प्रेम प्रकाश
नए साल के आरंभ के साथ देश के राजनीति में कई तरह के परिवर्तन के संकेतों पर सबका ध्यान है। किसी की नजर में इस वर्ष असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव महत्वपूर्ण है, तो कोई इन सबको बिहार चुनाव के बाद देश की राजनीति के धुर दक्षिणायन होने की प्रबल संभावना के तौर पर देख-परख रहा है। वैसे इन सब चर्चाओं और विश्लेषणों में तात्कालिक सियासि रोमांच ज्यादा है। ज्यादा गहराई और धैर्यपूर्ण विवेक से देखें तो मौजूदा सदी के ढाई दशक में देश की राजनीति, सरकारों की प्राथमिकताओं में कुछ बड़े और असरदार बदलाव दिखे हैं। इनमें सबसे अहम है विकास और बुनियादी सरोकारों से जुड़े जमीनी बदलाव को लेकर होने वाले प्रयास और उसके साथ उभरे नायक ।
इसमें कहीं दो मत नहीं कि खासतौर पर बीते एक दशक में देश की राजनीति और विकासवादी एजेंडे के अक्षांश और देशांतर को सबसे ज्यादा प्रभावित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया है। विरासत और विकास के विजन के साथ वर्ष 2047 तक विकसित भारत के निर्माण का उनका संकल्प केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं में तो स्थान पा ही रहा है, इससे भविष्य की ओर सकारात्मकता के साथ देखने की रचनात्मक प्रवृति भी देश में विकसित हुई है। अलबत्ता इस दौरान जो एक एक और बात भारतीय राजनीति और समाज पर गहरी छाप छोड़ने में सफल रही है, वह है मौजूदा सदी में भारत के संघीय ढांचे में केंद्र के साथ राज्यों की विकास दृष्टि और चरित्र में आया बड़ा परिवर्तन। अच्छी बात यह है कि ये परिवर्तन जहां एक तरफ टिकाऊ विकास की सीध में आगे बढ़ा है, वहीं इससे जमीनी स्तर पर काम करने की गंभीर समझ भी बनी है। आज अगर हरियाणा, राजस्थान से लेकर बिहार, ओड़ीशा और मध्य प्रदेश के अपने विकास मॉडल राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हैं तो यह बदलते भारत की एक ऐसी दास्तान है, जिसका ढांचा केंद्रीय न होकर विकेंद्रित है।
बात करें अकेले बिहार की तो जीविका से लेकर जल-जीवन-हरियाली तक कई ऐसे इनिशिएटिव्स हैं, जिसने अन्य राज्यों के साथ केंद्र को भी इस तरह की बड़ी पहल के लिए प्रोत्साहित किया। दिलचस्प है कि बीते कम से कम चार दशक में देश में राजनीति और सत्ता परिवर्तन के जितने भी उलट-फेर हुए हैं, उसका या तो केंद्र बिहार रहा है, या फिर उसके सियासी सूत्र यहां से जुड़े रहे हैं। इसलिए देश में राजनीतिक मुहावरे में अक्सर बिहार को राजनीतिक प्रयोग की भूमि कहा भी जाता रहा है। हाल में संपन्न विधानसभा चुनाव के बाद बिहार की प्रयोगधर्मा धरती एक बार फिर नए सियासी प्रयोग को लेकर चर्चा में है। इस चर्चा का अहम पक्ष विकास और राजनीति का पब्लिक कनेक्ट है। सोशल मीडिया और डेटा ड्रिवेन नैरेटिव के दौर में जमीनी जुड़ाव और लोक संपर्क के बूते बदलाव और विकास के सीध में बढ़ने का विवेक असाधारण है।
