डॉ विक्रम चौरसिया
भारत की स्वतंत्रता केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या और बलिदान की अमर गाथा है। अनगिनत क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों ने हँसते–हँसते फाँसी का फंदा चूमा, काला पानी की अमानवीय यातनाएँ सहीं और मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया।
भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आज़ाद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल और रानी लक्ष्मीबाई जैसे महापुरुषों के त्याग के कारण ही भारत आज स्वतंत्र, स्वाभिमानी और लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में विश्व पटल पर खड़ा है।भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत और सनातन सभ्यता है। इस भूमि ने संसार को शून्य, योग, आयुर्वेद, वेद, गणित, खगोल विज्ञान और अहिंसा जैसे अमूल्य उपहार दिए हैं। आज जब विश्व युद्ध, जलवायु संकट, असहिष्णुता और नैतिक पतन जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है, तब मानवता को केवल तकनीकी प्रगति नहीं, बल्कि विवेक, संतुलन और करुणा की आवश्यकता है,और यही भारत की आत्मा है। इसी कारण आज एक बार फिर विश्व आशा भरी दृष्टि से भारत की ओर देख रहा है।सच्चा राष्ट्र निर्माण केवल आर्थिक विकास से नहीं होता, बल्कि चरित्र, नैतिकता और सामाजिक समरसता से होता है। हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहिए जो केवल डिग्रियाँ नहीं, बल्कि जिम्मेदार, संवेदनशील और राष्ट्रनिष्ठ नागरिक तैयार करे। ऐसी शिक्षा जो युवाओं को रोजगार के साथ–साथ सेवा, कर्तव्य और संविधान के प्रति प्रतिबद्धता की चेतना भी दे।भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा आबादी है। दुनिया का सबसे युवा देश होने के नाते भारत पर वैश्विक नेतृत्व की ऐतिहासिक जिम्मेदारी है। हमारे युवाओं को विज्ञान, अंतरिक्ष, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रक्षा, कृषि तकनीक और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में अग्रणी बनना होगा। किंतु उससे भी अधिक आवश्यक है कि वे ईमानदार, अनुशासित, संवेदनशील और राष्ट्रभक्त बनें,क्योंकि बिना चरित्र के विकास, कोई भी प्रगति स्थायी नहीं हो सकती।
किसान भारत की आत्मा हैं। जिस मिट्टी से अन्न उगता है, वही राष्ट्र को जीवन देती है। “जय जवान, जय किसान” केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का उद्घोष है। सीमा पर तैनात सैनिक और खेत में पसीना बहाता किसान दोनों मिलकर राष्ट्र की सुरक्षा और समृद्धि सुनिश्चित करते हैं।
श्रमिक, कारीगर, उद्यमी और छोटे व्यापारी हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। उनके परिश्रम से आत्मनिर्भर भारत का स्वप्न साकार होता है। वहीं नारी शक्ति भारत की चेतना है। जब महिलाएँ सशक्त होती हैं, तब समाज सुरक्षित, समावेशी और समृद्ध बनता है।
हालाँकि, यह भी सत्य है कि आज़ादी के अमृतकाल में भी कुछ नालायक, भ्रष्ट और कर्तव्यविहीन अधिकारी एवं जनप्रतिनिधि अपने निजी स्वार्थ के लिए राष्ट्र की छवि को धूमिल कर रहे हैं। जब सत्ता और पद सेवा का माध्यम न बनकर भ्रष्टाचार और अहंकार का साधन बन जाते हैं, तब लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होने लगती हैं। ऐसे तत्व केवल व्यवस्था को नहीं, बल्कि ईमानदार नागरिकों की आशा और विश्वास को भी आघात पहुँचाते हैं।
आज आवश्यकता है कि ईमानदार अधिकारियों, कर्मठ जनप्रतिनिधियों और कर्तव्यनिष्ठ नागरिकों को संरक्षण और सम्मान मिले, तथा भ्रष्टाचार के विरुद्ध शून्य सहिष्णुता की नीति केवल घोषणाओं तक सीमित न रहकर व्यवहार में भी दिखाई दे। राष्ट्रभक्ति भाषणों से नहीं, बल्कि ईमानदार आचरण से सिद्ध होती है।भारत का मूल दर्शन है“वसुधैव कुटुम्बकम्”, अर्थात संपूर्ण विश्व एक परिवार है। भारत की उन्नति केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समस्त मानवता के कल्याण के लिए होनी चाहिए। यही भारत को “विश्वगुरु” बनाने का वास्तविक मार्ग है।
26 जनवरी हमें यह स्मरण कराता है कि हमारा संविधान, हमारी एकता और हमारे कर्तव्य ही हमारी वास्तविक शक्ति हैं। जब हर नागरिक राष्ट्र को अपना परिवार माने, तब भारत अजेय बनता है।
यदि युवा जागृत हों, किसान सशक्त हों, श्रमिक सम्मानित हों, महिलाएँ नेतृत्व करें और प्रत्येक नागरिक राष्ट्रहित को सर्वोपरि माने तो वह दिन दूर नहीं जब भारत फिर से विश्व को दिशा देगा।
एक संकल्प एक भारत, एक विश्व।
जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान।





