क्या यह नरेंद्र मोदी का डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीति को ‘सबक सिखाने’ वाला मास्टरस्ट्रोक है?
निलेश शुक्ला
27 जनवरी 2026 को भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) ने बहुप्रतीक्षित भारत–ईयू मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को औपचारिक रूप से अंतिम रूप दे दिया। नेताओं और बाजारों ने इसे एक स्वर में “मदर ऑफ ऑल डील्स” कहा। लगभग दो दशकों की बातचीत के बाद साकार हुआ यह ऐतिहासिक समझौता भारत और यूरोप के बीच वैश्विक व्यापार की दिशा बदलने वाला साबित हो सकता है। ऐसे समय में, जब दुनिया भर में व्यापारिक तनाव बढ़ रहे हैं, यह करार न सिर्फ आर्थिक बल्कि भू-राजनीतिक स्तर पर भी नए संकेत देता है। सतही तौर पर देखें तो यह एक बड़ा आर्थिक ब्रेकथ्रू है—दोनों आर्थिक समूहों के बीच कारोबार होने वाले 96 प्रतिशत से अधिक उत्पादों पर शुल्क घटाने या समाप्त करने का रास्ता खुल गया है। इससे लगभग 25 प्रतिशत वैश्विक जीडीपी को समेटे एक संयुक्त बाजार आकार लेता है, जहां सालाना 180 अरब डॉलर से अधिक का व्यापार संभावित है। मगर इस समझौते की असली कहानी केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है। यह अमेरिका–भारत–ईयू संबंधों, सप्लाई-चेन के पुनर्संयोजन और वैश्विक व्यापार संरचना के बदलते स्वरूप से भी गहराई से जुड़ी है। सवाल यही है—क्या यह नरेंद्र मोदी का ऐसा मास्टरस्ट्रोक है, जो डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिका की एकतरफा टैरिफ राजनीति को नपी-तुली सीख देता है? आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक पहलुओं से इस समझौते को समझना जरूरी है।
भारत–ईयू एफटीए कोई साधारण व्यापार समझौता नहीं है; यह एक संरचनात्मक पुनर्संतुलन है। 2007 से ‘ब्रॉड-बेस्ड ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट एग्रीमेंट’ के ढांचे के तहत बातचीत चलती रही, मगर टैरिफ विवाद, नियामकीय मतभेद और राजनीतिक सुस्ती के कारण यह प्रक्रिया बार-बार अटकती रही। 2022 के बाद इसमें नई जान आई और अब जब यह समझौता अनुमोदन के करीब है, इसकी अहमियत और बढ़ जाती है। यह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था भारत को परिपक्व औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं के समूह ईयू से जोड़ता है—वह भी वस्तुओं, सेवाओं, निवेश, बौद्धिक संपदा और श्रम गतिशीलता को समेटते व्यापक ढांचे के तहत। रणनीतिक रूप से यह ऐसे वक्त में आया है जब वैश्विक व्यापार दबाव में है। अमेरिका की संरक्षणवादी नीतियों और टैरिफ बढ़ोतरी ने वहां कारोबार को अनिश्चित बनाया है, चीन की आर्थिक विस्तारवाद ने सप्लाई-चेन को फिर से गढ़ दिया है, यूरोप चीन पर निर्भरता कम करना चाहता है और भारत अपने निर्यात आधार को मजबूत करते हुए मैन्युफैक्चरिंग व सेवाओं के आधुनिकीकरण की तलाश में है। ऐसे परिदृश्य में यूरोप के साथ रिश्ते गहरे करना महज आर्थिक कदम नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक विविधीकरण भी है।
