ऋतुपर्ण दवे
कभी लगता है कि ट्रम्प तानाशाह हैं, कभी लगता है कि तुनकमिजाज। शायद अमेरीका वासियों को भी अब ट्रम्प को समझ पाना मुश्किल हो रहा होगा। उन्हें चुनते वक्त भी ऐसा अंदाजा हरगिज नहीं रहा होगा। लेकिन, इतना तो समझ आ रहा है कि अपनी दूसरी पारी में ट्रम्प दुनिया में सबसे अलग करने की नीयत से हर वो काम करने पर आमादा हैं जिससे उनकी चर्चा और धमक बनी रहे। हो सकता है कि वो ऐसा कुछ करें भी जिससे वो हीरो या विलेन कुछ तो बन जाएं। लेकिन लगता नहीं कि वो कभी अमेरीका के आदर्श राष्ट्र प्रमुखों में गिने जाएंगे!
उनका दर्द जब-तब उनके बयानों से झलकता भी है। शांति के नोबल पुरुस्कार की होड़ में मात खाने के बाद ट्रम्प एकाएक अशांतिपूर्ण हरकतों पर उतारू हो गए। उनकी टीस इसी बात से समझ आती है कि इस पुरुस्कार के लिए खुद अपनी पैरवी करने वाले ट्रम्प ने नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर को चिट्ठी लिख नोबेल नहीं मिलने की शिकायत तक कर दी। साथ ही यह भी लिखा कि कि 8 जंग रुकवाने के बावजूद उन्हें नोबेल नहीं मिला इसलिए उन्होंने अब शांति के बारे में सोचना छोड़ दिया है। शांति जरूरी है, लेकिन अब वह यह भी सोचेंगे कि अमेरिका के हित में क्या सही है। ग्रीनलैंड पर जबरन कब्जा की उनकी नीयत और कोशिशों की एक वजह नोबेल शांति पुरस्कार न मिलने की खीझ भी स्पष्ट समझ आती है।
रूस और चीन के खतरे की दुहाई देकर ट्रम्प नाटो सदस्य डेनमार्क के ग्रीनलैंड को हथियाने का जो दंभ भर रहे हैं, उसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों और नाटो की एकता के साथ ही वैश्विक शांति के लिए गंभीर खतरा माना जा रहा है। ट्रम्प की जिद कहें या दादागिरी यह उनका दुनिया का तानाशाह बनने जैसा ही कदम कहलाएगा। देर-सबेर इसका खामियाजा अमेरीका ही भुगतेगा क्योंकि वैश्विक मंच पर दुनिया का दारागो कहलाने वाले मजबूत देश की विश्वसनीयता कमेगी।
ग्रीनलैंड की जिद पर दुनिया भर में शांति के पक्षधर लोगों की समझाइश का भी ट्रम्प पर कोई असर न पड़ना मामले को गंभीर बनाता है। ग्रीनलैंड में 1979 से स्व-शासन है। उसकी विदेश और रक्षा नीति नाटो संगठन का सदस्य देश डेनमार्क देखता है। ग्रीनलैंड डेनमार्क का अर्ध-स्वायत्त भाग है। ग्रीनलैंड और डेनमार्क सरकारों ने भी हमेशा कहा है कि ग्रीनलैंड न कभी पहले बिकाऊ था न आज है। नाटो देश भी कभी नहीं चाहेंगे कि कोई दादागिरी कर कब्जा कर ले। खुद यूरोपीय देश फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, स्वीडन, डेनमार्क और इटली ने भी ट्रम्प के बयान की आलोचना की है। इतना ही नहीं बल्कि सामूहिक तौर पर जवाब देने की बात भी कह ट्रम्प को चेताया तक है। इससे ट्रांसअटलांटिक संबंध भी कमजोर होंगे। ट्रम्प की नीयत तो अपने पहले ही कार्यकाल में ग्रीनलैंड को खरीदने की थी जो तब भी पूरी नहीं हो पाई।
आठ यूरोपीय देशों डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, नीदरलैंड और फिनलैंड पर टैरिफ की धमकी को ये देश ट्रम्प का ब्लैकमेल, समझ से परे और अनुचित बता रहे हैं। ट्रम्प की हरकतों से यूरोप और अमेरिका के सुरक्षा सहयोग संगठन नाटो के भविष्य पर भी प्रश्न चिन्ह दिख रहा है। खुद 80 प्रतिशत अमरीकी भी नहीं चाहते कि ग्रीनलैंड अमेरिका का हिस्सा बने क्योंकि इससे नाटो में दो फाड़ होगी जिसका फायदा चीन और रूस जैसे अमेरिका विरोधियों को मिलेगा।
