मार्क्स, मशीनरी और मोदी मॉडल: अफसरशाही का नया चेहरा

Marx, machinery and the Modi model: The new face of bureaucracy

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

भारत की सर्वोच्च प्रशासनिक व्यवस्था, जिसे अब तक रहस्यमय फाइलों, लंबी बैठकों और धीमी प्रक्रियाओं का पर्याय माना जाता था, आज एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। कैबिनेट सेक्रेटेरिएट द्वारा यूनियन सेक्रेटरियों के लिए शुरू किया गया ‘मार्क्स-बेस्ड परफॉर्मेंस रिव्यू’ न केवल एक प्रशासनिक प्रयोग है, बल्कि यह पूरी ब्यूरोक्रेसी की सोच और कार्यशैली को बदलने वाला कदम भी है। जिस तरह स्कूलों में छात्रों की योग्यता रिपोर्ट कार्ड से आंकी जाती है, उसी तरह अब देश के सबसे वरिष्ठ अधिकारियों का मूल्यांकन अंकों के आधार पर किया जा रहा है। यह व्यवस्था दक्षता बढ़ाने की कोशिश है या नियंत्रण का नया हथियार, यह सवाल आज हर प्रशासनिक गलियारे में गूंज रहा है।

इस नई प्रणाली की बुनियाद तथ्यों, आंकड़ों और मापदंडों पर रखी गई है। कैबिनेट सेक्रेटरी द्वारा भेजे गए प्रशासनिक स्कोरकार्ड कुल सौ अंकों पर आधारित हैं, जिनमें एक दर्जन से अधिक पैरामीटर्स शामिल किए गए हैं। फाइल डिस्पोजल को सर्वाधिक महत्व दिया गया है (अधिकतम 20 अंक), जो प्रशासनिक गति का प्रतीक माना जाता है। इसके बाद आउटपुट/गतिविधियां (15 अंक), योजनाओं पर खर्च (15 अंक), पूंजीगत व्यय (15 अंक), जनशिकायत निवारण, कैबिनेट नोट्स, प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप (पीएमजी) द्वारा मॉनिटर की जाने वाली परियोजनाओं की समयबद्ध पूर्ति, तथा पे एंड अकाउंट्स ऑफिस (पीएओ) और चीफ कंट्रोलर ऑफ अकाउंट्स (सीसीए) द्वारा बिलों का समयबद्ध निपटारा जैसे तत्व जोड़े गए हैं। इसका स्पष्ट उद्देश्य यह है कि अब केवल प्रक्रियाओं पर नहीं, बल्कि परिणामों पर ध्यान केंद्रित किया जाए।

इस व्यवस्था का सबसे दिलचस्प पहलू नेगेटिव और डिस्क्रेशनरी मार्क्स का प्रावधान है। यदि कोई विभाग विदेशी यात्राओं या इवेंट्स पर अत्यधिक खर्च करता है, सेक्रेटरी स्तर या ऊपर की फाइलों में असामान्य लंबित रखता है या एमएसएमई को भुगतान में देरी करता है, तो उसके कुल 12 अंक काटे जा सकते हैं। वहीं, असाधारण कार्य या योगदान के लिए कैबिनेट सेक्रेटरी द्वारा 5 अतिरिक्त अंक दिए जा सकते हैं। यह व्यवस्था प्रशासनिक अनुशासन को मजबूत करने के साथ-साथ व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी तय करती है। पहले जहां गलतियों पर अक्सर पर्दा डाल दिया जाता था, अब हर चूक अंकतालिका में दर्ज होगी। इस तरह यह प्रणाली पारदर्शिता और जवाबदेही का नया ढांचा तैयार करती है।

प्रशासनिक सुधार के दृष्टिकोण से यह कदम एक तरह की क्रांति कहा जा सकता है, जो 2024 में शुरू हुए मासिक डेमी-ऑफिशियल लेटर्स में मंत्रालय-विशिष्ट मात्रात्मक इंडिकेटर्स जोड़कर विकसित हुआ है। पारंपरिक ब्यूरोक्रेसी में प्रदर्शन मूल्यांकन अक्सर वरिष्ठों की व्यक्तिगत राय या वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट तक सीमित रहता था। उसमें वस्तुनिष्ठता का अभाव रहता था। अब आंकड़ों के आधार पर मूल्यांकन होने से निर्णय अधिक वैज्ञानिक और निष्पक्ष होंगे। फाइलों के तेजी से निपटारे से योजनाओं का क्रियान्वयन तेज होगा और विकास परियोजनाएं समय पर पूरी होंगी। यह प्रधानमंत्री की उस सोच के अनुरूप है, जिसमें देरी को विकास का सबसे बड़ा दुश्मन माना गया है।

