अमन-शांति, सुरक्षा और प्रगति के लिए आपसी संवाद ज़रूरी है!

Mutual dialogue is necessary for peace, security and progress!

प्रो जसीम मोहम्मद

पिछले दिनों गत शुक्रवार को, मुझे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपालजी को सुनने का अवसर मिला। उन्होंने स्पष्ट रूप से इस बात पर ज़ोर दिया कि हिंदू-मुसलमानों के बीच आपसी संवाद का मकसद मुसलमानों को आरएसएस के नज़रिए को मानने के लिए बाध्य करना नहीं है, बल्कि उनकी चिंताओं और कठिनाइयों को ईमानदारी से समझना है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारतीय समाज की संवाद- परंपरा यह मानती है कि हर तर्क में कुछ सचाई होती है। आपस में सिर्फ़ एक-दूसरे पर आरोप लगाने या अलग-अलग पक्षों द्वारा सांप्रदायिक उन्माद की घटनाओं का उल्लेख करने से कुछ हासिल नहीं होता। उन्होंने यह उल्लेख किया कि सांप्रदायिक तनाव की असली जड़ “दूसरों को अलग-थलग करने” में है, जबकि समावेशी स्वरूप में समाज को एकजुट करने की शक्ति है। उन्होंने कहा कि सांप्रदायिक घटनाएँ कारण नहीं, बल्कि लक्षण हैं। हिंदुओं से भी शिकायतें हैं, उनमें भी कमियाँ है, जिन्हें ईमानदारी और पारदर्शिता से दूर किया जाना चाहिए। उन्होंने सवाल किया कि असल में युवा पेशेवरों को कौन कट्टरपंथी बनाता है? उन्होंने चेतावनी दी कि चरमपंथी घटनाओं के बाद, अक्सर निर्दोष मुसलमानों को गलत तरीके से निशाना बनाया जाता है – जैसे किराए आदि पर उन्हें घर देने से मना करना या पेशेवर जाँच। इनसे अविश्वास और गहरा होता है और अनसुलझी ऐतिहासिक शिकायतें फिर से उभर आती हैं। यह मानते हुए कि ज़्यादातर मुसलमान राष्ट्रवादी हैं, उन्होंने कहा कि कुछ लोग इस पहचान को खुले तौर पर ज़ाहिर करने में हिचकिचाते हैं। इस अवसर पर बोलते हुए श्री कृष्णगोपाल जी ने जवाहरलाल नेहरू के सन् 1948 ई. में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करने के आह्वान को याद किया। उन्होंने यह कहते हुए बात खत्म की कि इतिहास को सिर्फ़ मिटाया नहीं जा सकता। संवाद में हिस्सा लेनेवाले सिर्फ़ उत्प्रेरक का काम कर सकते हैं। सच्ची सद्भावना तभी पैदा होगी जब हिंदू और मुसलमान दोनों ईमानदारी और आपसी सद्भावना के साथ आगे आएँगे।

डॉ. कृष्ण गोपालजी का यह विचार स्वाभाविक रूप से हमें एकता के अर्थ के बारे में एक बड़े और ज़्यादा स्थायी सवाल की ओर ले जाता है। अगर संवाद का मकसद “दूसरों को अलग-थलग करने” को कम करना और शक की जगह समझ पैदा करना है, तो एकता को विश्वास की समानता या तौर-तरीकों की एकरूपता के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता। इसके बजाय, इसे अलग-अलग धर्मों, विचारों और जीवन जीने के तरीकोंवाले लोगों की गरिमा और आपसी सम्मान के साथ एक साथ रहने की क्षमता के रूप में समझा जाना चाहिए।

एकता का मतलब ज़रूरी नहीं कि सभी के लिए एक जैसा साझा विचार/प्रार्थना/जीवनशैली हो, बल्कि इसका मतलब है कि हर किसी को यह समझ हो कि जो लोग उनसे अलग सोचते हैं/काम करते हैं और रहते हैं, उनके साथ शांति और आपसी सम्मान से कैसे रहा जाए! इसका एक उदाहरण भारत जैसे देश का है, जहाँ कई अलग-अलग धर्म, संस्कृति, भाषाएँ और रीति-रिवाज साथ-साथ मौजूद हैं। हम भारतीयों के लिए समग्र रूप से एकता की भावना के माध्यम से अपने रिश्ते को मज़बूत करना महत्वपूर्ण है, जिससे देश में शांति बनी रहे। समाज में आपसी एकता की कमी से छोटे-मोटे मतभेद गंभीर चिंता या झगड़ों में बदल सकते हैं। इसके विपरीत, अगर लोगों के बीच आपसी एकता और समन्वय का मज़बूत रिश्ता हो, तो वे छोटे-बड़े मतभेदों को समझदारी और इज़्ज़त के साथ सुलझा पाएँगे। भारत का इतिहास यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि सामाजिक विविधता कोई कमज़ोरी नहीं है। हज़ारों सालों से इस देश ने अलग-अलग धर्मों और विचारों का स्वागत किया है। हिंदू धर्म, इस्लाम, ईसाई धर्म, सिख धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म और कई दूसरी परंपराएँ यहाँ फली-फूली हैं और रोज़मर्रा की ज़िंदगी, खाने-पीने, कपड़ों, भाषा और मूल्यों में एक-दूसरे को प्रभावित किया है। यह साझा सभ्यता और संस्कृति का सफर साबित करता है कि भारत में साथ रहना ज़बरदस्ती नहीं है; यह स्वाभाविक है।