अब सवाल उठता है—इस सौदे से सबसे ज्यादा फायदा किसे? अगर एक बड़े लाभार्थी की पहचान करनी हो, तो वह यूरोपीय निर्यात तंत्र है। इस समझौते के तहत यूरोपीय कंपनियों को भारत के विशाल बाजार में अभूतपूर्व पहुंच मिलेगी। मूल्य के आधार पर ईयू के 96.6 प्रतिशत निर्यात पर भारत शुल्क घटाएगा। यूरोपीय कारों पर लगने वाला लगभग 110 प्रतिशत का टैरिफ चरणबद्ध तरीके से और कोटा व्यवस्था के साथ घटकर 10 प्रतिशत तक आ सकता है। मशीनरी, उपकरण, फार्मास्यूटिकल्स, रसायन, प्लास्टिक, विमान, मेडिकल डिवाइसेज जैसे कई क्षेत्रों में बाधाएं कम होंगी या खत्म हो जाएंगी। अनुमान है कि 2032 तक यूरोप का भारत को निर्यात दोगुना हो सकता है, जिससे एशियाई प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले यूरोपीय औद्योगिक और ऑटोमोटिव सेक्टर की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी। संक्षेप में, यूरोपीय उत्पादकों को वह टैरिफ राहत और बाजार पहुंच मिली है, जिसकी वे लंबे समय से मांग कर रहे थे, लेकिन इतनी व्यापकता में शायद ही कभी हासिल हुई हो।
भारत के लिए लाभ की तस्वीर भी कम अहम नहीं है, खासकर श्रम-प्रधान और पारंपरिक उद्योगों के लिए। वस्त्र, चमड़ा, रत्न एवं आभूषण, फुटवियर, समुद्री उत्पाद और इंजीनियरिंग वस्तुओं को यूरोप के समृद्ध बाजारों तक आसान और वरीयतापूर्ण पहुंच मिलने की उम्मीद है। 2023 में ईयू द्वारा जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज (जीएसपी) की सुविधा वापस लेने के बाद भारतीय उद्योगों की जो प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त घटी थी, इस समझौते से उसकी भरपाई होती दिखती है। लगभग 6.4 लाख करोड़ रुपये के संभावित निर्यात अवसर छोटे उत्पादकों और एमएसएमई को नई ऊर्जा दे सकते हैं। भारत के लिए यह सौदा केवल निर्यात का नहीं, बल्कि रोजगार और औद्योगिक पुनर्संरचना का भी है। जिन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में कामगार जुड़े हैं, वहां निर्यात बढ़ने और विदेशी पूंजी आने से व्यापक लाभ संभव है।
वस्तुओं के अलावा यह एफटीए सेवाओं के उदारीकरण और निवेश प्रवाह को भी समेटता है—ऐसे क्षेत्र जहां भारत की खास मजबूती है, खासकर आईटी और बिजनेस सर्विसेज। भारत को यूरोप के प्रमुख सेवा क्षेत्रों में बेहतर पहुंच मिलती है। साथ ही निवेश और बौद्धिक संपदा सुरक्षा को मजबूत किया गया है, जिससे यूरोपीय एफडीआई भारत में आने को प्रोत्साहित होगी और भारतीय टेक व फार्मा आईपी का संरक्षण भी सुनिश्चित होगा। इससे भारत सिर्फ कच्चे माल या वस्तुओं का निर्यातक नहीं, बल्कि यूरोपीय बाजारों से सीधे जुड़ा एक सशक्त सेवा केंद्र बनकर उभरता है।
हालांकि हर बड़े समझौते की तरह इसके साथ चुनौतियां भी हैं। टैरिफ कटौती का दर्द कुछ घरेलू क्षेत्रों को महसूस होगा, खासकर भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग को। यूरोपीय कारों और पुर्जों पर शुल्क घटने से घरेलू कंपनियों में चिंता स्वाभाविक है। घोषणा के दिन कई ऑटो शेयरों में गिरावट देखी गई। जिन सेगमेंट्स में पहले ऊंचे टैरिफ सुरक्षा कवच बने हुए थे, वहां अब स्थापित यूरोपीय ब्रांड्स से सीधी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। हालांकि शुरुआती कोटा और चरणबद्ध कटौती से झटका कुछ हद तक कम होगा, लेकिन प्रीमियम और मिड-टियर बाजारों में बाजार हिस्सेदारी पर दबाव आ सकता है।
इसके अलावा, हर उद्योग को समान लाभ नहीं मिलेगा। घरेलू संवेदनशीलताओं के कारण कृषि और डेयरी उत्पाद काफी हद तक इस उदारीकरण से बाहर रखे गए हैं। भारतीय उत्पादकों को यूरोप की गैर-टैरिफ और नियामकीय बाधाओं—जैसे पर्यावरण मानक और जीडीपीआर जैसी डिजिटल अनुपालना—का सामना करना पड़ेगा, जो लागत और जटिलता बढ़ाती हैं। यूरोपीय संघ की कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (सीबीएएम) स्टील और सीमेंट जैसे भारी उद्योगों के लिए चुनौती बन सकती है, भले ही टैरिफ कम हो जाएं। यह साफ संकेत है कि अवसर अपने आप मुनाफे में नहीं बदलते, खासकर तब जब मानकों और अनुपालन की कीमत चुकानी पड़े।
