टैरिफ में ट्रंप की पीछे हट और मोदी की रणनीतिक जीत: अमेरिका क्यों झुका, भारत को क्या मिलेगा और रूस-चीन के बीच संतुलन की कठिन डगर

Trump's tariff retreat and Modi's strategic victory: Why the US capitulated, what India will gain, and the difficult path of balancing Russia and China

निलेश शुक्ला

जब अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर टैरिफ में 18 प्रतिशत तक की कटौती की घोषणा की—और वह भी प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में सबसे कम दर पर—तो इसे औपचारिक तौर पर एक सामान्य व्यापारिक निर्णय बताया गया। लेकिन हकीकत इससे कहीं ज़्यादा गहरी और राजनीतिक है। यह फैसला न तो अचानक था, न ही उदारता का परिणाम। यह डोनाल्ड ट्रंप की मजबूरी थी और नरेंद्र मोदी की रणनीतिक धैर्यपूर्ण कूटनीति का प्रतिफल।

यह केवल व्यापार का मामला नहीं है। यह उस बदलती वैश्विक व्यवस्था का संकेत है जहाँ अमेरिका अब भारत को नाराज़ करने का जोखिम नहीं उठा सकता, और भारत ने यह सीख लिया है कि रणनीतिक अस्पष्टता को किस तरह राष्ट्रीय हित में बदला जाए।

डोनाल्ड ट्रंप क्यों झुके? टैरिफ कटौती के पीछे की मजबूरियाँ
डोनाल्ड ट्रंप की पहचान आक्रामक आर्थिक राष्ट्रवाद से रही है। “अमेरिका फर्स्ट” सिर्फ नारा नहीं, उनकी राजनीतिक प्रवृत्ति है। चीन, यूरोप और यहाँ तक कि सहयोगी देशों पर टैरिफ थोपना उनके लिए सामान्य बात रही है। ऐसे में भारत को दी गई यह राहत सवाल खड़े करती है—आख़िर अमेरिका ने रुख क्यों बदला?

पहली और सबसे बड़ी वजह है चीन। अमेरिका-चीन टकराव अब केवल व्यापार घाटे तक सीमित नहीं है। यह तकनीक, सेमीकंडक्टर, सप्लाई चेन, इंडो-पैसिफिक सुरक्षा और वैश्विक नेतृत्व की लड़ाई है। इस रणनीतिक संघर्ष में भारत कोई वैकल्पिक खिलाड़ी नहीं, बल्कि अनिवार्य साझेदार है। भारत को टैरिफ दबाव में लेना सीधे-सीधे उसे चीन के और करीब धकेल सकता था—और यह जोखिम वॉशिंगटन नहीं उठा सकता।

दूसरी मजबूरी है अमेरिका की घरेलू अर्थव्यवस्था। भारतीय फार्मास्यूटिकल्स, आईटी सेवाएँ, इंजीनियरिंग उत्पाद और उपभोक्ता वस्तुएँ अमेरिकी बाज़ार और सप्लाई चेन का अहम हिस्सा हैं। भारतीय आयात पर ऊँचे टैरिफ का बोझ अंततः अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं पर ही पड़ता है, खासकर ऐसे समय में जब महँगाई पहले से राजनीतिक मुद्दा बनी हुई है। चुनावी साल में ट्रंप यह जोखिम नहीं ले सकते थे।

तीसरी और शायद सबसे अहम वजह है अमेरिका की वैश्विक विश्वसनीयता। अफगानिस्तान से वापसी, यूक्रेन युद्ध की थकान, नाटो सहयोगियों के साथ तनाव—इन सबने अमेरिका की नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में भारत एक ऐसा साझेदार है जो बिना अधीनता स्वीकार किए स्थिरता और संतुलन प्रदान कर सकता है। टैरिफ में कटौती भारत को दिया गया संकेत है कि अमेरिका साझेदारी चाहता है, टकराव नहीं।

मोदी का ‘ट्रंप कार्ड’: शोर नहीं, स्थिर रणनीति
नरेंद्र मोदी की अमेरिकी नीति की खासियत यह रही है कि उन्होंने दिखावे और वास्तविकता के बीच संतुलन साधा। मंचों पर गर्मजोशी दिखी, लेकिन असली काम शांत कूटनीति में हुआ।

जब अमेरिका ने पहले टैरिफ बढ़ाए, भारत ने न तो आक्रामक जवाबी युद्ध छेड़ा, न ही आत्मसमर्पण किया। भारत ने रक्षा सहयोग बढ़ाया, इंडो-पैसिफिक में साझेदारी की, तकनीक और जलवायु जैसे मुद्दों पर तालमेल रखा—लेकिन रूस, ईरान या घरेलू उद्योग नीति पर कोई समझौता नहीं किया।

यही निरंतरता भारत की ताकत बनी। अमेरिका समझ गया कि भारत दबाव में फैसले नहीं करता। टैरिफ कटौती इसी स्वीकारोक्ति का नतीजा है। मोदी का असली “ट्रंप कार्ड” व्यक्तिगत समीकरण नहीं, बल्कि भारत की अपरिहार्यता थी।
क्या भारत अमेरिका के साथ नज़दीकी रखते हुए रूस और चीन से संबंध साध पाएगा?

