कलीयुग में शिव-संकल्प का विराट प्रयोग

The grand experiment of Shiva's resolve in Kaliyuga

12 ज्योतिर्लिंगों में एक साथ कोटि अतिरुद्र महायज्ञ : हर्षदभाई व्यास से विशेष संवाद

कलीयुग को सामान्यतः यज्ञों और तपस्याओं से दूर माना जाता है, लेकिन जब किसी साधक के भीतर संकल्प, श्रद्धा और गुरु-कृपा एक साथ जाग्रत होती है, तब असंभव भी संभव होने लगता है। ऐसा ही एक विराट संकल्प आकार ले रहा है—19 फरवरी 2026 से 27 फरवरी 2026 तक, भारत के सभी 12 ज्योतिर्लिंगों में एक साथ आयोजित होने जा रहा “कोटि अतिरुद्र महायज्ञ माला”।

इस अभूतपूर्व आयोजन के सूत्रधार हैं जामनगर के हर्षदभाई व्यास , जो स्वयं को आयोजक से अधिक शिव का माध्यम मानते हैं।

इस विशेष बातचीत में हर्षदभाई न केवल यज्ञ की अवधारणा को स्पष्ट करते हैं, बल्कि यह भी बताते हैं कि यह आयोजन केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि मानव चेतना, ब्राह्मण तेज और विश्व कल्याण का आध्यात्मिक अभियान है।

प्रश्न 1 : सबसे पहले आपका स्वागत है। आप अपने बारे में और इस विराट यज्ञ के संकल्प के जन्म की कथा बताइए।
हर्षदभाई:
मैं स्वयं को किसी पद या पहचान में सीमित नहीं करता। मैं एक साधारण शिव-भक्त हूँ। जीवन में व्यापार, परिवार, समाज—सब कुछ रहा, लेकिन भीतर एक रिक्तता थी। शिव-उपासना मेरे लिए पूजा नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति बन गई।

मेरे गुरुओं और अनेक संतों के सान्निध्य में यह भाव प्रबल हुआ कि यदि ब्राह्मण तेज क्षीण होगा, तो समाज और राष्ट्र की चेतना भी कमजोर होगी। उसी क्षण यह संकल्प जन्मा—कुछ ऐसा किया जाए जो व्यक्तिगत मोक्ष से आगे जाकर समाज और विश्व के लिए कल्याणकारी हो। यहीं से कोटि अतिरुद्र महायज्ञ का बीज पड़ा।

प्रश्न 2 : “एक कोटि अतिरुद्र महायज्ञ”—साधारण श्रद्धालुओं के लिए इसे सरल शब्दों में समझाइए।
हर्षदभाई:
रुद्र स्वयं चेतना हैं। रुद्राभिषेक केवल जल चढ़ाना नहीं, बल्कि मानव और ब्रह्मांड के बीच ऊर्जा का सेतु है।
जब करोड़ों रुद्र मंत्र एक विशेष विधि और संकल्प से उच्चारित होते हैं, तब उसे कोटि अतिरुद्र कहा जाता है। इसका अर्थ है—करोड़ों बार शिव-तत्व का आवाहन।

यह यज्ञ व्यक्ति को सीमित “मैं” से निकालकर शिवोहम की अनुभूति की ओर ले जाता है। इसका प्रभाव केवल साधक तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वातावरण, प्रकृति और समाज तक फैलता है।

प्रश्न 3 : आपका दावा है कि कलीयुग में पहली बार यह यज्ञ 12 ज्योतिर्लिंगों में एक साथ हो रहा है। इसका आधार क्या है?
हर्षदभाई:
यह दावा भावनात्मक नहीं, बल्कि शास्त्र, परंपरा और विद्वानों के अध्ययन पर आधारित है। काशी और सोमनाथ में कोटि अतिरुद्र यज्ञ के प्रमाण मिलते हैं, लेकिन एक ही कालखंड में, सभी 12 ज्योतिर्लिंगों को यज्ञ-माला में जोड़ने का उदाहरण नहीं मिलता।

हमने कई वरिष्ठ संतों, शंकराचार्य परंपरा से जुड़े विद्वानों और अनुभवी ब्राह्मणों से चर्चा की। सभी का मत यही था कि कलीयुग में यह प्रथम प्रयास है, और संभवतः शिव की ही प्रेरणा से यह हो रहा है।

