कवियों का आत्मसम्मेलन

poets' gathering

कवि ही मंच है,
कवि ही माइक,
कवि ही तालियाँ,
कवि ही श्रोता।

कवि ही किताब ख़रीदता,
कवि ही कवि को बुलाता,
और सम्मान—
आपस में बाँट लिया जाता।

ये सम्मेलन नहीं,
आत्ममुग्धता का उत्सव है।
लानत है ऐसे मंच पर,
लानत है ऐसे सम्मान पर,
और उस कलम पर भी
जो आज तक
दबे-कुचले की तरफ़ नहीं झुकी।

कविता का जन्म
एसी हॉल में नहीं हुआ था,
वह तो भूख, अपमान
और संघर्ष की कोख से निकली थी।

बताओ तथाकथित कवियो—
बड़े संस्थानों में
फ़ोटोशूट करवाने से
कविता बड़ी होती है
या अहंकार?

अगर तुम्हारी कविता
मज़दूर के पसीने से नहीं मिलती,
स्त्री की चुप्पी से नहीं टकराती,
और हाशिये की चीख़ से नहीं काँपती—
तो वह कविता नहीं,
सुविधा की सजावट है।
कविता सवाल है,
सम्मान नहीं।

  • डॉ. प्रियंका सौरभ