गुप्त नवरात्रि में माँ धूमावती की साधना — वैराग्य, विवेक और विपत्ति-विनाश की महाविद्या

The worship of Goddess Dhumavati during Gupt Navratri – the great science of detachment, wisdom, and the destruction of adversity

अजय कुमार बियानी

सनातन परंपरा में गुप्त नवरात्रि का विशेष स्थान है। यह वह काल है जब बाह्य आडंबर से दूर रहकर अंतःसाधना, आत्मचिंतन और तंत्र–विद्या के गूढ़ रहस्यों का अभ्यास किया जाता है। गुप्त नवरात्रि की सप्तमी को दस महाविद्याओं में सातवीं महाविद्या माँ धूमावती की उपासना का विशेष महत्व बताया गया है। माँ धूमावती को अलक्ष्मी या ज्येष्ठालक्ष्मी भी कहा गया है, अर्थात वे लक्ष्मी की बड़ी बहन हैं। जहाँ लक्ष्मी ऐश्वर्य और समृद्धि की प्रतीक हैं, वहीं धूमावती वैराग्य, त्याग, दुःख, दारिद्र्य और जीवन की कटु सच्चाइयों का साक्षात स्वरूप मानी जाती हैं।

माँ धूमावती का स्वरूप सामान्य देवी प्रतिमाओं से भिन्न है। वे विधवा रूप में पूजित होती हैं, श्वेत वस्त्र, खुले केश, रूक्ष और धूमिल कांति, हाथ में सूप और वाहन के रूप में कौआ—यह सब उनके प्रतीकात्मक स्वरूप को दर्शाता है। यह स्वरूप भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि जीवन के उस पक्ष से साक्षात्कार कराने के लिए है, जिससे मनुष्य प्रायः पलायन करता है। धूमावती हमें सिखाती हैं कि दुःख, अभाव और असफलता भी जीवन के शिक्षक हैं।

शास्त्रों में वर्णित है कि माँ धूमावती वही महाशक्ति हैं जो व्यक्ति को दीन–हीन अवस्था का अनुभव कराकर अहंकार का क्षय करती हैं। वे दरिद्रता की स्वामिनी होकर भी अपने सच्चे भक्तों पर करुणा करती हैं। उनकी कृपा से साधक के जीवन से विपत्ति, ऋण, रोग और मानसिक क्लेश का नाश होता है। यही कारण है कि उन्हें दारुण महाविद्या भी कहा गया है। क्रोधमय ऋषियों—दुर्वासा, भृगु, अंगिरा और परशुराम—की मूल शक्ति भी माँ धूमावती को माना गया है।

पौराणिक कथाओं में माँ धूमावती के प्राकट्य की दो प्रमुख कथाएँ मिलती हैं। एक कथा के अनुसार सती के यज्ञाग्नि में भस्म होने के बाद जो धुआँ उठा, उसी से धूमावती का प्राकट्य हुआ। वे सती के उस शेष स्वरूप का प्रतीक हैं, जिसमें विरक्ति और उदासी समाई हुई है। दूसरी कथा में सती की अतृप्त भूख और शिव को निगलने की घटना सांकेतिक रूप से मानव की अनंत कामनाओं की ओर संकेत करती है। धूमावती उन कामनाओं के नाश की शक्ति हैं।

ज्योतिष शास्त्र में माँ धूमावती का संबंध केतु ग्रह और ज्येष्ठा नक्षत्र से बताया गया है। केतु को मोक्ष, वैराग्य और कर्मक्षय का कारक माना जाता है। जिनकी कुंडली में केतु सुदृढ़ होता है, उनके जीवन में अचानक होने वाले दुःख अंततः आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग खोलते हैं। माँ धूमावती की उपासना से ऋण, दुर्भाग्य और ग्रहदोषों से मुक्ति की मान्यता भी शास्त्रों में वर्णित है।
सनातन परंपरा में यह स्पष्ट निर्देश है कि माँ धूमावती की साधना अत्यंत संयम और गुरु मार्गदर्शन में ही की जानी चाहिए। गृहस्थों के लिए उनकी उग्र साधना निषिद्ध मानी गई है। उनका पूजन भी इस भावना से किया जाता है कि देवी साधक के समस्त दुःख, दरिद्रता और विघ्नों को अपने साथ लेकर विदा हों और जीवन में शांति व संतुलन का मार्ग प्रशस्त करें। वे स्थायी रूप से आमंत्रित की जाने वाली देवी नहीं हैं, बल्कि संकटमोचक महाशक्ति हैं।

माँ धूमावती का संदेश आज के भौतिकतावादी युग में अत्यंत प्रासंगिक है। वे हमें याद दिलाती हैं कि जीवन केवल भोग और सुविधा का नाम नहीं है। दुःख, अभाव और असफलता भी आत्मविकास की सीढ़ियाँ हैं। जो साधक इनसे भागने के बजाय इन्हें स्वीकार कर लेता है, वही अंततः धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों को साध पाता है।

गुप्त नवरात्रि की सप्तमी पर माँ धूमावती का स्मरण हमें साहस, वैराग्य और आंतरिक शक्ति प्रदान करता है। वे अंधकार की देवी नहीं, बल्कि उस प्रकाश की जननी हैं जो अंधकार को स्वीकार कर उससे ऊपर उठना सिखाता है। यही माँ धूमावती की महिमा है, यही उनकी साधना का वास्तविक अर्थ।

गुप्त नवरात्रि में माँ धूमावती की साधना केवल तांत्रिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और विवेक जागरण का माध्यम है। शास्त्रों में वर्णित उनके नाम और मंत्र साधक के भीतर छिपे भय, मोह और अहंकार को क्षीण करते हैं। माँ धूमावती के निम्न मंत्र उनके विविध स्वरूपों और शक्तियों का स्मरण कराते हैं—

ॐ भद्रकाल्यै नमः।
ॐ महाकाल्यै नमः।
ॐ डमरूवाद्यकारिणीदेव्यै नमः।
ॐ स्फारितनयनादेव्यै नमः।
ॐ कटंकितहासिन्यै नमः।
ॐ धूमावत्यै नमः।
ॐ जगत्कर्त्र्यै नमः।
ॐ शूर्पहस्तायै नमः।

इन मंत्रों का जप साधक को यह बोध कराता है कि सृष्टि का संचालन केवल सुख से नहीं, बल्कि संघर्ष और त्याग से भी होता है। माँ धूमावती का स्मरण हमें यह स्वीकार करना सिखाता है कि जीवन के अंधकारमय क्षण ही अंततः विवेक और वैराग्य की लौ जलाते हैं। यही उनकी साधना का मर्म है—भय से मुक्ति, अहंकार का क्षय और सत्य का साक्षात्कार।