अनूठा है भारत- अमेरिका व्यापार समझौता

India-US trade agreement is unique

जुर्माने के रूप में लगा टैरिफ वापस करेगा अमेरिका

प्रमोद भार्गव

भारत और अमेरिका के बीच तनातनी के चलते हुआ व्यापार समझौता विलक्षण है। इससे कई नए आयाम तो आकर लेंगे ही,वह टैरिफ भी वापस होगा,जो अमेरिका ने जुर्माने के रूप में वसूला है। इस समझौते की एक और खास बात है की भारतीय कृषि और डेयरी उद्योग की सुरक्षा और शुद्धता को कोई नुकसान नहीं होगा,बल्कि किसानों की आय बढ़ेगी।भारत के सम्मान को बरकरार रखने वाला समझौता पहले कभी हुआ देखने सुनाने में नहीं आया। उल्लेखित इन विषयों को लेकर केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान सार्वजनिक खुलासा कर चुके हैं। साफ़ है इस समझौते के बाद व्यापार और रोजगार के क्षेत्र में नए अवसरों का लम्बा दौर चलेगा।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 1 अगस्त 2025 से भारत पर 25 प्रतिशत ऊल-जलूल टैरिफ थोप दिया था। यही नहीं ट्रंप ने रूस से सैन्य उपकरण और कच्चा तेल खरीदने की वजह से अतिरिक्त जुर्माना लगाने का भी एकतरफा निर्णय ले लिया था। यह टैरिफ भारतीय दुग्ध एवं कृषि उत्पाद हड़पने की दृष्टि से लगाया गया था। जिससे भारत दबाव में आकर इन उत्पादों के लिए भारतीय बाजार खोल दे। लेकिन भारत भलि-भांति जानता था कि अमेरिका के सस्ते अनाज और मांसाहारी दूध के लिए भारतीय बाजार खोल दिया जाता है तो किसान तो तबाह होगा ही शाकाहारी संस्कृति को भी पलीता लगेगा। साथ ही भारत सरकार जिन प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों (पैक्स) को बढ़ावा देकर कृषि और दूध उत्पादों को वैश्विक बाजार में लाने की तैयारी कर रही है, वह विचार भी चकनाचूर हो जाता। इसलिए सरकार ने साफ कर दिया था कि इन क्षेत्रों में बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं है। वैसे भी अब यह सच्चाई सामने आ रही है कि एकतरफा वैश्वीकरण से दुनिया का भला होने वाला नहीं है। अतएव स्वदेशी उत्पादों के जरिए ही आत्मनिर्भर बने रहने की पहल जारी रखनी होगी। भारत इस दिशा में मजबूती से बढ़ भी रहा है। किंतु अब भारत को अमेरिका से हुए समझौते में बड़ी राहत मिली है। अमेरिकी प्रशासन ने न केवल टैरिफ दर को 50 प्रतिशत से घटाकर १८ प्रतिशत कर दिया है,बल्कि रूस से तेल आयात के चलते जुर्माने के रूप में वसूले गए 25 प्रतिशत टैरिफ को वापस करने का फैसला लिया है। वाइट हाउस से जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार,27 अगस्त 2025 से लेकर 6 फ़रवरी 2026 के बीच जिन आयात वस्तुओं पर जुर्माना लगा है,वह वापस हो जाएगा। उम्मीद बानी है कि इस छूट से भारतीय व्यापारियों को करीब 40 हजार करोड़ की राहत मिलेगी।

पीयूष गोयल ने एक साक्षात्कार में साफ किया है कि डेयरी के सभी उत्पाद आनुवंशिक रूप से परिवर्धित उत्पाद भी समझौते से बाहर हैं। इनमें पोल्ट्री,मांस,सोयाबीन, मक्का,चावल,चीनी, गेहूं,ज्वार,बाजरा,रागी,कोदो,दाल मूंग,काबुली चना,ग्रीन टी मधु और अनेक प्रकार के फलों को बाहर रखा है।

