जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं हैं परीक्षाएँ

Exams are not the ultimate goal of life

डॉ. विजय गर्ग

आज के समय में परीक्षाएँ जीवन का केंद्रबिंदु बनती जा रही हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो जीवन की सफलता और असफलता का पूरा निर्णय कुछ घंटों की परीक्षा और कुछ अंकों की सूची में सिमट गया हो। बच्चे, अभिभावक और समाज—सभी अनजाने में यह मान बैठे हैं कि परीक्षाएँ ही जीवन का अंतिम लक्ष्य हैं। जबकि सच्चाई यह है कि परीक्षाएँ जीवन का एक पड़ाव हैं, पूरा जीवन नहीं।

परीक्षाएँ साधन हैं, साध्य नहीं

परीक्षाओं का उद्देश्य व्यक्ति की समझ, ज्ञान और तैयारी का आकलन करना है। वे यह नहीं माप सकतीं कि कोई व्यक्ति कितना संवेदनशील, रचनात्मक, नैतिक या मानवीय है। इतिहास गवाह है कि जीवन में महान कार्य करने वाले अनेक लोगों ने परीक्षाओं में औसत या असफल प्रदर्शन किया, लेकिन उन्होंने अपने आत्मविश्वास, परिश्रम और उद्देश्य के बल पर असाधारण मुकाम हासिल किया।

अंकों से बड़ा है आत्मबोध

अंक केवल काग़ज़ पर दर्ज संख्याएँ हैं, जबकि जीवन बहुआयामी अनुभवों का नाम है। परीक्षाएँ यह नहीं बतातीं कि कोई व्यक्ति संकट में कैसा व्यवहार करता है, असफलता से कैसे उबरता है या समाज के प्रति उसकी संवेदनशीलता कितनी गहरी है। वास्तविक शिक्षा वह है जो व्यक्ति को सोचने, समझने और सही निर्णय लेने में सक्षम बनाए।

दबाव और तनाव की बढ़ती कीमत

परीक्षाओं को अंतिम लक्ष्य मान लेने का सबसे बड़ा दुष्परिणाम है—तनाव। अत्यधिक अपेक्षाएँ, तुलना और भय बच्चों को मानसिक रूप से कमजोर कर देती हैं। पढ़ाई का उद्देश्य ज्ञान अर्जन की जगह अंक अर्जन बन जाता है। परिणामस्वरूप रचनात्मकता, जिज्ञासा और सीखने का आनंद खो जाता है।

जीवन की परीक्षा हर दिन होती है

जीवन की असली परीक्षाएँ परीक्षा कक्ष के बाहर होती हैं—जब हमें ईमानदारी और लाभ में से एक चुनना होता है, जब असफलता के बाद फिर से खड़ा होना पड़ता है, जब दूसरों के प्रति करुणा दिखानी होती है। ये वे परीक्षाएँ हैं जिनका कोई प्रश्नपत्र नहीं होता, पर जिनका परिणाम जीवन की दिशा तय करता है।

अभिभावकों और समाज की भूमिका

अभिभावकों और शिक्षकों का दायित्व है कि वे बच्चों को यह समझाएँ कि परीक्षाएँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सर्वोपरि नहीं। बच्चों को उनकी रुचियों, क्षमताओं और व्यक्तित्व के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए। तुलना के बजाय सहयोग और प्रतिस्पर्धा के बजाय आत्म-विकास को महत्व देना समय की माँग है।

सफलता की व्यापक परिभाषा

सफल वही नहीं है जिसके पास सबसे अधिक अंक या डिग्रियाँ हों, बल्कि वही सफल है जो संतुलित, संवेदनशील और समाज के लिए उपयोगी हो। जीवन का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं, बल्कि एक बेहतर इंसान बनना है।

निष्कर्ष

परीक्षाएँ जीवन की यात्रा में मील के पत्थर हो सकती हैं, मंज़िल नहीं। जब हम यह समझ लेते हैं, तब पढ़ाई बोझ नहीं, साधना बन जाती है। जीवन का अंतिम लक्ष्य ज्ञान, चरित्र और मानवता का विकास है—परीक्षाएँ नहीं।