भारत गाथा: श्रुति, कृति, दृष्टि — ओम से एल्गोरिदम तक भारत की रचनात्मक यात्रा

Bharat Gatha: Shruti, Kriti, Drishti — India's Creative Journey from Om to Algorithms

विनोद कुमार सिंह

भारत केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि एक जीवंत सभ्यता है—जहाँ शब्द जन्म लेते हैं,विचार आकार पाते हैं और दृष्टि भविष्य का निर्माण करती है।कर्त्तव्य पथ पर 77 वें गणतंत्र दिवस के अवश र पर आयेजित भव्य समारोह में केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की मनमोहक झांकी “भारत गाथा: श्रुति,कृति, दृष्टि” इसी शाश्वत सभ्यतागत प्रवाह का सशक्त दृश्य रूप बनकर सामने आई। मंत्रालय की यह झांकी वैदिक व विकसित भारत की कथा कहने की उस परंपरा को रेखांकित करती है,जो वेदों की मौखिक परंपरा से शुरू होकर आज एल्गोरिदम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इमर्सिव डिजिटल अनुभवों तक पहुँची है।यह जीवंत झांकी केवल अतीत का गौरवगान नहीं,बल्कि आत्मनिर्भर भारत की उस चेतना का प्रतिबिंब है,जिसमें परंपरा और प्रौद्योगिकी एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सहयात्री हैं।प्रणव ओम से एल्गोरिदम तक की यह यात्रा भारत की फलती-फूलती रचनात्मक अर्थव्यवस्था वैश्विक सामग्री शक्ति के रूप में उसके उभार और भविष्य के प्रति उसके आत्मविश्वास को उद्घाटित करती है।

भारतीय सभ्यता में ज्ञान का प्रथम स्रोत श्रुति है—जो सुना गया, अनुभव किया गया और पीढ़ी-दर- पीढ़ी स्मृति में संचित रहा। झांकी का यह प्रथम खंड भारत की उसी मौखिक परंपरा को नमन करता है, जिसने सहस्राब्दियों तक ज्ञान को जीवित रखा।पीपल के वृक्ष के नीचे बैठे गुरु-शिष्य परंपरा का दृश्य केवल एक प्रतीक नहीं,बल्कि भारतीय शिक्षा-दर्शन की आत्मा है।यहाँ ज्ञान किसी पाठ्य-पुस्तक तक सीमित नहीं,बल्कि मानव जीवन का अंग है। गुरु का वाणी-संचार, शिष्य की एकाग्रता और प्रकृति की सान्निध्य—ये सब मिलकर उस समग्र शिक्षण परंपरा को रचते हैं,जिसमें शब्द साधना बन जाता है।

झांकी में उकेरे गए ध्वनि-तरंग रूपांकन और ओम का ब्रह्मांडीय प्रतीक यह स्मरण कराता है कि भारतीय दर्शन में ध्वनि को सृष्टि की मूल इकाई माना गया है।नाद-ब्रह्म की यह अवधारणा आज आधुनिक विज्ञान में भी प्रतिध्वनित होती दिखती है,जहाँ फ्रीक्वेंसी,वेव्स और वाइब्रेशन के सिद्धांत ब्रह्मांड को समझने का आधार बन रहे हैं।श्रुति का यह खंड दर्शाता है कि भारत की कहानी कहने की कला केवल मनोरंजन नहीं,बल्कि चेतना के विस्तार का माध्यम रही है। लोककथाएँ,महाकाव्य,भजन, कीर्तन और कथकली जैसी परंपराएँ समाज को जोड़ने का सेतु बनीं।जहाँ श्रुति स्मृति में जीवित रही, वहीं कृति ने विचारों को स्थायित्व दिया।झांकी का दूसरा खंड भारत की लिखित और कलात्मक परंपराओं के विकास को भव्यता से प्रस्तुत करता है।भगवान गणेश द्वारा महाभारत लेखन का दृश्य भारतीय बौद्धिक परंपरा का प्रतीक है—जहाँ लेखन केवल रिकॉर्डिंग नहीं, बल्कि साधना है। महाभारत जैसे ग्रंथ न केवल कथा हैं,बल्कि दर्शन, नीति, राजनीति और मानव मन के गहन अध्ययन का दर्पण हैं।इस खंड में पांडुलिपियाँ,ताड़पत्र शिलालेख, नाट्य-शास्त्र,संगीत, नृत्य और प्रदर्शन कलाओं के दृश्य भारत की उस बहुआयामी रचनात्मकता को सामने लाते हैं,जिसने विश्व को गणित,खगोल, आयुर्वेद,स्थापत्य और साहित्य की अमूल्य धरोहर दी।

