अपने हिस्से के आसमान की तलाश— सन्दीप तोमर

Searching for my share of the sky – Sandeep Tomar

पुस्तक — ‘मेरे हिस्से का आसमान’
विधा- काव्य
रचनाकार – वीणा अमृत
प्रकाशन वर्ष – २०२५
मूल्य – रूपये
प्रकाशक- वाणी प्रकाशन , दिल्ली

कविता जब अपने समय से आँख मिलाती है, तब वह केवल सौंदर्य का उपकरण नहीं रहती— वह प्रश्न बन जाती है, हस्तक्षेप बन जाती है और कई बार प्रतिरोध भी। वीणा अमृत का कविता-संग्रह ‘मेरे हिस्से का आसमान’ इसी अर्थ में एक सजग स्त्री-स्वर की दस्तावेज़ी यात्रा है, जो निजी अनुभव से चलकर सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक धरातल तक पहुँचती है। यह संग्रह किसी एक भाव या एक विषय में सीमित नहीं, बल्कि स्त्री-अस्तित्व, प्रेम, पीड़ा, प्रकृति, हिंसा, स्मृति और आत्मबोध के अनेक स्तरों को समेटे हुए है।
इस संग्रह की केन्द्रीय धुरी ‘आसमान’ है— लेकिन वह रोमानी कल्पना का खुला विस्तार नहीं, बल्कि अधिकार की माँग है। शीर्षक कविता ‘मेरे हिस्से का आसमान’ में कवयित्री प्रेम के भीतर भी अपनी स्वतंत्रता की शर्त रखती है—
“पास रहना पर तनिक दूर
बचा देना मेरा ‘मैं’।”
यह पंक्ति केवल प्रेम-संबंधों की नहीं, बल्कि स्त्री की समूची सामाजिक स्थिति पर टिप्पणी है, जहाँ निकटता अक्सर स्वामित्व में बदल दी जाती है। यहाँ प्रेम समर्पण है, विलय नहीं।
वीणा अमृत की कविताओं की एक बड़ी शक्ति उनका स्पष्ट और निर्भीक कथ्य है। ‘लड़की’, ‘न्याय’, ‘राख’, ‘यातना’, ‘ओ पुरुष!’ जैसी कविताएँ किसी प्रतीकात्मक धुँध में नहीं जातीं; वे सीधी बात कहती हैं—कभी लगभग घोषणात्मक स्वर में। ‘न्याय’ कविता विशेष रूप से ध्यान खींचती है, जहाँ बलात्कार के बाद की सामाजिक और मीडिया-निर्मित हिंसा को कवयित्री बिना किसी अलंकरण के उजागर करती हैं। यहाँ कविता करुणा नहीं, बेचैनी पैदा करती है— और यही उसका उद्देश्य भी है।
वीणा अमृत का कविता-संग्रह ‘मेरे हिस्से का आसमान’ एक ऐसा दस्तावेज़ है, जहाँ प्रेम, पीड़ा, प्रकृति, स्मृति और प्रतिरोध एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक ही संवेदनात्मक प्रवाह के अंग हैं। यह संग्रह भावुक आत्मकथ्य नहीं, बल्कि आत्मबोध की वह प्रक्रिया है, जिसमें कवयित्री अपने समय और समाज से निरंतर संवाद करती चलती है।
संग्रह की कविता ‘मुक्ति’ इस यात्रा का संकेत दे देती है—
“अपने अस्तित्व का फैलाव नहीं
सिकुड़न चाहती हूँ
निस्सीम आकाश-सा विस्तार लिए
चाहती हूँ शून्य हो जाना”
यहाँ मुक्ति किसी विजय-घोषणा की तरह नहीं आती, बल्कि थकान, बोध और आत्मस्वीकृति के साथ उपस्थित होती है। ‘फैलाव’ के स्थान पर ‘सिकुड़न’ की कामना, आधुनिक स्त्री की उस स्थिति को रेखांकित करती है जहाँ अधिक होना ही हमेशा समाधान नहीं होता।
संग्रह की शीर्षक कविता ‘मेरे हिस्से का आसमान’ प्रेम की परिभाषा को पुनः लिखती है—
“प्रेम करना मुझसे
वैसे ही
जैसे
छप्पर को सँभालते दूर-दूर के खम्भे…
छोड़ देना थोड़ा-सा आसमान मेरे हिस्से का”
यहाँ प्रेम निकटता के साथ दूरी की शर्त पर टिका है। यह कविता स्त्री की स्वतंत्र सत्ता की माँग है, जहाँ ‘मैं’ को बचा रहना है। यह आग्रह प्रेम-विरोधी नहीं, बल्कि प्रेम को मानवीय और नैतिक बनाए रखने की शर्त है।
संग्रह का एक सशक्त पक्ष स्त्री के विरुद्ध हिंसा और सामाजिक पाखंड पर कवयित्री की स्पष्ट दृष्टि है। ‘लड़की’ कविता में यह स्वर तीखा और असुविधाजनक हो उठता है—
“लड़की
तू कहीं न बचेगी
न कोख में, न बीज में,”
यह कविता किसी एक घटना पर प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उस सभ्यता पर प्रश्न है जहाँ स्त्री का अस्तित्व ही संकट में है। इसी क्रम में ‘न्याय’ कविता व्यवस्था की निर्ममता को उजागर करती है—
“फिर होगा मानसिक बलात्कार
न्याय शब्दों के जख़ीरे तुम पर लादे जायेंगे”
