बेरोज़गार नवयुवक संघ का सरस्वती पूजा प्रबंधन

Saraswati Puja Management by Unemployed Youth Association

विनोद कुमार विक्की

शिक्षा से निष्कासित और विद्या से कोसों दूर समाज के कुछ युवकों के लिए वसंत पंचमी कोई साधारण तिथि नहीं, बल्कि वार्षिक ‘स्वरोज़गार योजना’ का शुभारंभ होती है। इन्हें इस दिन की प्रतीक्षा उसी बेसब्री से रहती है, जैसे रेलवे में वेटिंग टिकट पर सफ़र कर रहे यात्री को कन्फ़र्मेशन की और एग्ज़िट पोल से प्रफुल्लित नेता जी को अंतिम चुनाव परिणाम घोषित होने की। माघ महीने का आगमन होते ही मुहल्ले में नवयुवक क्लब वैसे ही उग आते हैं, जैसे नगर निगम की नज़र बचाकर कुकुरमुत्ते या परित्यक्त सरकारी आवास में पीपल का पौधा।

ये माता सरस्वती के ऐसे मौसमी भक्त होते हैं, जिनका शिक्षा और संस्कार से उतना ही घनिष्ठ संबंध होता है, जितना नेताजी का चुनावी घोषणापत्र के क्रियान्वयन से। वर्ष भर माता-पिता और गुरुजनों के सम्मान में कंजूसी करने वाले इन युवकों का समूह वसंत पंचमी आते ही वीणापाणि के अनन्य सेवक बन जाता है। पढ़ाई-लिखाई से आजीवन परहेज़ रखने वाले ये भक्त तन और मन से माता शारदे की पूजा-पंडाल व्यवस्था में ऐसा कौशल दिखाते हैं कि बड़े-बड़े प्रबंधन संस्थान भी पीछे रह जाएँ। और जहाँ इनका तन-मन लगता है, वहाँ ‘स्वेच्छिक सहयोग’ के नाम पर धन का स्वतः प्रवाह शुरू हो जाता है—चाहे देने वाला स्वेच्छा से दे या विवशता से।

सरस्वती पूजा के नाम पर इन भक्तों की कार्यकुशलता अद्भुत होती है। चंदा वसूली, पंडाल निर्माण, डेकोरेशन, प्रसाद वितरण और हिसाब-किताब में इनका कौशल किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट से कम नहीं होता—बस फ़र्क इतना है कि अंकेक्षण-रहित हिसाब हमेशा गोल-मोल रहता है। पूरे वर्ष निठल्ला घूमने वाले इन युवकों की व्यस्तता वसंत पंचमी के पखवाड़े में मार्च क्लोज़िंग से प्रभावित सार्वजनिक क्षेत्र के बैंककर्मियों की तरह बढ़ जाती है।

माता के आवाहन से लेकर स्थापना, सजावट, डीजे, प्रसाद और विसर्जन तक का दायित्व इन्हीं के जिम्मेदार कंधों पर टिका होता है। पूजा से पूर्व आयोजित बैठक में सर्वसम्मति से कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए जाते हैं—जैसे पंडाल कितना भव्य होगा, डीजे में भोजपुरी गाना बजेगा या बॉलीवुड सांग, ध्वनि कितनी दूर तक सुनाई देगी, प्रसाद वितरण का क्षेत्रफल कितने वर्गमीटर तक फैला होगा, निमंत्रण कार्ड किस काग़ज़ पर छपेंगे और मुहल्ले के धन्ना सेठ से लेकर राष्ट्रीय राजमार्ग पर दौड़ते बस-ट्रक चालकों से कितना चंदा ‘वसूल’ किया जाएगा।

रंगारंग कार्यक्रम और विसर्जन के दौरान डीजे पर उदारतापूर्वक खर्च किया जा सके, इसके लिए प्रसाद और पूजा सामग्री में कटौती की जाती है। यथा संभव पंडित जी का दान-दक्षिणा बच जाए युट्यूब पर मंत्रोच्चारण की प्रक्रिया पूर्ण कर मितव्ययिता के सिद्धांत का पालन किया जाता है।

संपूर्ण सप्ताह माता की सेवा भक्ति से उत्पन्न थकान को मिटाने के लिए कुछ भक्त समुदाय विसर्जन के समय अल्कोहल की व्यवस्था भी कर लेते हैं। बिना अल्कोहल, द्विअर्थी भोजपुरी गीतों या बेसिर-पैर के रैप सांग पर कमर-तोड़ नृत्य की कल्पना करना व्यावहारिक प्रतीत नहीं होता।

गौरतलब है कि इस पूरी प्रक्रिया में इन्हें न तो कोई अपराध-बोध होता है, न ही पाप का भय। इनके अनुसार “माता शारदे की जय” का एक ज़ोरदार उद्घोष समस्त अनैतिक कर्मों पर धार्मिक ब्लीच का काम कर देता है। रही बात माता की, वो तो दयालु ठहरी। बच्चों की भूल और गलतियों को क्षमा करना ही तो उनका धर्म है।

बहरहाल चंदा वसूली से प्रतिमा विसर्जन तक सरस्वती पूजन महोत्सव के बहाने समाज के निठल्ले, बेरोज़गार युवाओं द्वारा कुशल आर्थिक एवं सामयिक प्रबंधन, शारीरिक सक्रियता और सामाजिक उत्तरदायित्व का यथोचित निर्वहन सहर्ष ही देखने को मिल जाता है।