प्रेम प्रकाश
अब तक के सफरनामे में भारतीय गणतंत्र ने तंत्र की निरंकुशता भी देखी और इसके खिलाफ जनता के निर्णायक विवेक और संघर्ष को भी देखा। इस लिहाज से देखें तो इस बार गणतंत्र दिवस से पहले भारतीय संसद में आपातकाल के 50 वर्ष पूरे होने पर हुई विशेष चर्चा का ऐतिहासिक महत्व है। साफ है कि एक ऐसे दौर में जब दुनिया में लोकतांत्रिक राष्ट्रों का चरित्र या तो तानाशाही में बदलता जा रहा है या फिर जनाक्रोश के कारण उसका पूरा ताना-बाना बिखर रहा है, भारतीय लोकतंत्र की जमीन लगातार मजबूत हुई है। संविधान पर भरोसा आज अगर समकालीन भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा ध्रुवीय यथार्थ है, तो यह उपलब्धि निश्चित रूप से भारतीय गणतंत्र की अब तक की यात्रा के लिहाज से असाधारण है। यह भी कि इस विलक्षणता के साथ जो बात खासतौर पर अहम है वह है संविधान पर अटूट भरोसे के साथ निखरा भारतीय संघवाद का सहकारी चरित्र।
भूले नहीं हैं लोग कि संविधान निर्माण के 60 वर्ष पूरे होने पर जिस मुख्यमंत्री ने अपने प्रदेश में भव्य संविधान गौरव यात्रा निकाली और खुद पैदल चलते हुए उसकी अगुवाई की, वह बीते ग्यारह वर्षों से देश का प्रधानमंत्री है। 2010 में इस यात्रा में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अद्वितीय जुलूस की अगुवाई की थी। जुलूस में संविधान की प्रतिकृति की हाथी पर शोभायात्रा निकली और हजारों की तादाद में उमड़ी जनता के साथ नरेंद्र मोदी मीलों पैदल चले। आज उसी व्यक्ति के प्रधानमंत्रित्व काल में देश में संविधान दिवस मनाने की प्रेरक परंपरा शुरू हुई तो यह संयोग से ज्यादा भारतीय गणतंत्र की यात्रा का स्वाभाविक गंतव्य है। यह तथ्य भारतीय गणतंत्र की सशक्तता को लेकर खड़े किए जाने वाले कई छद्म और पूर्वाग्रहित सवालों तार्किक प्रत्याख्यान भी है।
शहीदे आजम भगत सिंह का महत्वपूर्ण कथन है- विधि की पवित्रता तभी तक बनी रह सकती है, जब तक वह जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति हो। दरअसल, यही भारतीय गणतंत्र की सफलता की सबसे बड़ी कसौटी है कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास और संविधान प्रदत्त न्याय का अवसर पहुंच रहा है कि नहीं। इस दरकार को केंद्र में रखकर भारतीय समकाल को देखें-परखें तो देश में कई बड़े परिवर्तनों की तरफ ध्यान जाता है। किसी की नजर में इस वर्ष असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव महत्वपूर्ण है, तो कोई इन सबको बिहार चुनाव के बाद देश की राजनीति के धुर दक्षिणायन होने की प्रबल संभावना के तौर पर देख रहा है। अलबत्ता इन सब चर्चाओं और विश्लेषणों में तात्कालिक सियासी रोमांच ज्यादा है। ज्यादा गहराई और धैर्यपूर्ण विवेक से देखें तो मौजूदा सदी के ढाई दशक में देश की राजनीति व सरकारों की प्राथमिकताओं में कुछ बड़े और असरदार बदलाव दिखे हैं। इनमें सबसे अहम है विकास और बुनियादी सरोकारों से जुड़े जमीनी बदलाव को लेकर होने वाले प्रयास और उसके साथ उभरा नायकत्व ।
इसमें कहीं दो मत नहीं कि खासतौर पर बीते एक दशक में देश की राजनीति और विकासवादी एजेंडे के अक्षांश और देशांतर को सबसे ज्यादा प्रभावित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया है। विरासत और विकास के विजन के साथ वर्ष 2047 तक विकसित भारत के निर्माण का उनका संकल्प केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं में तो स्थान पा ही रहा है, इससे भविष्य की ओर सकारात्मकता के साथ देखने की रचनात्मक प्रवृति भी देश में विकसित हुई है।