एकता और आपसी सम्मान पर यह ज़ोर राष्ट्रीय नेतृत्व के सबसे ऊंचे स्तर पर भी दिखता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार इस बात पर बल दिया है कि भारत की वास्तविक शक्ति हर नागरिक को धर्म की पूरी आज़ादी देने में है। उन्होंने साफ कहा है कि हर व्यक्ति को बिना किसी ज़बरदस्ती या दबाव के अपनी पसंद का धर्म मानने, बनाए रखने या अपनाने का पूरा-पूरा अधिकार है। साथ ही, उन्होंने मज़बूती से कहा है कि किसी भी धार्मिक समूह को – चाहे वह बहुसंख्यक हो या अल्पसंख्यक – खुलेआम या चुपके से नफ़रत फैलाने या सामाजिक सद्भाव को ज़हर देने का कोई अधिकार नहीं है। यह संतुलित तरीक़ा, जो धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है और नफ़रत और बंटवारे के खिलाफ एक साफ लाइन खींचता है, संवैधानिक मूल्यों और सभ्यता की नैतिकता में निहित शासन के दर्शन को दिखाता है। आस्था की स्वतंत्रता और सांप्रदायिक भड़कावे के लिए ज़ीरो टॉलरेंस दोनों पर ज़ोर देकर, प्रधानमंत्री ने लगातार अंतर-धार्मिक सद्भाव को शांति, राष्ट्रीय एकता और भारत की लंबी अवधि की प्रगति के लिए एक ज़रूरी स्तंभ के रूप में बढ़ावा दिया है।

सामाजिक समरसता और आपसी सद्भाव को बढ़ावा देने की इसी भावना के साथ आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी भारत में अलग-अलग विभिन्न समुदायों के बीच एकता और सम्मान की आवश्यकता के विषय में बात की है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया है कि सामाजिक सद्भाव भारत की एकता और अखंडता की नींव है। हमें विविधता को बाँटना नहीं चाहिए, बल्कि अलग-अलग धर्मों और पृष्ठभूमि के लोगों के बीच आपसी संबंधों को और भी मज़बूत करना चाहिए। भागवत ने सभी समुदायों के लोगों से सद्भावना के साथ मिलकर रहने का आग्रह किया है, यह देखते हुए कि सामूहिक सद्भावना और समझ ने भारतीयों को अलग-अलग मान्यताओं और प्रथाओं के बावजूद शांति से एक साथ रहने में मदद की है।

यहाँ यह विचारणीय है कि सच्ची शांति का मतलब है कि लोग अपनी पहचान में सुरक्षित महसूस करें। इसका मतलब है कि माता-पिता को अपने बच्चों के लिए डर न हो, पड़ोसी एक-दूसरे पर भरोसा करें और सभी समुदाय स्वयं को सम्मानित महसूस करें। अंतरधार्मिक सद्भाव, शक को कम करके और उसकी जगह समझ पैदा करके सुरक्षा की यह भावना पैदा करता है। जब लोग एक-दूसरे से बात करते हैं, तो डर धीरे-धीरे स्वत: समाप्त हो जाता है। लगातार तनाव के माहौल में उन्नति या प्रगति नहीं हो सकती। जब समुदाय बँटे होते हैं, तो विकास के बजाय संघर्ष में ऊर्जा बर्बाद होती है। इसलिए स्कूल प्रभावित होते हैं, व्यवसाय हिचकिचाते हैं, और शासन कमजोर होता है। अंतर-धार्मिक सद्भाव समाज को पहचान को लेकर अंतहीन विवादों में फँसने के बजाय असली मुद्दों – शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और इनोवेशन – पर ध्यान केंद्रित करने की अनुमति देता है।