इस समझौते का सबसे दिलचस्प पहलू उसका भू-राजनीतिक संदेश है। डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति, टैरिफ युद्ध और व्यापार प्रतिबंधों ने कई अर्थव्यवस्थाओं को अमेरिकी बाजार पर निर्भरता पर पुनर्विचार करने को मजबूर किया है। भारत, जो दीर्घकालिक आर्थिक संप्रभुता और विविध साझेदारियों की राह पर है, इस समझौते के जरिए संकेत देता है कि उसके व्यापारिक क्षितिज वाशिंगटन तक सीमित नहीं हैं। दशकों तक अमेरिकी बाजार और पश्चिमी व्यापार संरचना वैश्विक मानक तय करती रही, लेकिन ट्रंप दौर की अनिश्चित टैरिफ नीति ने बाजारों को बेचैन किया। ऐसे में ईयू जैसे बड़े और अपेक्षाकृत स्थिर साझेदार के साथ एफटीए कर भारत यह संदेश देता है कि वह अमेरिकी व्यापारिक उतार-चढ़ाव का बंधक नहीं है।
यह समझौता भारत की पारंपरिक संतुलन नीति—वाशिंगटन, ब्रुसेल्स और बीजिंग के बीच—को और आसान बनाता है। यह अमेरिका के दरवाजे बंद नहीं करता, बल्कि भारत को विकल्प और सौदेबाजी की ताकत देता है। अगर अमेरिकी संरक्षणवाद बढ़ता है, तो भारत के पास अन्य मजबूत बाजार हैं। अगर यूरोपीय नियामक मानक वैश्विक नियम बनते हैं, तो भारत पहले से उनसे जुड़ा है। इस तरह भारत पश्चिमी बाजारों और ग्लोबल साउथ के उत्पादकों के बीच सेतु के रूप में अपनी भूमिका मजबूत करता है। भू-राजनीति की भाषा में यह केवल व्यापार नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता है।
बेशक, जोखिम बने रहेंगे। समझौते के कार्यान्वयन और अनुमोदन की राह आसान नहीं है—ईयू संसद और सदस्य देशों की मंजूरी अभी बाकी है, और भारत को भी अपनी आंतरिक प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। सप्लाई-चेन का पुनर्संयोजन समय लेता है और युद्ध या ऊर्जा संकट जैसे वैश्विक झटके योजनाओं को बाधित कर सकते हैं। कुछ क्षेत्र, खासकर कृषि, अभी भी हाशिये पर हैं और नियामकीय अनुपालन की लागत वास्तविक बनी रहेगी। फिर भी व्यापक कथा यही है कि यह समझौता भारत को ऐसे वैश्विक व्यापार ढांचे में मजबूती से स्थापित करता है, जो पहले मौजूद नहीं था।
अंततः भारत–ईयू मुक्त व्यापार समझौता आर्थिक उपलब्धि के साथ-साथ एक स्पष्ट भू-राजनीतिक संकेत है। यूरोप को भारत के विशाल बाजार तक अहम पहुंच और टैरिफ राहत मिलती है, जिससे उसकी वैश्विक सप्लाई-चेन में भूमिका मजबूत होती है। भारत को प्रमुख निर्यात क्षेत्रों में वरीयतापूर्ण पहुंच मिलती है और वह अमेरिकी टैरिफ या वैश्विक प्रतिस्पर्धा से हाशिये पर जाने के जोखिम को कम करता है। जिन घरेलू क्षेत्रों पर दबाव आएगा, उन्हें नवाचार और अनुकूलन के जरिए मुकाबला करना होगा। रणनीतिक रूप से यह समझौता दिखाता है कि भारत बड़े शक्तिकेंद्रों के साथ संतुलित समझौते कर सकता है और अपनी स्वायत्तता बनाए रख सकता है—यह अमेरिका की एकतरफा व्यापारिक दबावों के खिलाफ एक सूक्ष्म लेकिन प्रभावी जवाब है।
तो क्या यह नरेंद्र मोदी का डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीति को ‘सबक सिखाने’ वाला मास्टरस्ट्रोक है? किसी हद तक हां—लेकिन इसे टकराव के रूप में नहीं, बल्कि आत्मविश्वासी घोषणा के रूप में देखना चाहिए कि भारत की आर्थिक संप्रभुता और वैश्विक साझेदारियां बहु-दिशात्मक हैं, किसी एक शक्ति पर निर्भर नहीं। जो हम देख रहे हैं, वह केवल एक व्यापार समझौता नहीं, बल्कि 21वीं सदी में विश्व अर्थव्यवस्था से भारत के जुड़ाव का निर्णायक मोड़ है। बाजार बोल चुके हैं, राजनयिक दस्तखत कर चुके हैं—अब असली परीक्षा इस ऐतिहासिक करार को करोड़ों लोगों की समृद्धि में बदलने की है।