प्रश्न 4 : 12 ज्योतिर्लिंगों में एक साथ यज्ञ—यह तो अत्यंत कठिन कार्य होगा। यह समन्वय कैसे संभव हुआ?
हर्षदभाई:
यह मानव प्रयास कम और शिव कृपा अधिक है। देश के विभिन्न राज्यों में स्थित ज्योतिर्लिंगों के मंदिर ट्रस्ट, पुजारी और स्थानीय साधक—सभी ने इसे शिव कार्य मानकर सहयोग किया।

तकनीकी समन्वय, यज्ञ कुंडों की स्थापना, आचार्यों की नियुक्ति—सब कुछ अत्यंत अनुशासन के साथ किया गया। 108 यज्ञ कुंडों को माला के रूप में जोड़ा गया है, ताकि हर स्थान एक-दूसरे से आध्यात्मिक रूप से जुड़ा रहे।

प्रश्न 5 : 19 से 27 फरवरी 2026 की तिथियाँ कैसे तय हुईं?
हर्षदभाई:
यह निर्णय सामान्य कैलेंडर से नहीं, बल्कि पंचांग, नक्षत्र और शिव योग के गहन अध्ययन से लिया गया है। यह काल शिव तत्व के लिए अत्यंत सक्रिय माना जाता है।
इन दिनों में साधकों की चेतना शीघ्र जाग्रत होती है और संकल्प की सिद्धि की संभावना बढ़ती है। यह केवल आयोजन की तिथि नहीं, बल्कि ऊर्जा का विशेष द्वार है।

प्रश्न 6 : इस महायज्ञ का मुख्य उद्देश्य क्या है?
हर्षदभाई:
उद्देश्य बहुआयामी है— विश्व शांति, पर्यावरण संतुलन, मानव चेतना का उत्थान और ब्राह्मणों में पुनः तेज की स्थापना।

हम मानते हैं कि यज्ञ केवल अग्नि में आहुति नहीं, बल्कि अहंकार की आहुति है। जब समाज यह समझेगा, तब राष्ट्र स्वतः सशक्त होगा।

प्रश्न 7 : क्या आम श्रद्धालु भी इससे जुड़ सकते हैं?
हर्षदभाई:
निश्चित रूप से। यह यज्ञ केवल आचार्यों का नहीं, बल्कि हर शिव-भक्त का है।

लोग संकल्प, जप, ध्यान के माध्यम से घर बैठे भी जुड़ सकते हैं। ऑनलाइन माध्यमों से भी सहभागिता की व्यवस्था की जा रही है, ताकि कोई भी शिव-अनुग्रह से वंचित न रहे।

प्रश्न 8 : युवाओं के लिए आपका क्या संदेश है?
हर्षदभाई:
मैं युवाओं से कहना चाहता हूँ—शिव पुरातन नहीं, शाश्वत ऊर्जा हैं।

आज विज्ञान भी ऊर्जा और चेतना की बात करता है, शिव उसी का मूल हैं। आध्यात्म आधुनिक जीवन से टकराता नहीं, बल्कि उसे संतुलन देता है। जब भीतर शक्ति जागती है, तभी बाहरी सफलता टिकती है।

प्रश्न 9 : इस संकल्प यात्रा में आपके लिए सबसे गहरा क्षण कौन सा रहा?
हर्षदभाई:
जब 108 गोत्र ऋषियों और सप्तऋषियों का आवाहन कर, 115 जलभृत कलशों में उन्हें आमंत्रित किया गया—वह क्षण शब्दों से परे था।

ऐसा लगा जैसे काल, देश और देह की सीमाएँ मिट गई हों। तभी समझ आया कि यह कार्य मेरा नहीं, शिव का है।

प्रश्न 10 : अंत में शिव-भक्तों के लिए आपका संदेश?
हर्षदभाई: शिव सबके हैं। वे किसी पंथ या वर्ग तक सीमित नहीं।

मैं सभी से आग्रह करता हूँ—इस महायज्ञ से जुड़िए, चाहे मन से, मंत्र से या सेवा से। एकता, शांति और करुणा ही शिव का सच्चा स्वरूप है।

समापन
12 ज्योतिर्लिंगों में एक साथ कोटि अतिरुद्र महायज्ञ—यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि कलीयुग में शिव-चेतना का पुनर्जागरण है।

हर्षदभाई का यह संकल्प बताता है कि जब श्रद्धा, शास्त्र और साहस एक साथ आते हैं, तब इतिहास रचा जाता है।
हर हर महादेव।