अरावली की पहाड़ियों में दरारों से बड़ा मरुस्थलीकरण का खतरा

Cracks in the Aravalli Hills pose a major threat of desertification

बड़े खतरे का संकेत हैं अरावली की दरारें

प्रमोद भार्गव

अरावली पहाड़ियों में उत्खनन से बढ़ रहे खतरे का संकेत पर्यावरण के संरक्षक यू हीं नहीं दे रहे थे ? अब इन अनुमानों का सत्य इस पर्वतमाला में पड़ी 12 दरारों से सामने आ गया है। इस कारण अरावली पर्वत श्रृंखलाएं न केवल लगातार कमजोर हुई हैं, बल्कि ये थार रेगिस्तान से पूर्व की ओर खिसकना भी षुरू हो गई हैं। इसके चलते राजस्थान के जयपुर सहित पूर्वी हिस्सों हरियाणा, दिल्ली-राजधानी क्षेत्र और गंगा-यमुना के मैदानी इलाकों के मरुस्थलीकरण में बदलने का खतरा बढ़ गया है। यह जानकारी वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ओर से जारी रिपोर्ट में 1972-75, 1982-84, 1994-96 और विषेश रूप से 2005-2007 के कालखंड में किए गए क्रमिक उपग्रह आधारित अध्ययनों में यह चिंताजनक खुलासा किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार अरावली पर्वतमाला पर बनी 12 बड़ी दरारों के माध्यम से रेगिस्तानी रेत पूर्व की ओर बढ़ रही है। वर्श 2005-07 के बाद अरावली की रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकने वाली क्षमता में तीव्रता से गिरावट दर्ज की गई है, क्योंकि इसी दौर में गुड़गांव समेत दिल्ली राजधानी क्षेत्र में षहरीकरण के साथ औद्योगिक-प्रौद्योगिक विस्तार के लिए वनों की कटाई के साथ पत्थर उत्खनन में आई तेजी चरम पर पहुंच गई। नतीजतन पर्वतमाला की 12 प्रमुख दरारें अजमेर की मगरा पहाड़ियों से निकलकर झुंझूनूं के खेतड़ी और माधोगढ़ होते हुए हरियाणा के महेंद्रगढ़ तक फैली हुई है। इन्हीं कमजोर हिस्सों से लेकर थार रेगिस्तान की रेत पूर्व की ओर फेल रही है। राजस्थान केंद्रिय विष्वविद्यालय ने भी अपने अध्ययन से चेताया था कि आने वाले वर्शों में रेगिस्तान से उठने वाले रेत के तूफान दिल्ली और एनसीआर तक पहुंचकर इनके पर्यावरण को बड़ी मात्रा में बिगाड़ने का काम कर सकते हैं। लेकिन इन सर्वेक्षणों और अध्ययनों को राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली की राज्य सरकारों समेत केंद्र सरकार भी अनदेखा करते हुए कथित विकास के विनाषकारी उपायों को बढ़ावा देती रहीं।

