संकट के दौर से गुजर रहे हैं, आयुर्वेद एक प्रभावी समाधान के रूप में उभर कर आया है। क्योंकि यह न केवल गम्भीर से गम्भीर बीमारियों का उपचार प्रदान कर रहा है, बल्कि मानव को प्रकृति के साथ जोड़ रहा है, उसे प्रकृति के करीब ला रहा है।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि आयुर्वेद केवल चिकित्सा पद्धति नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का विज्ञान है। दिन ,रात सर्दी, गर्मी, बरसात, समय के इस बदलते चक्र के साथ, प्रकृति के बदलते रंग के साथ, अपनी दिन चर्या, आहार विहार, खान पान में बदलाव लाकर, प्रकृति के साथ मानव शरीर का सामंजस्य बनाने का विज्ञान।
आज जब विश्व आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों के दुष्प्रभावों और सीमाओं का सामना कर रही है, भारत का हज़ारों साल पुराना चिकित्सा विज्ञान आयुर्वेद एक नई उम्मीद के रूप में उभर रहा है। भारतीय योग परम्परा के बाद आयुर्वेद की यह वैश्विक स्वीकार्यता भारत के गौरवशाली और समृद्ध अतीत का प्रमाण है।
डॉ नीलम महेंद्र, लेखिका पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय में हिंदी सलाहकार समिति की सदस्य हैं।





