एक मुलाक़ात ”फ़्लाइट बाबा” से … फ़्लाइट बाबा यानी आकाश का संन्यासी !!

A meeting with “Flight Baba”… Flight Baba means the saint of the sky!!

गोपेन्द्र नाथ भट्ट

एक ऐसे साधु जो हमेशा फ्लाइट में रहते है और किसी देश और शहर में एक दिन से अधिक नहीं ढहरते हैं तथा कभी कभार ही बस या अन्य साधन से यात्रा करते है। उनसे अनायास दिल्ली-जयपुर के बीच यात्रा के दौरान राजस्थान रोडवेज की वॉल्वो बस में मुलाकात हुई, जब उन्होंने अपने सफेद बेग में से दो चाकलेट निकाल कर मेरी और बढ़ाई फिर पास में ही बैठे एक पूर्व सांसद और महिला विधायक के साथ ही बस के ड्राइवर और कंडक्टर को भी चाकलेट का प्रसाद दिया। सफेद पोशाक, अच्छी कठ काठी और सफेद दाढ़ी वाले चेहरें पर अमिट मुस्कराहट वाले इन साधु जी से परिचय हुआ तो उन्होंने बताया कि लोग उन्हें “फ़्लाइट बाबा” कहतें है। फ़्लाइट बाबा यानी आकाश का संन्यासी !!

फ़्लाइट बाबा के ही कहने पर गुगल बाबा को टटोला तो उनके बारे अनगिनित जानकारियां और यू ट्यूब पर अनेक विडियों मिलें । वे बागेश्वर बाबा पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री और वृन्दावन के इंद्रेश जी महाराज सहित कई कथावाचकों की कथाओं में भी भाग लेते है। एक बार तो बागेश्वर महाराज से मिलने लन्दन भी पहुँच गए।

फ़्लाइट बाबा के प्रति जब उत्सुकता बढ़ी तो बातों का सिलसिला जयपुर पहुँचने तक चला। उत्सुकता वश उनसे कई सवाल पूछें जिसके दिलचस्प जवाब मिले । पूछा आपका जन्म कहाँ हुआ ? आप कहाँ के रहने वाले है ? आपके माता पिता, भाई बहन सगे सम्बन्धी कहाँ है? आप किस पंथ से जुड़े है । उन्होंने बताया कि मेरा जन्म जयपुर और दिल्ली के बीच किसी स्थान पर हुआ लेकिन उन्हें स्मरण नहीं !! किसी सम्बन्धी से कोई सम्पर्क नहीं रहा । जब से होश संभाला वृन्दावन में रहा । सारा बचपन वृन्दावन में ही गुजरा । मैंने कोई ग्रन्थ नहीं पढ़े और नहीं कोई औपचारिक शिक्षा दीक्षा ग्रहण की। मैं कोई वक्ता नहीं ,कथा वाचक नहीं हूँ । मेरे गुरु जब तक जीवित थे, मैं उनके सानिध्य में रहा लेकिन उनके परम धाम पधार जाने के बाद मैंने अपने जीवन में “चरैवेति-चरैवेति” के मूल मंत्र को अपनाया । “चरैवेति-चरैवेति” का अर्थ है “चलते रहो, चलते रहो”। उल्लेखनीय है कि संस्कृत का यह वाक्यांश ऐतरेय ब्राह्मण से लिया गया है, जो जीवन में बिना रुके, बिना थके निरंतर प्रगति करने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। इसका उद्देश्य विषम परिस्थितियों में भी मेहनत के बल पर जीवन को सफल बनाना है।

अद्भुत कल्पना है ,यह साधु न किसी आश्रम में टिकते है, न किसी गुफ़ा में।उनका आश्रम एयरपोर्ट हैं,उनकी कुटिया फ़्लाइट की सीट और उनका मार्ग आकाश है । फ़्लाइट बाबा की प्रतिज्ञा भी अजीब है किसी भी देश, किसी भी शहर में एक दिन से ज़्यादा नहीं रुकना।सूरज उगता है एक महाद्वीप में,तो ढलता है दूसरे में। उनके पास न ज़मीन है, न संपत्ति, बस एक छोटा सा बैग है जिसमें कुछ वस्त्र, एक डायरी,चाकलेट का प्रसाद और दुनिया भर के अनुभव भरे हैं।वह कहते है उनका मानना है “रुकना ही बंधन है,चलते रहना ही मुक्ति।”कभी टोक्यो की सुबह,तो कभी पेरिस की रात,अगले दिन दुबई की दोपहर और फिर न्यूयॉर्क की भोर। लोग उनसे पूछते हैं आपका घर कहाँ है? वह मुस्कुरा कर कहते है“जिस फ़्लाइट/वाहन में बैठा हूँ,वही मेरा घर है।”

फ़्लाइट बाबा धर्म नहीं सिखाते,वह अनासक्ति सिखाते है। वह उपदेश नहीं देतें,बस उड़ते रहते है और कहते है कि
दुनिया को देखो,पर उससे बंधो मत।

आकाश में बसेरा, उड़ान में जीवन ‘फ़्लाइट बाबा’ आधुनिक युग का चलता-फिरता ऐसे संन्यासी है जिनका न तो किसी से बंधन है और न ही कोई मोह ।