अरावली पहाड़ियां दुनिया की प्राचीनतम पर्वत श्रृंखलाएं हैं। लगभग 692 किलोमीटर के दायरे में फैली ये पहाड़ियां गुजरात से शुरु होकर राजस्थान, हरियाणा होते हुए दिल्ली तक पसरी हैं। इन पहाड़ियों का मानव समुदाय के लिए प्राकृतिक महत्व है। इस क्षेत्र में रहने वाले जीव-जगत की सांसें इन पर्वतमालाओं से गुजरने वाली षुद्ध हवा पर निर्भर हैं। इन्हीं पहाड़ियों की ओट पष्चिमी रेगिस्तान को फैलने से रोके हुए है, अन्यथा हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेष की जो उपजाऊ भूमि है, उसे रेगिस्तान में तब्दील होने में समय नहीं लगेगा ? पहाड़ियों की हरियाली नश्ट होने से इस क्षेत्र में शुष्कता का विस्तार हो रहा है और गर्मी बढ रही है। नतीजतन जल स्तर आषंका से कहीं ज्यादा नीचे जा रहा है। लोगों में सांस और दमा की बीमारियां बढ़ रही हैं। ये परिणाम नेता, अधिकारी और ठेकेदारों के अकूत लालच की देन हैं। अतएव रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि ये पर्वत श्रृंखलाएं समान पर्रिस्थतियों में तापमान को डेढ़ से ढाई डिग्री तक नियंत्रित रखने और भू-जल के पुनर्भरण में अहम् भूमिका निभाती है। इनमें प्रति हेक्टेयर 20 लाख लीटर भू-जल पुनर्भरण की अद्वितीय क्षमता है। श्रृंखलाओं के लगातार क्षरण एवं मरुस्थलीकरण के खतरे से दिल्ली और आसपास के भू-भागों का तापमान बढ़ा है, धूल से भरी आंधियों की अवधि बढ़ी व तीव्र हुई है। इस कारण भू-जल घटा है। रिपोर्ट में उल्लेख है कि हरियाणा की 8.2 प्रतिषत भूमि मरुस्थलीकरण के दायरे में है, क्योंकि 2019 तक ही अरावली का लगभग 5.77 लाख हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र उत्खनन से तबाह हो चुका था। साफ है, जानकारी होने के बावजूद अरावली संकट को कथित विकास के लिए नजरअंदाज किया गया।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देष पर अरावली पहाड़ियों में उत्खनन को परिभाशित किया गया था। जो अत्यंत विवादित रहा।इस परिभाषा से संरचनात्मक विरोधाभास की स्थिति निर्मित हुई,लगा कि यह स्थिति अनियंत्रित खनन को बढ़ाएगी। केंद्रीय वन एवं पयर्यावरण मंत्रालय ने इसे परिभाशित करते हुए अपनी रिपोर्ट में न्यायालय को बताया था कि सौ मीटर से ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली पर्वतमालाएं माना जाएगा। अर्थात 99 मीटर से ऊंची पहाड़ियां अरावली का हिस्सा नहीं रह जाएंगी। मसलन अरावली के बड़े क्षेत्र में उत्खनन का रास्ता खुल जाएगा। इससे यह आशंका उजागार हुई कि आखिर सरकार पहाड़ियों को इस तरह से परिभाषित करके किसके हित साधना चाहती है ? जबकि इन पहाड़ियों की ऊंचाईं के कारण ही, ये पहाड़ियां प्राकृतिक रूप से उड़ने वाली धूल को रोकने का काम करती हैं। ये रेतैली हवाएं मैदानी इलाकों में नहीं पहुंच पातीं, फलस्वरूप ये मैदान मरुस्थल में तब्दील नहीं हो पा रहे हैं। इस परिभाशा के साथ यह भी कहा गया कि अरावली के कुल 1.44 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में से फिलहाल 0.19 प्रतिषत भू-भाग में ही उत्खनन के पट्टे दिए जा रहे हैं। इस भू-भाग का भी लगभग 68,000 एकड़ क्षेत्रफल होता है, जो बहुत बड़ा क्षेत्र है। क्योंकि इन पर्वतमालाओं का परिस्थितिकी महत्व अमूल्य है। इसीलिए इसके व्यापक पुनर्स्थापन और ठोस संरक्षण की जरूरत है, न कि पहाड़ियों को संदिग्ध रूप में परिभाशित करके इनके दोहन की ? क्योंकि विधायिका और कार्यपालिका की सांठगांठ के चलते यह भी कोई गारंटी नहीं कि उत्खनन निर्धारित क्षेत्र में ही होगा ?

अरावली पर्वतमालाएं मैदानी क्षेत्रों को रेगिस्तान में बदलने से तो रोकती ही हैं, इन्हीं पहाड़ियों से कई छोटी-बड़ी नदियों के उद्गम स्थल हैं। अनेक झील, झरने और तालाब इन पर्वतमालाओं के बीच में प्राकृतिक रूप से अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। यही नहीं इन पहाड़ियों के गर्भ में इमारती पत्थर, संगमरमर, ग्रेनाइट और चूना बड़ी मात्रा में समाया हुआ है। साथ ही जस्ता, तांबा, लेड और टंगस्टन जैसे दुर्लभ खनिज भी इनकी कोख में अंगड़ाई ले रहे हैं। इसलिए पत्थर का उत्खनन हो या दुर्लभ खनिजों का इन्हें पर्यावरण को क्षति पहुंचाए बिना प्राप्त करने के उपाय किए जाने चाहिए। इसे वर्तमान विकास की विडंबना ही कहा जाएगा कि अधिकतम प्राकृतिक संपदाओं का दोहन वर्तमान आधुनिक एवं आर्थिक विकास का नीतिगत आधार बना दिए गए हैं। लेकिन हमारे यहां जिस निर्लज्जता से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन जारी है, उस परिप्रेक्ष्य में मौजूदा आर्थिक विकास की निरंतरता तो बनी ही नहीं रह पाएगी, दीर्घकालिक दृष्टि से देंखे तो विकास की यह आवधारणा उस बहुसंख्यक आबादी के लिए जीने का भयावह संवैधानिक संकट खड़ा कर सकती है, जिसकी रोजी-रोटी की निर्भरता प्रकृति पर ही अवलंबित है। हालांकि अब उपग्रह सर्वेक्षणों के खुलासे के बाद षीर्श न्यायालय ने अपने दिए फैसले पर नए सिरे से पुनर्विचार का निर्णय ले लिया है। इसलिए यह उम्मीद बंधी है कि अब अरावली के पूर्व फैसले पर मात्र प्रतिबंध ही नहीं, फैसला ही निरस्त होने का आदेश आएगा ? जिसके परिप्रेक्ष्य में पर्यावरण संरक्षण की भूमिका औद्योगिक विकास व वाणिज्यिक लाभ-हानि के गुणा-भाग से परे जल, जंगल और जमीन के रख-रखाव के पैमाने पर होगी ?