डिजिटल अरेस्ट… आसान है ठगों को आईना दिखाना

Digital Arrest… It's Easy to Show the Mirror to Thugs

डॉ. सुभाष गुप्ता

मर्ज बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की… सरीखे अंदाज में डिजिटल अरेस्ट एक ऐसा अपराध बन गया है, जो तमाम सरकारी प्रयासों के बाद भी बढ़ता जा रहा है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल स्टेटस रिपोर्ट में जहां इस तेजी से पैर पसारते अपराध से निपटने के प्रयासों का जिक्र किया गया है, वहीं इस गंभीर अपराध पर रोक लगाने की योजना बनाने में समय लगने की बात भी कही है। डिजिटल अरेस्ट से बचाने की सरकारी योजनाओं, पुलिस और मीडिया के जागरुकता लाने के तमाम प्रयासों के बावजूद इस अपराध का बेकाबू होते जाना यूं ही नहीं है, कई तरह की मानवीय कमजोरियां, सामाजिक ताना-बाना और इंसानी स्वभावों की भिन्नता इस संगीन अपराध की जड़ों को मजबूत बना रही है।

दरअसल, डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली ठगी से खुद को खुद ही बचाया जा सकता है, लेकिन यह इतनी सी बात भर नहीं है। इसे समझने के लिए खुद को समझना जरूरी है और उससे भी ज्यादा जरूरी है अपने ऊपर विश्वास करना। यकीन मानिये कि इस अपराध से बचने के लिए कुछ खास करने की आवश्यकता ही नहीं है, बस कुछ सामान्य सी बातों का ध्यान रखकर डिजिटल अरेस्ट का जाल फेंकने वालों को आईना दिखाया जा सकता है।

डिजिटल अरेस्ट क्या होता है? ये सवाल उतना ही पुराना है, जितना कि ये अपराध। ये अपराध शुरु होने से पहले लोग इस शब्द युगम को नहीं जानते थे। सच कहें, तो डिजिटल अरेस्ट जैसा कुछ होता ही नहीं, ये बस आभासी दुनिया से जुड़ा शब्दों का एक जोड़ा भर है, जिसका हकीकत से कोई वास्ता नहीं । कानून की किसी किताब में डिजिटल अरेस्ट करने का कोई प्रावधान नहीं है। जिस तरह की गिरफ्तारी का कोई प्रावधान नहीं है, उसके नाम पर लोगों को ठगा जा रहा है। रोजाना ऐसी वारदातें हो रही हैं। लोग अपनी खून पसीने की कमाई के लाखों से लेकर करोडों रुपये तक उस गिरफ्तारी के डर से गंवा रहे हैं, जो कि कहीं होती ही नहीं।

ये हमारे देश का सच है कि कोई विभाग किसी की डिजिटल गिरफ्तारी नहीं कर सकता, लेकिन इसके बावजूद लोग डिजिटल अरेस्ट का झांसा देने वाले ठगों के जाल में क्यों फंस जाते हैं? इसे समझने के लिए इस अपराध के पीछे मनोवैज्ञानिक,सामाजिक और व्यक्तित्व/स्वभाव से जुड़े कारणों को समझना जरुरी है।

इस अपराध की बुनियाद आम तौर से एक फोन कॉल से पड़ती है। यह सामान्य मोबाइल कॉल, व्हाट्सएप कॉल या वीडियो कॉल हो सकती है। यह कॉल हमेशा किसी अंजान नंबर से आती है। कॉल से साथ फोटो या वीडियो भी हो सकता है, जो अक्सर किसी वर्दीधारी व्यक्ति का होता है। कॉल करने वाला खुद को पुलिस, किसी केंद्रीय एजेंसी या नियामक एजेंसी से जुड़ा बताकर ड्रग्स, रेप, देश विरोधी गतिविधियों में आपके आधार से जुड़े मोबाइल के उपयोग, बेटा या बेटी के किसी संगीन अपराध में पकड़े जाने जैसी प्राय: काफी लोगों के दिमाग को सुन्न कर देने वाली जानकारी देकर भय का जाल बिछाता है और अपने शब्दों से संभावित शिकार पर पड़ने वाले असर को बाखूबी जांचते परखते हुए जाल को टाईट करता चला जाता है। इस क्रम में कई फर्जी अधिकारियों से भी बात करायी जाती है और कभी कभी कोर्ट रूम या किसी थाने या पुलिस मुख्यालय जैसे सीन क्रिएट करके बैक ग्राउंड में दिखाये जाते हैं, ताकि शिकार बनने वाला व्यक्ति ठगों के शब्दों को सच मानने की गलती कर सके।