भूले नहीं हैं लोग कि बीते वर्ष जब बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी गठजोड़ और दूसरे कई कृत्रिम मुद्दों को लेकर खूब बातें हो रही थी तो उस बीच नीतीश कुमार प्रगति यात्रा पर थे। इस बात पर आज हक तरफ व्यापक सहमति है कि पारंपरिक ढर्रेदार चुनावी विमर्श में यह यात्रा एक बड़ा मोड़ और मास्टरस्ट्रोक है। बिहार के अनुभवी मुख्यमंत्री को इस बात की दाद मिलनी चाहिए कि यह सब वे बिना किसी सियासी हड़कंप और शोर-शराबे के कर गुजरे । प्रगति यात्रा के कारण जो बड़ा फर्क सामने आया उसमें सबसे अहम हैं वे 23 जिले, जहां नीतीश ने तटबंध सुदृढ़ीकरण से लेकर कनेक्टिविटी सुधार तक विकास का पूरा रोडमैप सरकार के साथ समाज के भी सामने रखा। इसके साथ ही प्रदेश विकास कार्यों का एक जिलेवार ब्लूप्रिंट तैयार हुआ, जिन पर कैबिनेट स्वीकृति के साथ हाथोंहाथ राशि आवंटन और कार्यारंभ भी हुआ।
इस यात्रा के सियासी मायने और असर को भांपने के लिए इस बात की तार्किक स्वीकृति भी जरूरी है कि लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर राजनीति का चाहे जो भी दौर रहा है, उसमें पीपल कनेक्ट का तोड़ औऱ विकल्प अब भी नदारद है। देश के राजनीतिक दिग्गजों की जमात में नीतीश कुमार ऐसे वाहिद राजनेता हैं, जो रोडशो वाली राजनीति के दौर में भी सीधे जनता के बीच पहुंचने की राह पर हैं। महात्मा गांधी से लेकर अब तक देश के राजनीतिक इतिहास में जो कुछ बड़े कंगूरे अब भी स्थापित हैं, वे इसी तरह की यात्राएं रही हैं, जो जनता और राजनीति को आमने-सामने नहीं, बल्कि एक सीध में लाकर खड़ी करती रही हैं। नतीश की राजनीति और विचारधारा सामाजवादी रही है। जनता के सवालों पर जनता की राजनीति करने की उनकी समझ अब भी डिगी नहीं है।
गौरतलब है कि 2005 से अब तक उन्होंने कम से कम 15 यात्राएं की हैं। 2005 की न्याय यात्रा से लेकर मौजूदा प्रगति यात्रा तक उन्होंने बिहार की राजनीति और उसके प्रगतिशील लक्ष्यों को नए पर्याय दिए हैं, नए मानक दिए हैं। इन यात्राओं में कुछ के नाम को देखें तो यह समझ में आता है कि नकारात्मक राजनीति के दौर में यह एक सकारात्मक पहल भी है। एक ऐसी पहल जो किसी राज्य के मुखिया को सुशासन का चेहरा तक बनाने का दमखम रखता है। राजनीतिक और चुनावी प्रबंधन के जोर पर चुनावी समर फतह करने का मंसूबा बेचने वाले रणनीतिकारों के पास भी अब तक इस तर्क का तोड़ नहीं है कि जनता के बीच राजनीतिक स्वीकृति के तत्काल को समकाल और देशकाल के बीच कैसे स्थिर किया जाए।
बिहार के मुख्यमंत्री की यात्राएं प्रदेश के लिहाज से एक बदले यथार्थ के बीच एक के बाद एक हुई है। इस यथार्थ की पृष्ठभूमि यह रही है कि आजादी के बाद से भारत में गांव और गरीब की बड़ी सच्चाई के कारण नीति निर्माताओं पर इस बात का लगातार दबाव रहा कि वे देश में गरीब कल्याण का एक बड़ा रोडमैप सामने रखें। पर दुर्भाग्य से इस दिशा में कुछ ठोस नहीं हो सका। खासतौर पर जोड़-तोड़ और अल्पावधि की सरकारों के दौर में देश में विकास का लोक कल्याणकारी एजेंडा पीछे छूटता गया।