मोटिवेशन के नजरिए से देखें तो यह स्कोरकार्ड प्रणाली एक दोधारी तलवार की तरह है। एक ओर, बेहतर अंक पाने की होड़ से अधिकारी अधिक सक्रिय, सतर्क और परिणामोन्मुख बनेंगे। उन्हें अपनी कमजोरियों को पहचानने और सुधारने का अवसर मिलेगा। दूसरी ओर, निरंतर मूल्यांकन का दबाव मानसिक थकान और तनाव भी बढ़ा सकता है। यदि कोई अधिकारी बार-बार कम अंक पाता है, तो उसका आत्मविश्वास कमजोर हो सकता है। स्कूल परीक्षाओं की तरह, यहां भी सफलता प्रेरणा बन सकती है और असफलता निराशा का कारण। संतुलन बनाए रखना इसलिए अत्यंत आवश्यक होगा।

इस व्यवस्था का राजनीतिक पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। डिस्क्रेशनरी मार्क्स का अधिकार कैबिनेट सेक्रेटरी (वर्तमान में डॉ. टी वी सोमनाथन) के पास है, जो सीधे सरकार के अधीन होते हैं। ऐसे में यह आशंका स्वाभाविक है कि कहीं यह प्रणाली राजनीतिक प्राथमिकताओं को थोपने का माध्यम न बन जाए। यदि किसी विभाग का प्रदर्शन सरकार के एजेंडे से मेल नहीं खाता, तो उसे कम अंक मिलने का खतरा हो सकता है। इससे अधिकारी जोखिम लेने और नए प्रयोग करने से बच सकते हैं। नवाचार के लिए स्वतंत्रता जरूरी होती है, और अत्यधिक नियंत्रण उस स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है।

इस प्रणाली के व्यापक प्रभाव धीरे-धीरे सामने आएंगे। यदि इसे संतुलित तरीके से लागू किया गया, तो सरकारी मशीनरी अधिक चुस्त, पारदर्शी और परिणामोन्मुख बन सकती है। एमएसएमई भुगतान, जनशिकायत निवारण और परियोजना निगरानी जैसे क्षेत्रों में सुधार से आम नागरिक को सीधा लाभ मिलेगा। लेकिन यदि यह केवल अंक जुटाने की दौड़ बन गई, तो अधिकारी दीर्घकालिक सुधारों के बजाय तात्कालिक उपलब्धियों पर ध्यान देने लगेंगे। इससे नीति निर्माण की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। इसलिए इस व्यवस्था की निरंतर समीक्षा जरूरी होगी।

तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो पहले भी मंत्रालयों से मासिक और त्रैमासिक रिपोर्ट मांगी जाती थीं, लेकिन उनमें अंकों की सख्त व्यवस्था नहीं थी। नई प्रणाली ने उस ढांचे को अधिक औपचारिक और कठोर बना दिया है। यह डेटा आधारित प्रशासन की ओर एक बड़ा कदम है। फीडबैक लूप के माध्यम से सुधार की प्रक्रिया को मजबूत किया जा सकता है। हालांकि, यदि डिस्क्रेशनरी मार्क्स का दुरुपयोग हुआ, तो यह विश्वास को कमजोर कर सकता है। तब यह सुधार के बजाय भय का माध्यम बन जाएगा।

कुल मिलाकर, कैबिनेट सेक्रेटेरिएट का यह ‘मार्क्स-बेस्ड परफॉर्मेंस रिव्यू’ भारतीय ब्यूरोक्रेसी को नई दिशा देने का प्रयास है। यह दक्षता, जवाबदेही और पारदर्शिता को बढ़ावा देता है, लेकिन साथ ही नियंत्रण और दबाव की नई परत भी जोड़ता है। यदि इसे स्कूल परीक्षा की तरह कठोर बना दिया गया, तो रचनात्मकता और दूरदृष्टि प्रभावित हो सकती है। सरकार को चाहिए कि वह इस प्रणाली को संवाद, फीडबैक और सुधार के साथ आगे बढ़ाए। तभी यह व्यवस्था वास्तव में प्रशासनिक सुधार, प्रेरणा और लोकतांत्रिक संतुलन का प्रतीक बन सकेगी।