अजय कुमार बियानी
दुनिया के कई विकसित और विकासशील देश जब 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर सख़्त नियंत्रण की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं, ऐसे समय में भारत में 15,000 स्कूलों में ‘क्रिएटर्स लैब’ खोलने की घोषणा एक गंभीर और बहुआयामी बहस को जन्म देती है। यह बहस तकनीक के पक्ष या विपक्ष की नहीं है, बल्कि इस प्रश्न की है कि बच्चों को तकनीक से किस उम्र में, किस सीमा तक और किस उद्देश्य से जोड़ा जाना चाहिए।
यह तथ्य अब विवाद से परे है कि आज का बच्चा अभूतपूर्व स्क्रीन दबाव में जी रहा है। मोबाइल, टैबलेट, लैपटॉप और टीवी—इन सबके बीच बचपन सिमटता जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ से जुड़े कई अध्ययनों में यह स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों की एकाग्रता क्षमता को कम करता है, नींद की गुणवत्ता को प्रभावित करता है और उनमें चिड़चिड़ापन, बेचैनी, एंग्जायटी तथा सामाजिक अलगाव जैसी समस्याएँ बढ़ाता है। बच्चों का मन, जो स्वभावतः खेल, संवाद और कल्पना से विकसित होता है, वह धीरे-धीरे निष्क्रिय उपभोग की आदत का शिकार हो रहा है।
गेमिंग एडिक्शन पर हुए शोध इस खतरे को और गहरा करते हैं। लगातार गेमिंग से मस्तिष्क का रिवॉर्ड सिस्टम विकृत होने लगता है। बच्चा त्वरित पुरस्कारों का आदी हो जाता है और वास्तविक जीवन की मेहनत, धैर्य और प्रक्रिया से मिलने वाली संतुष्टि उसे फीकी लगने लगती है। यह केवल आदत का सवाल नहीं है, यह व्यक्तित्व निर्माण का प्रश्न है।
सोशल मीडिया का प्रभाव इससे भी कहीं अधिक गहन और सूक्ष्म है। लाइक्स, फॉलोअर्स और व्यूज की संस्कृति बच्चों के आत्ममूल्य को बाहरी मान्यता से जोड़ देती है। कई मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में यह सामने आया है कि सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग बच्चों और किशोरों में आत्मसम्मान की कमी, शरीर को लेकर हीन भावना और मानसिक अवसाद जैसी गंभीर समस्याओं को जन्म दे रहा है। बच्चा यह सोचने लगता है कि वह क्या है, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह हो जाता है कि वह दूसरों को कैसा दिखाई देता है। “मैं कौन हूँ” की जगह “मैं कैसा दिखता हूँ” केंद्र में आ जाता है।
ऐसे परिदृश्य में स्कूलों में ‘क्रिएटर्स लैब’ की अवधारणा को लेकर स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि डिजिटल स्किल्स भविष्य की आवश्यकता हैं। कंटेंट क्रिएशन बच्चों में रचनात्मकता, संप्रेषण कौशल और तकनीकी समझ विकसित कर सकता है। यह इसका सकारात्मक और आकर्षक पक्ष है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब इस प्रक्रिया को उम्र के अनुरूप मानसिक परिपक्वता और सुरक्षा के बिना लागू किया जाता है।
यह प्रश्न गंभीर है कि क्या 10–12 वर्ष का बच्चा एल्गोरिदम की प्रकृति, वायरल होने की होड़ और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़ी मानसिक चालों को समझने में सक्षम है? क्या वह यह पहचान सकता है कि कब कंटेंट उसकी अभिव्यक्ति है और कब वह स्वयं कंटेंट में बदल रहा है? और सबसे अहम प्रश्न यह है कि क्या हम बच्चों को सचमुच क्रिएटर बना रहे हैं या धीरे-धीरे उन्हें ऐसा परफॉर्मर बना रहे हैं, जिसकी पहचान लगातार देखे जाने, पसंद किए जाने और प्रतिक्रिया पाने की निर्भरता पर टिक गई है?
शिक्षा का उद्देश्य केवल कौशल देना नहीं, बल्कि विवेक विकसित करना भी है। अगर तकनीक बच्चों के जीवन में बहुत जल्दी केंद्र में आ जाती है, तो वह साधन नहीं रह जाती, लक्ष्य बन जाती है। यह संतुलन का प्रश्न है। बच्चों को क्रिएटर्स बनाना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन क्रिएटर बनने से पहले इंसान बनाना ज़रूरी है—ऐसा इंसान, जो खेल के मैदान में हारना सीखे, किताबों में डूबना जाने, असफल होने से न डरे और बिना कैमरे के भी जीने का अनुभव रखे।
आज ज़रूरत इस बात की है कि नीति-निर्माता जल्दबाज़ी के बजाय गहराई से सोचें। उम्र-आधारित सीमाएँ, स्पष्ट दिशानिर्देश, मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा और माता-पिता की भागीदारी—इन सबके बिना ऐसी पहल जोखिम भरी हो सकती है। वरना हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर सकते हैं, जो तकनीकी रूप से दक्ष तो होगी, लेकिन भावनात्मक रूप से असुरक्षित और आंतरिक रूप से खाली होगी।
तकनीक का स्थान शिक्षा में होना चाहिए, लेकिन बचपन की कीमत पर नहीं। क्योंकि अगर बचपन ही खो गया, तो भविष्य के लिए कौशल रखने वाली पीढ़ी तो होगी, पर संतुलित नागरिक शायद नहीं।