ऐसा भी नहीं है कि यूरोपीय संघ यानी ईयू ट्रम्प के लगाए गए टैरिफ का जवाब देने में पीछे है। ईयू 27 यूरोपीय देशों का राजनीतिक और आर्थिक संगठन है। इसमें ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, बुल्गारिया, क्रोएशिया, साइप्रस, चेक गणराज्य, डेनमार्क, एस्टोनिया, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, ग्रीस, हंगरी, आयरलैंड, इटली, लातविया, लिथुआनिया, लक्जमबर्ग, माल्टा, नीदरलैंड, पोलैंड, पुर्तगाल, रोमानिया, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, स्पेन और स्वीडन शामिल हैं। इन सभी देशों का रुख अमेरिका पर ट्रेड पाबंदियां लगाने का है जिस पर वो गंभीरता से विचार कर रहे हैं। जबकि इनका लक्ष्य सदस्य देशों के बीच शांति, समृद्धि और स्थिरता को बढ़ावा देना है। ऐसी स्थिति में नाटो देश भी अमेरिका की मुखालफत करेंगे। हालांकि ईयू एक खास कानूनी हथियार के इस्तेमाल की सोच रहा है, जिसे ‘ट्रेड बाजूका’ कहते हैं। इसका मकसद उन देशों के खिलाफ कड़ा कदम उठाना है, जो यूरोपीय देशों पर जबरदस्ती आर्थिक दबाव बनाने की कोशिश करते हैं। ईयू सांसद अमेरिका के साथ हुए ट्रेड एग्रीमेंट की मंजूरी रोकने की तैयारी में भी हैं। जाहिर है इससे दो पक्षीय नहीं बल्कि बहुपक्षीय तनाव बढ़ना ही है जिसमें अमेरिका के विरोध में कई होंगे। इन सबके लिए जिम्मेदार ट्रम्प ही होंगे।
ट्रम्प की मौजूदा सनक की वजह ग्रीनलैंड है जो सैन्य रणनीतिक लिहाज से बेहद खास है। यह उत्तर अमेरिका और यूरोप के मध्य अटलांटिक महासागर के बीचों-बीच होने से मिड-अटलांटिक क्षेत्र में है। यहां से यूरोप और रूस के बीच सैन्य और मिसाइल निगरानी आसान है। हालांकि यहां अमेरिका का थुले एयर बेस पहले से है, जो मिसाइल चेतावनी और रूसी-चीनी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए जरूरी है। आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की गतिविधियां बढ़ने से चिंतित अमेरिका ग्रीनलैंड पर वर्चस्व पाकर भू-राजनीतिक पकड़ मजबूत करना चाहता है। दूसरी ओर ग्रीनलैंड में दुर्लभ खनिज, तेल, गैस और रेयर अर्थ एलिमेंट्स के बड़े भंडार हैं। ये भविष्य की विशाल आर्थिक और तकनीकी सम्पदा है। अभी चीन का इन उत्पादों पर 70 से 90 प्रतिशत नियंत्रण है। यह निर्भरता अमेरीका कम करना चाहता है। वही भूमंडलीय ऊष्मीकरण यानी ग्लोबल वार्मिंग के चलते आर्कटिक की बर्फ पिघल रही है, जिससे नए जलपोत मार्ग खुल रहे हैं। जब ग्रीनलैंड अमेरीका का होगा तो निश्चित तौर पर वह रूस-चीन की बढ़त रोकने में मददगार होगा। इसीलिए ट्रम्प ग्रीनलैंड को अमरीकी सुरक्षा का फ्रन्ट लाइन मानते हैं।
अब ट्रम्प की नीयत चाहे जो वो उनका अंर्तमन ही जाने लेकिन क्या नोबल का शांति पुरुस्कार मिलता तो भी ट्रम्प ऐसा करते? अब यह ट्रम्प का बाल हठ है या राज हठ, वही जानें फिलाहाल ट्रम्प दुनिया में खुद को तमाशा जरूर बना रहे हैं। देखना उनका खेल कब तक चलेगा?
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)