अब जब देश और खासतौर पर बिहार जैसे सूबों में योजनागत सफलताओं का नया दौर शुरू हुआ है तो यह तथ्य मजबूती से उभरा है कि सेवा, सुशासन और गरीब कल्याण के विजन के साथ बीमारू प्रदेश कहे जाने वाले सूबों की राजनीति काफी आगे बढ़ी है। नीति आयोग की पिछले साल आई बहुचर्चित रिपोर्ट इस बात की तथ्यात्मक गवाही है। यह रिपोर्ट बताती है कि खासतौर पर बिहार और यूपी में बड़े पैमाने पर लोगों का जीवन गरीबी के कुचक्र से न सिर्फ बाहर आया है, बल्कि इस दौरान देश में आजीविका और बेहतर जीवन के लिए नई अनुकूलताएं पैदा हुई हैं। देश के प्रधानमंत्री जब देश-विदेश में इस रिपोर्ट के हवाले के साथ देश में 2013-14 से 2022-23 के बीच 24.82 करोड़ लोगों के गरीबी से बाहल निकलकर देश में नए मध्यवर्ग के उदय की बात कहते हैं, तो वे कहीं न कहीं बिहार-यूपी जैसे सूबों में बड़े सामाजिक परिवर्तन का साक्ष्य रखते हैं।
अकेले बिहार की बात करें तो इस दौरान बिहार में 3.77 करोड़ लोग गरीबी के दुष्चक्र से बाहर आए हैं। नीतीश की प्रगति यात्रा के साथ बिहार में रोजगार और आमदनी में बढ़त की नई जो नई अनुकूलताएं और संभावनाएं पैदा हो रही हैं, वे राज्य के चुनावी साल में पॉलिटिकल मास्टरस्ट्रोक तो है ही, यह सोशल चेंज औऱ रिफॉर्म का भी नया उभार साबित होने जा रहा है।
सारे सियासी शोर-शराबे के बीच वे विकास और पब्लिक कनेक्ट की राजनीति पर उनका भरोसा बीते दो दशक से अडिग बना हुआ हैं। नकारात्मकता और प्रतिस्पर्धा से भरी राजनीति के दौर में यह सकारात्मक राजनीति का एक स्वस्थ संकेत है। यह संकेत जहां एक तरफ लोगों की आशा और भरोसा पर खरे उतरने की है, वहीं दूसरी तरफ यह समाजवादी राजनीति का समकालीन पदचाप भी है।
अब जबकि 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर नीतीश बिहार में बदलाव की जमीन और ज्यादा उर्वर करने में लगे हैं तो इसके लिए एक बार उन्होंने जनता के बीच जाने का फैसला लिया है। वे मकर संक्रांति के बाद यानी 16 जनवरी से समृद्धि यात्रा पर हैं। यह यात्रा दशकों तक गरीबी और अभाव से जूझते बिहार में आई समृद्धि को और विपुल और व्यापक करने की है। इस यात्रा का जो स्वरूप तय किया गया है उसके मुताबिक इसका मकसद तमाम विकास योजनाओं की समीक्षा और जनता से सीधा संवाद करना है। माना जा रहा है कि इस दौरान लगभग 50,000 करोड़ रुपए की 430 परियोजनाओं की प्रगति की जमीनी समीक्षा होगी और उसके आधार पर भविष्य के लिए इसके कार्यरूप पर भी हाथ के हाथ निर्णय लिए जाएंगे। इस दौरान होने वाले जनसंवाद में वे जीविका बहनें भी शामिल रहेंगी, जिनके बूते बिहार ने देश में महिला आजीविका और सशक्तीकरण का एक बड़ा मॉडल खड़ा किया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि लोकतंत्र में जनता के बीच विकास के मुद्दे पर चर्चा और निर्णय लेने की इस तरह की पहल का मूल्यांकन बगेर किसी पूर्वाग्रह के सकारात्मक मकसद से हो।





