अमेरिका से भारत तक: कीमती धातुओं की हलचल

From the US to India: Precious metals movements

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

सोने और चांदी की कीमतों में आई हालिया तीखी गिरावट ने देश ही नहीं, बल्कि वैश्विक वित्तीय बाजारों की धड़कन बढ़ा दी है। जिन कीमती धातुओं को अब तक आर्थिक संकट, युद्ध और मंदी के दौर में सबसे सुरक्षित आश्रय माना जाता था, वही अचानक कमजोरी का प्रतीक बनती दिखीं। निवेशक भ्रमित हैं, ज्वैलरी कारोबारियों की रणनीतियां गड़बड़ा गई हैं और आम उपभोक्ता असमंजस में है। यह गिरावट ऐसे समय पर सामने आई है जब भारत में बजट को लेकर अटकलें तेज हैं और विश्व अर्थव्यवस्था एक नए पुनर्संतुलन के दौर से गुजर रही है। असली सवाल सिर्फ कीमतों के गिरने का नहीं, बल्कि उस अदृश्य शक्ति का है जो बाजार की दिशा तय कर रही है और आने वाले समय की तस्वीर बना रही है।

कुछ ही सप्ताह पहले तक सोना और चांदी रिकॉर्ड स्तरों पर चमक रहे थे। लगातार बढ़ते भावों ने निवेशकों के मन में यह धारणा बना दी थी कि इन धातुओं की कीमतें अब पीछे मुड़कर देखने वाली नहीं हैं। हर हल्की गिरावट को खरीदारी का सुनहरा अवसर समझा जा रहा था। लेकिन बाजार की प्रकृति स्थिर नहीं होती। अचानक मुनाफावसूली का दबाव बढ़ा और तेजी की रफ्तार पर ब्रेक लग गया। भाव इतनी तेजी से नीचे आए कि लंबे समय से बनी तेजी की कहानी एक झटके में कमजोर पड़ती नजर आई। यह गिरावट सामान्य सुधार नहीं, बल्कि बाजार के आत्ममंथन का संकेत बन गई।

वायदा बाजार में इस बदलाव की तस्वीर और भी स्पष्ट दिखाई दी। एमसीएक्स पर सोने और चांदी के अनुबंधों में जोरदार बिकवाली हुई, जिसने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी। अंतरराष्ट्रीय बाजार भी इस दबाव से अछूते नहीं रहे। कॉमेक्स पर सोना नीचे फिसला, जबकि चांदी ने अपेक्षाकृत कहीं ज्यादा कमजोरी दिखाई। विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय से चली आ रही तेज तेजी ने बाजार को ओवरबॉट स्थिति में पहुंचा दिया था। जब कीमतें वास्तविक मांग और आपूर्ति से काफी आगे निकल जाती हैं, तब संतुलन बहाल होना तय होता है। इस बार यह संतुलन तेजी से और बड़े पैमाने पर आया।

इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका की नीतियों को सबसे प्रभावशाली कारक माना जा रहा है। वहां की मौद्रिक नीति से जुड़े संकेतों ने डॉलर को नई मजबूती दी, जिसने वैश्विक बाजारों की दिशा बदल दी। डॉलर जैसे ही मजबूत होता है, वैसे ही सोना और चांदी जैसी डॉलर आधारित संपत्तियों पर दबाव बढ़ने लगता है। विदेशी निवेशकों ने जोखिम घटाने के लिए सुरक्षित निवेश से दूरी बनानी शुरू कर दी और पूंजी का रुख दूसरी परिसंपत्तियों की ओर मोड़ दिया। अमेरिका के फैसले केवल उसकी सीमाओं तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनकी गूंज सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सुनाई देती है और भारत जैसे देशों तक असर पहुंचाती है।

वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने निवेशकों की प्राथमिकताओं को स्पष्ट रूप से बदल दिया है। अब बाजार युद्ध और टकराव की आशंकाओं से ज्यादा ब्याज दरों की दिशा, डॉलर की मजबूती और प्रमुख आर्थिक आंकड़ों पर प्रतिक्रिया दे रहा है। केंद्रीय बैंकों द्वारा सोने की खरीद में आई सुस्ती ने भी मांग की धार को कमजोर किया है। चीन और भारत जैसे बड़े उपभोक्ता देशों में भौतिक मांग अब भी मौजूद है, लेकिन लगातार ऊंचे भावों के बाद वहां भी सतर्कता का भाव बढ़ा है। वैश्विक कर्ज का बढ़ता बोझ और आर्थिक असंतुलन भले ही दीर्घकाल में सोने के पक्ष में खड़े हों, पर अल्पकाल में डॉलर की ताकत ने बाजार पर अपना दबदबा कायम कर लिया है।

भारत में इस गिरावट का असर अपेक्षाकृत अधिक तीव्र रहा, जिसका कारण आयात पर लगने वाले ऊंचे शुल्क और कर संरचना है। बजट से पहले यह बहस तेज हो गई है कि सरकार सोने और चांदी पर लगने वाले शुल्क में बदलाव कर सकती है। यदि शुल्क में कटौती होती है तो कीमतों में और नरमी आने की संभावना है, जिससे मांग को नई ऊर्जा मिल सकती है। इससे तस्करी पर अंकुश लगेगा और संगठित बाजार को मजबूती मिलेगी। इसके विपरीत, यदि राजस्व दबावों के चलते शुल्क बढ़ाया गया तो कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है और उपभोक्ताओं की जेब पर असर और गहरा हो जाएगा।

यह गिरावट किसी आकस्मिक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि वैश्विक नीतिगत बदलावों और आर्थिक संकेतों का स्वाभाविक नतीजा प्रतीत होती है। पिछले वर्षों में जब अनिश्चितता, महामारी और भू-राजनीतिक तनाव चरम पर थे, तब सोना और चांदी निवेशकों की पहली पसंद बने। अब जैसे ही वैश्विक नीतियों का रुख धीरे-धीरे बदलता दिख रहा है, बाजार भी नई दिशा तलाश रहा है। भारत में रुपये की कमजोरी, बढ़ता व्यापार घाटा और सोने का बढ़ता आयात इस परिदृश्य को और जटिल बनाते हैं। सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह आर्थिक विकास को गति देते हुए वित्तीय स्थिरता और बाहरी संतुलन को भी बनाए रखे।

निवेशकों के दृष्टिकोण से यह समय घबराहट का नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण निर्णय लेने का है। तेज गिरावट के बाद कीमतें ऐसे स्तरों के करीब पहुंच सकती हैं जो लंबी अवधि के निवेश के लिए आकर्षक माने जाते हैं। मुद्रास्फीति का दबाव, भू-राजनीतिक जोखिम और वैश्विक मुद्रा व्यवस्था में संभावित बदलाव जैसे कारक आने वाले वर्षों में फिर से सोने और चांदी को समर्थन दे सकते हैं। हालांकि निकट भविष्य में उतार-चढ़ाव बना रहना तय है। ऐसे में जल्दबाजी के बजाय चरणबद्ध निवेश, संतुलित पोर्टफोलियो और जोखिम प्रबंधन की रणनीति अपनाना ही समझदारी भरा कदम माना जा रहा है।

कुल मिलाकर सोने और चांदी में आई मौजूदा कमजोरी को किसी एक देश, एक नीति या एक घटना के दायरे में बांधकर देखना वास्तविकता को अधूरा समझना होगा। अमेरिका की मौद्रिक रणनीतियां, डॉलर की बढ़ती ताकत और बदलती वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां मिलकर इस पूरे परिदृश्य की रूपरेखा तय कर रही हैं। भारत के संदर्भ में आने वाला बजट इस दिशा में निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। यदि नीतिगत स्तर पर राहत और संतुलन का संकेत मिला तो बाजार को स्थिरता का सहारा मिलेगा, लेकिन यदि दबाव बरकरार रहा तो कमजोरी कुछ समय और खिंच सकती है। इतिहास यही सिखाता है कि कीमती धातुएं अल्पकालिक उतार-चढ़ाव के बाद अंततः अपनी चमक लौटाती हैं, शर्त सिर्फ इतनी है कि निवेशक धैर्य, अनुशासन और दूरदर्शिता के साथ निर्णय लें।