यहाँ न्याय एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक और यातना बनकर सामने आता है। कविता पाठक को राहत नहीं देती, बल्कि असहज करती है और यही इसकी सफलता है।
प्रकृति इस संग्रह में करुण पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि चेतावनी देती हुई सत्ता है। ‘निर्माण’ कविता में प्रकृति स्वयं बोलती है—
“मुझे
डुबाने की साजजिशें और चालाकियाँ तुम्हारी
ले डूबेंगी तुम्हें ही एक दिन”
यह कविता पर्यावरणीय संकट को नैतिक संकट में बदल देती है, जहाँ मनुष्य का विनाश उसकी ही करतूतों का परिणाम है।
इसके समानान्तर संग्रह में गहरे आत्मसंवादी क्षण भी हैं। ‘हिसाब’ कविता प्रिय की अनुपस्थिति को जीवन के गणित में बदल देती है—
“सबकुछ मेरा है
पृथ्वी मेरी, आसमान मेरा
बस तुम नहीं इसमें”
यह पंक्ति प्रेम की रिक्तता को बिना किसी आलंकारिक आवरण के सामने रख देती है।
वीणा अमृत की भाषा सहज, भावप्रधान और संप्रेषणीय है। कहीं-कहीं कथन का विस्तार कविता को घोषणात्मक बना देता है, पर अधिकांश स्थानों पर भाव की सच्चाई इस अतिरिक्तता को स्वीकार्य बना लेती है। उनके यहाँ प्रेम भी है—
“मैं तुमसे प्रेम करती हूँ
और तुम मुझे…
बावजूद इसके
मैं तुमसे प्रेम करती हूँ”
और आत्मस्वीकृति भी—
“तुमसे अलगाव में ही मेरा विस्तार है”
हालाँकि यह संग्रह केवल प्रतिरोध की आवाज़ नहीं है। इसमें एक गहरा आन्तरिक, आत्मसंवादी स्वर भी मौजूद है। ‘मुक्ति’, ‘पीड़ा’, ‘हिसाब’, ‘अकेलापन’, ‘साँसे’ जैसी कविताएँ अस्तित्वगत प्रश्नों से जूझती हैं। ‘हिसाब’ कविता किसी प्रिय की अनुपस्थिति का मर्सिया है, जो शोर नहीं करता, भीतर-भीतर रिसता है। वहीं ‘मुक्ति’ कविता में शून्य होने की चाह, विस्तार से नहीं बल्कि सिकुड़न से मुक्ति पाने की इच्छा—कवयित्री की दार्शनिक संवेदना को रेखांकित करती है।
प्रकृति इस संग्रह में मात्र पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि सक्रिय पात्र की तरह उपस्थित है। ‘निर्माण’, ‘बाढ़’, ‘विनाश की ओर’, ‘ज़मीन’ जैसी कविताओं में मनुष्य और प्रकृति का संघर्ष स्पष्ट है। ‘निर्माण’ में प्रकृति स्वयं बोलती है और यह स्वर चेतावनी का है। यहाँ पर्यावरण-चिन्ता उपदेश नहीं बनती, बल्कि कविता की नैसर्गिक भाषा में ढल जाती है।
भाषा की दृष्टि से वीणा अमृत की कविताएँ सहज, संप्रेषणीय और भावप्रधान हैं। बिम्ब कहीं-कहीं बहुत प्रभावशाली हैं—जैसे “छप्पर को सँभालते दूर-दूर के खम्भे” या “नाभि पर खिले ब्रह्मकमल-सा अनायास तुम्हें पा लिया था।” हालाँकि कुछ कविताओं में भाव की तीव्रता के कारण कथन थोड़ा लम्बा या दोहराव-ग्रस्त भी हो जाता है, जहाँ संपादन की गुंजाइश दिखती है। फिर भी यह दोष नहीं, बल्कि एक भावुक रचनाकार की स्वाभाविक अतिरिक्तता कही जा सकती है।
महत्वपूर्ण यह है कि ‘मेरे हिस्से का आसमान’ किसी कृत्रिम साहित्यिक चतुराई का परिणाम नहीं लगता। यह संग्रह जिया हुआ, भुगता हुआ और ईमानदारी से लिखा हुआ है। स्त्री-अनुभव यहाँ न तो करुणा-उत्पादक वस्तु है, न ही वैचारिक नारा—वह एक जीवित चेतना है, जो प्रेम भी करती है, प्रश्न भी उठाती है और आवश्यकता पड़ने पर प्रतिरोध भी।
कुल मिलाकर, वीणा अमृत का यह कविता-संग्रह समकालीन हिन्दी कविता में एक संवेदनशील, सजग और प्रतिबद्ध स्त्री-स्वर की उपस्थिति दर्ज करता है। यह संग्रह पाठक से केवल सहानुभूति नहीं, सहभागिता चाहता है—और शायद यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है।
कुल मिलाकर ‘मेरे हिस्से का आसमान’ स्त्री की निजी पीड़ा से शुरू होकर सामूहिक विवेक तक पहुँचने वाला संग्रह है। यह कविता को सौंदर्य की वस्तु नहीं, चेतना का माध्यम मानता है। यह संग्रह पाठक से सहमति नहीं, सहभागिता चाहता है—और शायद यही इसका सबसे बड़ा साहित्यिक मूल्य है।
— सन्दीप तोमर
( आलोचक, कथाकार)
नई दिल्ली- 110059