किशोर कुमार मालवीय
उच्च शिक्षण संस्थाओं में भेदभाव खासकर जातिगत भेदभाव वाले कानून का दांव मोदी सरकार के लिए उल्टा पड़ गया। एक तरफ देशभर में विरोध की आवाज ने सरकार और भाजपा को सवर्णों की नजर में विलेन बना दिया। ये सवर्ण अबतक भाजपा के वोट बैंक माने जाते रहे हैं।दूसरी तरफ, सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को लागू करने पर रोक लगाते हुए जो तल्ख टिप्पणी की है उससे सरकार को दोहरा झटका लगा है। सोचा तो ये गया था कि मोदी सरकार दलित, आदिवासी और ओबीसी की नजर में हीरो बन जाएगी पर हुआ उल्टा। सवर्ण जातियां सरकार की सोच से नाराज है तो दूसरा पक्ष इस बात से नाराज है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में मजबूत दलील नहीं दी जिससे कानून पर स्टे लग गया। मतलब, माया मिली न राम।
शिक्षण संस्थाओं में भेदभाव मिटाने के लिए सरकार को भेदभाव वाला कानून क्यों लाना पड़ा। क्या इसका सियासी उद्देश्य था ताकि इस साल होने वाले कई राज्यों के चुनाव में फायदा उठाया जाए।खासकर केरल और तमिलनाडू में जहां ओबीसी के मतदाता चुनाव में काफी असर रखते हैं और जो परम्परागत रुप से डीएमके और वामपंथी दलों के वफादार वोट बैंक माने जाते हैं।लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद क्या भाजपा का मकसद पूरा हो पाएगा। क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विश्वनाथ प्रताप सिंह बनने की कोशिश की थी जिसमें वे बुरी तरह विफल रहे क्योंकि दूसरों को खुश करने को लिए उन्होंने अपनो को नाराज कर दिया क्योंकि सरकार के इस फैसले से कुछ विपक्षी पार्टियों ने तो समर्थन कर दिया लेकिन भाजपा के भीतर ही विरोध की आवाज उठी।
13 जनवरी को लागू इस नए कानून का नाम है – UGC उच्च शिक्षा संस्थानों में समता संवर्धन विनियम।ये देशभर के सभी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों पर लागू होगा।भारत के गजट में प्रकाशित होते ही इसका देशभर में विरोध शुरु हो गया।सबसे बड़ा सवाल ये है कि शिक्षण संस्थाओं में भेदभाव मिटाने के लिए बने कानून से किसे और क्यों तकलीफ हो सकती है.. कौन है जो नहीं चाहता कि भेदभाव मिटे।इसे समझने के लिए पहले कानून के बारे में जानना होगा कि आखिर इसमें प्रावधान क्या क्या हैं।इस कानून के मुताबिक हर उच्च शिक्षण संस्थानों में समान अवसर केन्द्र के तहत समता समिति बिठाकर काम करेगी।इस कमेटी को भेदभाव कि शिकायतों की सुनवाई कर फैसला देना होगा।भेदभाव के पीड़ितों की श्रेणी में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी, दिब्यांग के अलावा अत्यंत गरीब तथा पिछड़े क्षेत्रों के लोगों को भी रखा गया है।इस कमेटी में शिक्षक, छात्र, कर्मचारी और सिविल सोसायटी के प्रतिनिधि होंगे। इसमें सामान्य श्रेणी को भी प्रतिनिधित्व देने की बात है पर उसे जरुरी नहीं बनाया गया है। इसे संस्थान के प्रमुख के विवेक पर छोड़ दिया गया है।दिन रात काम करने वाली समता हेल्पलाइन होगी जहां भेदभाव की शिकायत की जा सकती है।पीड़ित छात्र सीधा कमेटी को भी लिखित शिकायत भेज सकते हैं।
भेदभाव के पीड़ितों में दलित और आदिवासी के अलावा ओबीसी को भी रखा गया है। मतलब ये मान लिया गया है कि भेदभाव सिर्फ सामान्य वर्ग के लोग ही करते हैं, बाकि सभी भेदभाव के शिकार होते हैं।विवाद की जड़ यही है। देशभर के छात्रों ने जगह जगह आन्दोलन शुरु कर दिया। विरोध करने वालों का आरोप है कि यह कानून न सिर्फ कैम्पस में जातिगत भेदभाव बढ़ाएगा बल्कि कानून का बेजा इस्तेमाल कर सियासी खुंदक निकाले जा सकते हैं। इससे महज आरोप से छात्रों के करियर बर्बाद हो सकते हैं। जिनपर आरोप लगेगा उसे अपना बेगुनाह साबित करने का अवसर नहीं मिलेगा क्योंकि जो समिति सुनवाई करेगी उसमें सामान्य श्रेणी का प्रतिनिधित्व आवश्यक नहीं होगा।
सरकार की बेरुखी से नाराज सामान्य श्रेणी की तरफ से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाकर कानून रद्द करने की मांग की क्योंकि ये कानून समानता के संवैधानिक अधिकार के विरुद्ध है। सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल कानून लागू करने से ये कहकर रोक दिया कि ये समाज को बांट सकते हैं। अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने जो कुछ कहा वह मोदी सरकार के लिए अच्छा नहीं है। कोर्ट ने कहा कि सबसे पहले तो ये नियम अस्पष्ट है और अगर इसे नहीं रोका गया तो ये समाज पर खतरनाक प्रभाव डाल सकते हैं।कोर्ट ने विश्विद्यालय अनुदान आयोग से 19 मार्च तक अदालत में जवाब दाखिल करने को कहा है।तबतक संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत 2012 में बनाए नियम लागू रहेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने ये सवाल भी पूछा है कि भेदभाव विरोधी इस नियम में रैगिंग को शामिल क्यों नहीं किया गया है। भेदभाव की श्रेणी में हर तरह का भेदभाव होना चाहिए।कोर्ट ने एक विशेषज्ञ कमेटी का गठन कर इस नियम की समीक्षा करने का आदेश भी दिया है।सुप्रीम कोर्ट के स्थगन आदेश के बाद सवर्णों का गुस्सा फिलहाल कम हो गया और विरोध प्रदर्शन रुक गए हैं। लेकिन सब कुछ कोर्ट के अगले रुख और मोदी सरकार के अगले कदम पर निर्भर करेगा कि ये शांति स्थायी होगी या उन्हें फिर भड़कने का मौका दिया जाएगा।
भारतीय जनता पार्टी अब डैमेज कंट्रोल में जुट गई है ताकि दलित, आदिवासी और ओबीसी इस बात पर समर्थन करे कि भाजपा ने कम से कम उनके लिए सोचा और प्रयास किया। दूसरी तरफ, सवर्ण फैसले पर स्टे के बाद भाजपा से जुड़े रहेंगे। वैसे भी उनके पास भाजपा के अलावा कोई विकल्प नहीं है।भाजपा चित भी मेरी और पट भी मेरी का ख्वाब देख रही है।