इस दौरान जो एक और बात भारतीय राजनीति और समाज पर गहरी छाप छोड़ने में सफल रही है, वह है मौजूदा सदी में भारत के संघीय ढांचे में केंद्र के साथ राज्यों की विकास दृष्टि और चरित्र में आया बड़ा परिवर्तन। ये परिवर्तन जहां एक तरफ टिकाऊ विकास की सीध में आगे बढ़ा है, वहीं इससे जमीनी स्तर पर काम करने की गंभीर समझ भी बनी है। आज अगर बिहार, ओडिशा और मध्य प्रदेश के विकास मॉडल राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हैं तो यह बदलते भारत की एक ऐसी दास्तान है, जिसका ढांचा केंद्रीय न होकर, विकेंद्रित है।
अब जब देश और खासतौर पर बिहार जैसे सूबों में योजनागत सफलताओं का नया दौर शुरू हुआ है तो यह तथ्य मजबूती से उभरा है कि सेवा, सुशासन और गरीब कल्याण के विजन के साथ बीमारू प्रदेश कहे जाने वाले सूबों की राजनीति काफी आगे बढ़ी है। नीति आयोग की 2024 में आई बहुचर्चित रिपोर्ट इस बात की तथ्यात्मक गवाही है। यह रिपोर्ट बताती है कि खासतौर पर बिहार और यूपी में बड़े पैमाने पर लोगों का जीवन गरीबी के कुचक्र से न सिर्फ बाहर आया है, बल्कि इस दौरान देश में आजीविका और बेहतर जीवन के लिए नई अनुकूलताएं पैदा हुई हैं। देश के प्रधानमंत्री जब इस रिपोर्ट के हवाले के साथ देश में 2013-14 से 2022-23 के बीच 24.82 करोड़ लोगों के गरीबी से बाहर निकलकर देश में नए मध्यवर्ग के उदय की बात कहते हैं, तो वे कहीं न कहीं बिहार-यूपी जैसे सूबों में बड़े सामाजिक परिवर्तन का साक्ष्य रखते हैं।
यह एक अहम और दिलचस्प तथ्य है कि 1980 के दशक में अर्थशास्त्री आशीष बोस ने जिन चार राज्यों बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के शुरुआती अक्षरों से बीमारू (बीआईएमएआरयू) राज्यों का एक्रोनिम गढ़ा था, वे राज्य आज देश में आर्थिक-सामाजिक बदलाव के अग्रदूत हैं। यही नहीं, ये राज्य आज सहकारी संघवाद की बुनियाद को भी मजबूत कर रहे हैं। आज अगर भारत सरकार ओडीओपी, आजीविका या जल जीवन मिशन के साथ पूरे देश में बदलाव का सर्ग रच रही है तो इसकी शुरुआती जमीन राज्यों ने ही तैयार की। उत्तर प्रदेश की एक जनपद, एक उत्पाद की पहल को आज केंद्र सरकार ओडीओपी के रूप में आगे बढ़ा रही है, तो बिहार का जीविका मॉडल ही संवर्धित रूप में केंद्र का आजीविका मिशन है। यहां तक कि जिस जल जीवन मिशन के कारण भारत दुनिया में जल क्षेत्र का सबसे बड़ा कार्यक्रम चलाने वाला देश है, उसका आगाज बिहार में जल जीवन हरियाली के रूप में सबसे पहले हुआ। इसी तरह जनजातीय कल्याण और नक्सल हिंसा के खिलाफ निर्णायक अभियान के लिए मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ सरकारों के प्रयोग को केंद्र सरकार अपने तरीके से आगे बढ़ा रही है।
थोड़ा और पीछे जाएं तो अंत्योदय जैसी कल्याणकारी योजना को सबसे पहले 1977 में राजस्थान की भैरोंसिंह शेखावत की सरकार ने जमीन पर उतारा था। आज यह योजना भारत सरकार की कई योजनाओं की केंद्रीय प्रेरणा है। इन तमाम उदाहरणों और साक्ष्यों से इस बात का भरोसा मजबूत होता है कि अपनी स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरा होने तक भारत विश्व में हर लिहाज से एक विकसित राष्ट्र होगा। एक ऐसा राष्ट्र जो लोकतंत्र को लोक कल्याण और गणतंत्र को अंतिम व्यक्ति की खुशहाली की कसौटी पर खरा उतारे।
तमाम तरह के सियासी शोर-शराबे के बीच विकास और पब्लिक कनेक्ट की राजनीति पर जिस तरह आज देश का भरोसा बीते दो दशक से अडिग बना हुआ है, वह बदलते भारत के नए चरित्र का साक्षात्कार है। नकारात्मकता और प्रतिस्पर्धा से भरे दौर में यह सकारात्मकता एक ऐसा स्वस्थ संकेत है, जो भारत को वैश्विक पटल पर आज नए सिरे से प्रतिष्ठित कर रहा है। यह संकेत विरासत के साथ विकास के साझे को नजीर बनाते नए भारतवर्ष के उभार का तो है ही, यह दुनियाभर में एक अरब से ज्यादा वंचितों और पीड़ितों की आबादी के लिए भी आशा और भरोसे की मानवीय पदचाप है।