यह सच है कि इस अपराध से जुड़ी ये सामान्य सी दिखने वाली जानकारियां डिजिटल अरेस्ट रूपी जाल से बचने की गारंटी बन सकती हैं। विपरीत परिस्थितियों में एकदम घबरा जाने वाले लोग इस तरह के ठगों के लिए बहुत मुफीद होते हैं। किसी अपराध से जुड़े होने की बात सुनते ही अनिष्ट की आशंका उन्हें तर्क वितर्क से दूर कर देती है और घबराहट में जो व्यक्ति सामने दिखाई दे रहा है, उसे ही वे अपना हितैषी मानने की गलती कर देते हैं।

ऐसे लोग अक्सर सामने वाले के नाटक को सच मान लेते हैं और सिर पर बड़ा खतरा मंडराने, जेल जाने या जमाने में बदनाम हो जाने के झूठे भय के जाल की रचना करने वाले को उसके आत्मविश्वास, धाराप्रभाव उस विषय पर बोलने, वर्दी आदि पहने होने और थोड़ी हमदर्दी दिखाने भर से सच्चा और अपना हितैषी मान लेने की प्रवृत्ति इस अपराध में आसानी से फंसा सकती है।

ऐसी ठगों का फोन आते ही जिनके दिल और दिमाग पर भय इस कदर हावी हो जाता है कि वे सब कुछ भूल जाते हैं। यहां तक कि जिस देश में लाखों असली मुकदमें साल दर साल तारीखों में उलझे हों, वहां फोन या वीडियो कॉल पर तत्काल किसी मामले की सुनवाई और निस्तारण जैसा छल भी उन्हें वास्तविक लगने लगता है।

इसका एक बड़ा कारण आसपास के माहौल से खुद को दूर रखना भी है। देश और समाज की घटनाओं से अंजान रहने वाले, किसी पर एकदम भरोसा कर लेने वाले और अपने सुख दुख दूसरों के साथ शेयर न करने वाले व्यक्ति इन ठगों का ज्यादा शिकार बनते हैं। रिटायर्ड होने के बाद देश दुनिया से मुंह मोड़ लेना जीने को कोई ऐसा तरीका नहीं है, जो जीवन को निरापद और सुकून वाला बना सकता हो। शतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर छुपा लेना, अपनी सुरक्षा को खतरे में डालने वाला कार्य होता है। डिजिटल अरेस्ट से बचने के लिए जमाने के साथ कदमताल करना जरूरी है।

खुशहाल जिंदगी जीने का सामान्य सा तरीका है कि कोई भी नई समस्या सामने आने पर अपने परिजनों या दोस्तों के साथ उस पर चर्चा कर ली जाये। जिस तरह की समस्या पहले कभी सामने नहीं आई, उससे अपने बूते अकेले और तुरंत निपटने का आत्मविश्वास इस ठगी से बचा भी सकता है और सामने वाले को सही मान बैठें, तो यही आत्मविश्वास ठगी का कारण भी बन सकता है… फोन काट दिया, तो बच गये, सामने वाले पर भरोसा कर लिया तो लुट गये।

इन ठगों से बचना है, तो खुद पर दृंढ विश्वास रखना जरूरी है। आसपास की दुनिया से खबरदार रहना और किसी अंजान पर विश्वास करके एकदम कोई कदम उठाने के बजाय उस विषय पर अपने परिजनों, दोस्तों आदि किसी से भी चर्चा कर लेने में समझदारी है। अन्यथा बाद में नुकसान उठाने के साथ ही शर्मिंदगी का भी सामना करना पड़ सकता है। यकीन मानिये, ये ठग आपसे ज्यादा समझदार नहीं होते, बस आपकी कोमल भावनाओं का लाभ उठाने वाले ऐसे धूर्त होते हैं, जो सरलता, आसानी से विश्वास कर लेने और मीठा बोलने वालों को सच्चा मान लेने की मानव सुलभ प्रकृति को इस अपराध की बुनियाद बनाते हैं।