कृति का यह कालखंड बताता है कि भारत में लेखन और कला सत्ता का उपकरण नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना की अभिव्यक्ति रही है। कवि, कथाकार, नाटककार और कलाकार समाज के द्रष्टा रहे हैं—जो समय की नब्ज पहचानकर उसे शब्द और स्वर देते हैं।

झांकी का तीसरा और सबसे गतिशील खंड है दृष्टि—जो भारत की मीडिया यात्रा को दर्शाता है। प्रिंट से लेकर सिनेमा, रेडियो, टेलीविजन और अब डिजिटल प्लेटफॉर्म तक,यह खंड भारत के आधुनिक अभिव्यक्ति माध्यमों की कहानी कहता है।विंटेज कैमरे,फिल्म रील, .समाचार पत्र, उपग्रह और बॉक्स ऑफिस प्रतीक—ये सब उन पीढ़ियों को श्रद्धांजलि हैं, जिन्होंने भारतीय सिनेमा और मीडिया को वैश्विक पहचान दिलाई।दादा साहेब फाल्के से लेकर सत्यजीत रे,राज कपूर से लेकर समकालीन फिल्मकारों तक—भारत की दृश्य कथा ने सामाजिक परिवर्तन, राष्ट्रनिर्माण और सांस्कृतिक आत्मविश्वास में अहम भूमिका निभाई है।

यह खंड यह भी दर्शाता है कि भारतीय मीडिया केवल मनोरंजन का साधन नहीं,बल्कि सामाजिक संवाद और लोकतांत्रिक चेतना का वाहक रहा है। रेडियो की आवाज़ से लेकर दूरदर्शन के युग और आज के ओटीटी प्लेटफॉर्म—हर माध्यम ने भारत की विविधता को स्वर दिया।

भविष्य की कहानी: एआई, एवीजीसी-एक्सआर और वर्चुअल प्रोडक्शन।झांकी का सबसे प्रेरक पक्ष है उसका भविष्य-दर्शन।एआई, एवीजीसी-एक्सआर और वर्चुअल प्रोडक्शन तकनीकों के माध्यम से यह संकेत दिया गया है कि भारत अब केवल सामग्री का उपभोक्ता नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर कंटेंट क्रिएटर और हब बनने की ओर अग्रसर है।डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और स्किल इंडिया जैसी पहलें भारत की रचनात्मक प्रतिभा को वैश्विक मंच दे रही हैं। युवा क्रिएटर्स,गेम डेवलपर्स, एनीमेशन आर्टिस्ट और डिजिटल स्टोरीटेलर्स भारत की नई पहचान गढ़ रहे हैं—जहाँ कहानी कहने की परंपरा तकनीक के पंख लगाकर उड़ान भर रही है।

यह झांकी डब्लु ए वी ई एस 2025 के दृष्टिकोण से भी जुड़ी है, जो भारत को वैश्विक सामग्री केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। “संतरा अर्थव्यवस्था का उदय” केवल एक रूपक नहीं, बल्कि उस रचनात्मक अर्थव्यवस्था का संकेत है,जिसमें संस्कृति, मीडिया और तकनीक आर्थिक विकास के प्रमुख चालक बन रहे हैं।वैश्विक सहभागिता, व्यावसायिक समझौते और सांस्कृतिक आदान-प्रदान यह दर्शाते हैं कि भारत की कहानी अब विश्व सुनना चाहता है—और भारत उसे आत्मविश्वास के साथ सुना रहा है।

सांस्कृतिक कालक्रम और दूरदर्शी दृष्टि“भारत गाथा: श्रुति, कृति, दृष्टि” झांकी एक साथ सांस्कृतिक कालक्रम और दूरदर्शी दृष्टिकोण है। यह अतीत की जड़ों से जुड़कर भविष्य की शाखाएँ फैलाने का संदेश देती है।77वें गणतंत्र दिवस पर यह झांकी हमें याद दिलाती है कि भारत की शक्ति उसकी निरंतरता में है—जहाँ परंपरा ठहराव नहीं, बल्कि नवाचार का आधार है। ओम की गूंज से लेकर एल्गोरिदम की गणना तक, भारत की कथा अनवरत प्रवाह में आगे बढ़ रही है।

यह झांकी न केवल देखने का अनुभव है, बल्कि आत्मचिंतन का निमंत्रण भी—कि हम अपनी विरासत को समझें, उसे संजोएँ और तकनीक के साथ मिलकर एक ऐसे भविष्य का निर्माण करें, जहाँ भारत की कहानी विश्व की साझा धरोहर बने।