यह सबसे कठिन और सबसे अहम सवाल है।

आज भारत की विदेश नीति तीन ध्रुवों पर टिकी है—अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी, रूस के साथ ऐतिहासिक और ऊर्जा संबंध, और चीन के साथ प्रतिस्पर्धी सह-अस्तित्व। आलोचक कहते हैं कि अमेरिका के करीब जाना अंततः भारत को पक्ष चुनने पर मजबूर करेगा। लेकिन हालिया घटनाएँ कुछ और ही कहानी कहती हैं।

रूस के मामले में भारत ने पश्चिमी दबाव के बावजूद तेल आयात और रक्षा सहयोग जारी रखा। यह भावनात्मक नहीं, व्यावहारिक निर्णय है। सस्ता रूसी तेल भारत की महँगाई को नियंत्रित करता है। रक्षा उपकरण राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हैं।

अमेरिका असहज होने के बावजूद इस सच्चाई को समझता है।

चीन के साथ संबंध कहीं ज़्यादा जटिल हैं। सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन और रणनीतिक अविश्वास बना हुआ है। लेकिन भारत ने न तो पूर्ण आर्थिक बहिष्कार किया, न ही खुला टकराव चुना। अमेरिकी टैरिफ राहत भारत को आर्थिक मजबूती देती है, जिससे वह चीन पर निर्भरता कम कर सकता है—बिना सीधे टकराव के।

असल में भारत किसी के खिलाफ नहीं, अपने हित में गठबंधन कर रहा है। रणनीतिक स्वायत्तता अब नारा नहीं, अभ्यास बन चुकी है।

किन भारतीय क्षेत्रों को टैरिफ कटौती से सबसे ज़्यादा फायदा होगा?

यह राहत कई भारतीय क्षेत्रों के लिए अवसर का द्वार खोल सकती है।

सबसे बड़ा लाभ फार्मास्यूटिकल उद्योग को होगा। अमेरिका भारतीय जेनेरिक दवाओं पर निर्भर है। कम टैरिफ से भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और बायोसिमिलर जैसे उच्च मूल्य वाले क्षेत्रों में निवेश को बढ़ावा मिलेगा।

टेक्सटाइल और परिधान उद्योग, जो बांग्लादेश और वियतनाम से पिछड़ गया था, को नई सांस मिल सकती है—खासतौर पर तकनीकी और टिकाऊ वस्त्रों में।

इंजीनियरिंग सामान और ऑटो कंपोनेंट्स के लिए यह बड़ा अवसर है। PLI योजनाओं से मजबूत हो रहा भारतीय विनिर्माण अब अमेरिकी बाज़ार में और आक्रामक हो सकता है।

इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी हार्डवेयर में भी फायदा संभव है। चीन से सप्लाई चेन हटाने की अमेरिकी कोशिशों में भारत अधिक आकर्षक विकल्प बन सकता है।

यहाँ तक कि कृषि और खाद्य प्रसंस्करण निर्यात—जैसे समुद्री उत्पाद और विशेष फसलें—भी लाभान्वित हो सकती हैं, बशर्ते घरेलू लॉजिस्टिक्स सुधरे।

क्या यह अस्थायी राहत है या दीर्घकालिक बदलाव?
संशयवादी याद दिलाते हैं कि ट्रंप अप्रत्याशित हैं। टैरिफ लौट भी सकते हैं। लेकिन यह फैसला केवल चुनावी चाल नहीं लगता। अमेरिका-भारत संबंध अब एक मनोवैज्ञानिक सीमा पार कर चुके हैं।

भारत को अब केवल बाज़ार या चीन के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता के साझेदार के रूप में देखा जा रहा है। व्यापार नीति में यह बदलाव उसी सोच का प्रतिबिंब है।

अनिश्चित दुनिया में एक गणनात्मक जीत
डोनाल्ड ट्रंप का टैरिफ से पीछे हटना उदारता नहीं, यथार्थ की स्वीकृति है। अमेरिका को भारत की ज़रूरत है—चाहे वह खुले तौर पर स्वीकार करे या नहीं। नरेंद्र मोदी सरकार ने दबाव में झुकने के बजाय धैर्य और संतुलन से इस ज़रूरत को ताकत में बदला है।

अब असली परीक्षा भारत की है। क्या यह कूटनीतिक सफलता औद्योगिक विकास में बदलेगी? क्या अमेरिका से नज़दीकी रखते हुए रणनीतिक स्वायत्तता बनी रहेगी? क्या रूस और चीन के साथ संतुलन कायम रह पाएगा?

फिलहाल तस्वीर सकारात्मक है। एक ऐसे दौर में जहाँ दुनिया सरल ध्रुवीकरण की आदी हो चुकी है, भारत यह दिखा रहा है कि सूक्ष्मता भी शक्ति हो सकती है—और कई बार सबसे प्रभावी चाल वही होती है, जो बिना शोर के चली जाए।