सुनील कुमार महला
आज संचार क्रांति का युग है।हर कोई सोशल मीडिया,एआइ का प्रयोग कर रहा है। आधुनिक दौर में सोशल मीडिया ने हमारे अनेक कार्यों को आसान और सरल बनाया है। दूसरे शब्दों में कहें तो सोशल मीडिया ने संवाद को जितना सरल और व्यापक बनाया है, उतना ही जटिल निजता का प्रश्न भी खड़ा कर दिया है। आज व्यक्ति अपने जीवन के निजी क्षण-तस्वीरें,रील बनाकर अपने विचार, स्थान और दिनचर्या स्वेच्छा से सार्वजनिक मंचों पर साझा कर रहा है। यह सब आमतौर पर सोशल मीडिया मंचों पर साझा करना कभी-कभी आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम होता है, तो कई बार अनजाने में अपनी निजता को जोखिम में डालने का कारण बन जाता है। ‘लाइक’ और ‘व्यू’ की होड़ में निजी सीमाएँ धुंधली होती जा रही हैं। यहां यदि हम सरल शब्दों में कहें तो आज के समय में तकनीक हमारी ज़िंदगी की पल-पल की अहम् व महत्वपूर्ण जरूरत बन चुकी है। मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने काम आसान और तेज़ कर दिए हैं, लेकिन इसके साथ एक बड़ा खतरा भी जुड़ा है-निजता का खतरा। आज के समय में अधिकांश लोगों के पास स्मार्टफोन है और वे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन बहुत से लोग यह नहीं जानते कि ऐप या प्लेटफॉर्म पर साइन-अप करते समय जो निजी जानकारी वे देते हैं, उसका गलत इस्तेमाल भी हो सकता है। कई बार यह जानकारी हमारी अनुमति के बिना किसी और को दी जा सकती है। बहरहाल,यहां पाठकों को बताता चलूं कि भारत ही नहीं आज संपूर्ण विश्व स्तर पर स्मार्टफोन उपयोग तेजी से सर्वव्यापी हो चुका है। 2025 के आसपास उपलब्ध ताज़ा वैश्विक अनुमानों के अनुसार दुनिया में लगभग 6.8–7.1अरब लोग स्मार्टफोन का उपयोग कर रहे हैं, जबकि सक्रिय स्मार्टफोन डिवाइसों की संख्या 7 अरब से अधिक मानी जाती है, क्योंकि कई उपयोगकर्ताओं के पास एक से अधिक फोन हैं। इसका अर्थ यह है कि वैश्विक आबादी का करीब 85–90 प्रतिशत हिस्सा किसी न किसी रूप में स्मार्टफोन से जुड़ चुका है। यदि हम यहां पर भारत की बात करें तो देश दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफोन बाजार बन चुका है।साल 2024–2025 के आंकड़ों के अनुसार भारत में स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं की संख्या लगभग 65–70 करोड़ (650–700 मिलियन) है, जो कुल जनसंख्या का करीब 45–50 प्रतिशत बैठती है। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और 4जी/5जी नेटवर्क के विस्तार के कारण यह संख्या तेजी से बढ़ रही है और विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार 2026 तक भारत में स्मार्टफोन उपयोगकर्ता 100 करोड़ के आसपास पहुँच सकते हैं । इस क्रम में यहां यह गौरतलब है कि एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मेटा और व्हाट्सऐप को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने साफ कहा कि कोई भी कंपनी नागरिकों की निजी जानकारी के साथ मनमानी नहीं कर सकती और निजता के अधिकार से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। आज का जमाना डिजिटल है और इस डिजिटल युग में आज मोबाइल नंबर, बैंक खाता, आधार जैसी जगहों पर हमें अपनी निजी और कभी-कभी बायोमेट्रिक जानकारी भी देनी पड़ती है। अगर यह जानकारी गलत हाथों में चली जाए, तो बड़ा नुकसान हो सकता है। समस्या यह भी है कि यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि हमारी जानकारी आखिर कहां-कहां पहुंच चुकी है।सोशल मीडिया पर भी यही खतरा रहता है, क्योंकि ज़्यादातर लोग नियम और शर्तें पढ़े बिना ही ‘सहमति’ दे देते हैं। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में यह बात कही कि ये शर्तें इतनी जटिल भाषा में लिखी जाती हैं कि आम आदमी उन्हें समझ ही नहीं पाता। इसे निजी जानकारी चुराने का एक ‘सभ्य तरीका’ कहा गया, जिसे मंजूरी नहीं दी जा सकती। माननीय कोर्ट ने यह भी कहा कि सुरक्षा और पहचान के नाम पर जानकारी लेना ठीक है, लेकिन जो लोग निजता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। यहां यह कहना ग़लत नहीं होगा कि डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म उपयोगकर्ता की गतिविधियों का सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं-क्या देखा, क्या पसंद किया, कहाँ गए और इस डेटा का उपयोग विज्ञापन, प्रोफाइलिंग और कभी-कभी राजनीतिक या व्यावसायिक हितों के लिए किया जाता है। वास्तव में, डेटा लीक, अनधिकृत ट्रैकिंग और फेक प्रोफाइल जैसी समस्याएँ निजता के हनन को और गंभीर बनाती हैं। परिणामस्वरूप व्यक्ति की पहचान, सुरक्षा और स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।निजता का हनन केवल तकनीकी नहीं, सामाजिक समस्या भी है। बिना अनुमति तस्वीरें साझा करना, ट्रोलिंग, साइबर स्टॉकिंग और ऑनलाइन बदनामी मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं। बच्चों और किशोरों के लिए यह खतरा और बड़ा है, क्योंकि वे डिजिटल जोखिमों को समझे बिना ही ऑनलाइन सक्रिय हो जाते हैं।इस चुनौती का समाधान बहुस्तरीय है। एक ओर सशक्त डेटा संरक्षण कानून, पारदर्शी प्लेटफ़ॉर्म नीतियाँ और कड़ी जवाबदेही आवश्यक है; दूसरी ओर डिजिटल साक्षरता और व्यक्तिगत सावधानी भी उतनी ही ज़रूरी है-मजबूत पासवर्ड, गोपनीयता सेटिंग्स, सीमित साझा करना और अनुमति की संस्कृति। सोशल मीडिया का विवेकपूर्ण उपयोग ही निजता और अभिव्यक्ति के बीच संतुलन स्थापित कर सकता है।