आज, अंतरधार्मिक बातचीत की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा है। सोशल मीडिया सच से ज़्यादा तेज़ी से अफवाहें फैलाता है। आधी-अधूरी जानकारी और भावनात्मक संदेश अक्सर धार्मिक भावनाओं को निशाना बनाते हैं, जिससे गुस्सा और बंटवारा होता है। बातचीत एक इलाज के उपकरण के रूप में काम करती है। जब लोग आमने-सामने मिलते हैं, धैर्य से सुनते हैं, और ईमानदारी से सवाल पूछते हैं, तो झूठी कहानियों की ताकत खत्म हो जाती है। भारत की विविधता को कभी भी कंट्रोल करनेवाली समस्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक खजाना है जिसकी रक्षा करनी है। भारत में हर धर्म ने करुणा, सेवा, बलिदान, धैर्य और न्याय जैसे मूल्यों को सिखाया है। जब मूल्यों को एक साथ लाया जाता है और उन पर चर्चा की जाती है, तो लोगों को काफी हद तक पता चलता है कि उनमें क्या समानताएँ हैं। अंतर-धार्मिक बातचीत अक्सर सिर्फ़ मतभेदों को बताने के बजाय समान नैतिक मूल्यों को बताएगी। इसके अलावा, कई लोग गलती से मानते हैं कि अंतरधार्मिक भागीदारी से किसी की धार्मिक पहचान कमजोर होती है। असल में, इसका उल्टा सच है। जब कोई दूसरे धर्म को समझता है, तो उसके अपने विश्वास ज़्यादा साफ़ और मज़बूत हो जाते हैं। बातचीत सहमति की मांग नहीं करती; यह सम्मान की मांग करती है। एक आत्मविश्वासी धर्म बातचीत से खतरा महसूस नहीं करता।

ऐतिहासिक दस्तावेज़ एवं घटनाक्रम हमें दिखाते हैं कि सांप्रदायिक सद्भाववाले सह-अस्तित्व को विभिन्न प्रयासों से बनाए रखना चाहिए, न कि इसे अपने आप बन जाने की अपेक्षा के लिए छोड़ देना चाहिए। अगर संबंधित सभी पक्षों के बीच आपसी रचनात्मक बातचीत का कोई भी अवसर उपलब्ध नहीं है, तो इसके कारण और अधिक गलतफहमियाँ पैदा होंगी। इसलिए, यह ज़रूरी है कि धार्मिक नेता, विद्वान और आम जनता एक-दूसरे के साथ नियमित बातचीत और संवाद करें; यह किसी भी गलतफहमी को बड़े बँटवारे या दरार में बदलने से रोकने में सहायता मिल सकती है। एक शांतिपूर्ण और एकजुट समाज लोकतंत्र को मज़बूत करता है। लोकतंत्र केवल चुनावों से ही नहीं, बल्कि नागरिकों के बीच आपसी समझ और सम्मान से भी जीवित रहता है। जब लोगों को लगता है कि उनके धर्म और पहचान का सम्मान किया जाता है, तो वे राष्ट्र के सामाजिक जीवन में ज़्यादा सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। इसलिए, अंतरधार्मिक सद्भाव लोकतांत्रिक स्थिरता और राष्ट्रीय अखंडता का समर्थन करता है।

युवा लोग अपने आस-पास के सामाजिक परिवेश से बहुत अधिक प्रभावित होते हैं। अगर बच्चे नफ़रत और शक देखते हुए बड़े होते हैं, तो वे उन भावनाओं को भविष्य में भी ले जा सकते हैं। दूसरी ओर, अगर वे बातचीत, सहयोग और आपसी सम्मान देखते हैं, तो वे समझदारी सीखते हैं। अंतरधार्मिक पहल, युवाओं को एक मज़बूत संदेश देती हैं कि असहमति का मतलब दुश्मनी नहीं होती है। धार्मिक नेताओं का नैतिक प्रभाव समाज में संस्थानों से कहीं ज़्यादा दूर तक पहुँचता है। उनके शब्द मन को शांत कर सकते हैं या भावनाओं को भड़का सकते हैं। जब धार्मिक नेता एक साथ बैठकर शांति, संयम और राष्ट्रीय ज़िम्मेदारी के बारे में बात करते हैं, तो इससे समाज को बहुत भरोसा मिलता है। ऐसे पल नागरिकों को याद दिलाते हैं कि आस्था को इंसानियत का मार्गदर्शन करना चाहिए, न कि उसे बाँटना का कार्य करना चाहिए।

नागरिक समाजिक संगठन के बीच पुल बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं। ‘इंटरफेथ हार्मनी फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया’ जैसे प्लेटफॉर्म सुरक्षित जगह बनाते हैं, जहाँ बिना ग़ुस्से के मुश्किल से मुश्किल बातचीत हो सकती है। यह मंच अमूर्त आदर्शों को असली जुड़ाव में बदलते हैं, जिससे सद्भाव सिर्फ़ एक नारा नहीं, बल्कि एक जीवित अभ्यास बन जाता है। बातचीत समाजों को ऐतिहासिक ज़ख्मों से निपटने में भी मदद करती है। हर समुदाय दर्द, अन्याय या नुकसान की यादें रखता है। इन यादों को नज़रअंदाज़ करने से वे ठीक नहीं होतीं। अंतरधार्मिक बातचीत के ज़रिए लोग किसी पर दोष डाले बिना एक-दूसरे को समझना सीख सकते हैं। वे सहानुभूति और एक-दूसरे के दर्द को स्वीकार करके ठीक हो सकते हैं।