यह बाबा किसी मंदिर,आश्रम,गुफ़ा अथवा पहाड़ों में नहीं, ग्लोबल गाँव में साधना करते है। जहाँ उड़ान, वहीं घर…जब किसी ने उससे पूछा इतनी यात्रा क्यों? वह मुस्कुराए और बोले “क्योंकि जीवन ठहरने के लिए नहीं, समझने के लिए है।”दुनिया जब ठहराव और स्थायित्व को सफलता का पैमाना मान रही है, उसी दौर में यह एक ऐसे साधु है जिन्होंने ठहरने को त्याग और निरंतर उड़ान को साधना बना लिया है। लोग उन्हें किसी नाम से नहीं, बल्कि पहचान से जानते हैं ‘फ़्लाइट बाबा’। यह वह संन्यासी है जो हमेशा हवाई जहाज़ में रहता है और किसी भी देश या शहर में एक दिन से अधिक नहीं ठहरता। फ़्लाइट बाबा का आश्रम किसी पहाड़ पर नहीं, बल्कि दुनिया के बड़े-छोटे एयरपोर्ट हैं। उसकी कुटिया विमान की इकॉनमी सीट हो सकती है, तो कभी ट्रांज़िट लाउंज की कुर्सी। वह कहते है कि“जहाँ प्रतीक्षा है,वहीं ध्यान है।”न वीज़ा की चिंता, न समय का बंधन ..फ़्लाइट बाबा के पास न कोई स्थायी पता है, न नागरिकता का मोह। उसके पासपोर्ट पर देशों की मुहरें किसी तीर्थ-यात्रा की तरह दर्ज हैं। टोक्यो, सिडनी, दुबई, इस्तांबुल, पेरिस, न्यूयॉर्क,लंदन आदि उनके लिए ये शहर गंतव्य नहीं, क्षणिक पड़ाव हैं।वह सुबह किसी एशियाई शहर में चाय पीते है और रात यूरोप में बिताते है। अगले दिन अफ्रीका या अमेरिका की ओर उड़ान। उनकी प्रतिज्ञा साफ है “24 घंटे से ज़्यादा कहीं नहीं रुकना।”

परंपरागत संन्यास में जहाँ वस्त्र, परिवार और संसार का त्याग होता है, फ़्लाइट बाबा ने स्थायित्व का त्याग किया है। वह कहते है
“आज का मनुष्य जगह बदल लेता है, लेकिन आसक्ति नहीं छोड़ता। मैंने जगह नहीं, रुकने की आदत छोड़ी है।” उनके पास सिर्फ़ एक छोटा सा बैग है। कुछ कपड़े, एक डायरी, और एक पुराना मोबाइल। न सोशल मीडिया पर सक्रियता, न प्रचार की चाह। लोग जब पहचानते हैं, तभी वह बोलते है, वरना मौन उसकी भाषा है। फ़्लाइट बाबा के लिए एयरपोर्ट केवल यात्रा का साधन नहीं, बल्कि मानव सभ्यता का दर्पण हैं।वह कहते है

“यहाँ सबसे ज़्यादा भागते लोग मिलते हैं, लेकिन सबसे कम शांति।”वह यात्रियों को देखते है किसी की आँखों में उम्मीद, किसी में डर, किसी में थकान। उसी भीड़ में बैठकर वह ध्यान करते है। कभी-कभी कोई जिज्ञासु पूछ लेता है आप क्या करते हैं? वह बस मुस्कुरा देते है “मैं देखता हूँ।”कोई उपदेश नहीं, बस उदाहरण फ़्लाइट बाबा न प्रवचन देते है, न शिष्य बनाता है। वह किसी धर्म, पंथ या संगठन से नहीं जुड़ा हुआ है। उनका मानना है कि आज के समय में सबसे बड़ा उपदेश है जी कर दिखाना। वह कहते है“अगर एक व्यक्ति मुझे देखकर अपने भीतर की जड़ता पहचान ले, तो मेरी यात्रा सफल है।”

समाजशास्त्री और अध्यात्म से जुड़े लोग फ़्लाइट बाबा को आधुनिक युग के संन्यास का प्रतीक मानते हैं जहाँ संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए बंधन से मुक्त होना ही साधना है। एक वरिष्ठ विचारक के अनुसार,“फ़्लाइट बाबा तकनीक और अध्यात्म के संगम का जीवंत उदाहरण है। वह दिखाते है कि त्याग अब जंगल में नहीं, भीड़ में साधा जा सकता है। ”जहाँ उड़ान, वहीं घर”
जब उनसे पूछा कि आपके पासपोर्ट आधार आदि कैसे बनते है ? प्रतिदिन के खर्चे कौन उठाता है? तो हँस कर बोले आप जैसे किसी भगत को ठग लेते है और उसके साथ ही सभी की हँसी का फव्वारा फूट पड़ा ।

जब उनसे फिर सवाल किया कि आपका घर कहाँ है? तो उन्होंने आसमान की ओर देखा और कहा “जिस फ़्लाइट/वाहन में बैठा हूँ, वही मेरा घर है।”शायद यही कारण है कि फ़्लाइट बाबा कहीं दिखाई नहीं देते , लेकिन हर जगह महसूस होता है। एक चलते-फिरते विचार की तरह,एक उड़ती हुई साधना की तरह।