आपसी मेलजोल बनाने और उसे बढ़ाने की प्रक्रिया सिर्फ़ कॉन्फ्रेंस, सरकारी अधिकारियों और दूसरों की मीटिंग से ही नहीं होती, बल्कि किसी समुदाय में, स्कूलों और बिज़नेस में और दूसरों के साथ आपसी बातचीत से भी होती है। जब लोग दूसरों के त्योहार और ख़ास दिन मनाते हैं, संकट के समय अपने पड़ोसियों का साथ देते हैं, उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सहयोग और सहायता करते हैं, तो इससे लोगों और समुदायों के बीच एक विश्वास और भरोसा क़ायम होता है। ये सभी बहुत छोटे-छोटे प्रयास हैं, जो पब्लिक फोरम पर स्पीच देने से कहीं ज़्यादा मायने रखते हैं। कुछ कानून पास करके और सरकारी नीतियाँ लागू करके राष्ट्रीय एकता स्थापित करना संभव नहीं है। हालाँकि कानून और नीतियाँ अहम भूमिका निभाएँगी, लेकिन सच्ची राष्ट्रीय एकता तभी होगी, जब लोग एक-दूसरे को जानेंगे और उन पर भरोसा करेंगे। अलग-अलग संस्कृतियों के बीच यह रिश्ता बनाने के लिए इंटरफेथ डायलॉग या बातचीत एक बुनियाद देगी। जब कोई संस्कृति जानी-पहचानी होती है, तो उससे जुड़ा डर कम हो जाता है।

आज दुनिया भारत को इस आधार पर देखती है कि वह अपने धर्मों के बीच कितनी अच्छी तालमेल और किस तरह एकता बना पाता है। अगर भारत अपने सभी धार्मिक समूहों के बीच शांति और समझ का माहौल बनाने में कामयाब होता है, तो इस कदम से भारत को नि:संदेह अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिलेगा। शांति और प्रगति के लिए एकता की पहल भारत के सह-अस्तित्व, बातचीत और नैतिक नेतृत्व के मूल्यों को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता को दिखाती है। ‘इंटरफेथ हार्मनी फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया’ जैसे पुराने संस्थानों ने ऐसी जगहों के तौर पर अहम भूमिका निभाई है, जहाँ लोग बातचीत कर सकते हैं, विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं और एक-दूसरे के साथ अपने विश्वास को साझा कर सकते हैं। इन जगहों का काम टकराववाले तर्कों के बजाय सम्मानजनक, गरिमापूर्ण बातचीत के महत्वपूर्ण अवसर उपलब्ध करवाना है।

अलग-अलग नज़रियों के साथ जुड़ने का महत्व, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे समूहों के नज़रिए भी शामिल हैं, तब और बढ़ जाता है, जब दोनों पक्ष संवैधानिक सिद्धांतों को बनाए रखने और पूरे भारत में एकता को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध रहते हैं। यह ज़रूरी नहीं है कि कोई एक पक्ष अपनी विचारधारा छोड़ दे, बल्कि आपसी बातचीत के ज़रिए शांति हासिल करने के लिए एक साथ मिलकर काम करे। आपसी एकता का चुनाव करना साहस का काम है। जहाँ एक जैसी सोचवाले लोगों के बीच बात करना आसान है, वहीं अलग-अलग सोचनेवालों की बात सुनना ज़्यादा मुश्किल है। राष्ट्र निर्माण का काम तब शुरू होता है, जब हम अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलते हैं और टकराव के बजाय बातचीत का रास्ता चुनते हैं। शांति और प्रगति के लिए आपसी एकता भारत के नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए आवश्यक पक्ष है। विविधता ने भारत की आत्मा को आकार दिया है और सद्भाव उसकी रक्षा करता है। जब भारत एकता का मार्ग चुनता है, तो वह शांति को चुनता है। जब वह शांति चुनता है, तो प्रगति अपने आप होती है। बातचीत, सम्मान और साझा ज़िम्मेदारी के ज़रिए, इस चयन की प्रक्रिया को लगातार-निरंतर दोहराना होगा। संवाद की यह प्रक्रिया और बातचीत का यह प्रयास हमारी सामाजिक एकता और समरसता के लिए आवश्यक टूल की तरह प्रमाणित हो सकता है।