डेयरी उत्पादों में गाय-भैंस का दूध अहम्में है। इसमें ऐसे पोषक तत्व हैं, जो शरीर और दिमाग दोनों को ही स्वस्थ रखते हैं। यह दूध ही है, जिससे दही, मट्ठा, मक्खन और घी जैसे सह-उत्पाद निकलते हैं। ये उत्पाद मिठाई की दुकानों से लेकर डेयरी उद्योग के जरिए करोड़ों लोगों के रोजगार का मजबूत माध्यम बने हुए हैं। लंबे समय तक गाय से पैदा बैल पर ही भारतीय कृषि निर्भर रही है। इसी कृषि की जीडीपी में 24 प्रतिशत की भागीदारी है। भारतीय दुग्ध उत्पादन से लेकर दूध पीने में दुनिया में पहले स्थान पर हैं। इसी दूध पर अमेरिकी बाजार के कब्जे के लिए अमेरिका अपने यहां उत्पादित मांसाहारी दूध बेचना चाहता रहा था।अन्य यूरोपीय देशों की निगाह भी इस दूध के व्यापार पर टिकी हैं। इस बाबत अमेरिका और भारत के बीच 500 बिलियन डॉलर के व्यापार समझौते पर चली बातचीत नाकाम रही थी।क्योंकि इसमें अमेरिकन मांसाहारी दूध के उत्पाद शामिल थे।

भारत सरकार ने इस बाबत दो टूक कह दिया था कि अमेरिकी दुग्ध उत्पादों को भारतीय बाजार का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता है। यह हमारे दुग्ध उत्पादक किसानों की आजीविका और उनकी संस्कृति की सुरक्षा से जुड़ा बड़ा प्रश्न है, जो कतई स्वीकार योग्य नहीं है।दरअसल अमेरिका चीज (पनीर) भारत में बेचने का लम्बे समय से इच्छुक थ। इस चीज को बनाने की प्रक्रिया में बछड़े की आंत से बने एक पदार्थ का इस्तेमाल होता है। इसे अत्यंत घिनौना कृत्य करके चीज में मिलाया जाता है।

शाकाहारी लोग इस प्रक्रिया को देख भी नहीं सकते हैं। इसलिए भारत के शाकाहारियों के लिए यह पनीर वर्जित है। गौ-सेवक व गऊ को मां मानने वाला भारतीय समाज इसे स्वीकार नहीं करता। अमेरिका में गायों को मांसयुक्त चारा खिलाया जाता है, जिससे वे ज्यादा दूध दें। हमारे यहां गाय-भैंसें भले ही कूड़े-कचरे में मुंह मारती फिरती हों, लेकिन दुधारू पशुओं को मांस खिलाने की बात कोई सपने में भी नहीं सोच सकता? लिहाजा अमेरिका को चीज बेचने की इजाजत इस डील में नहीं दी गई है। अकेले गुजरात में अमूल समेत 36 लाख दुग्ध उत्पादक हैं।

बिना किसी सरकारी मदद के बूते देश में दूध का 70 फीसदी कारोबार असंगठित ढांचा संभाल रहा है। इस कारोबार में ज्यादातर लोग अशिक्षित हैं। लेकिन पारंपरिक ज्ञान से न केवल वे बड़ी मात्रा में दुग्ध उत्पादन में सफल हैं, बल्कि इसके सह-उत्पाद दही, मठा, घी, मक्खन, पनीर, मावा आदि बनाने में भी मर्मज्ञ हैं। दूध का 30 फीसदी कारोबार संगठित ढांचा, मसलन डेयरियों के माध्यम से होता है। देश में दूध उत्पादन में 96 हजार सहकारी संस्थाएं जुड़ी हैं। 14 राज्यों की अपनी दुग्ध सहकारी संस्थाएं हैं। देश में कुल कृषि खाद्य उत्पादों व दूध से जुड़ी प्रसंस्करण सुविधाएं महज दो फीसदी हैं, किंतु वह दूध ही है, जिसका सबसे ज्यादा प्रसंस्करण करके दही, मठा, घी, मक्खन, मावा, पनीर आदि बनाए जाते हैं। इस कारोबार की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इससे आठ करोड़ से भी ज्यादा लोगों की आजीविका जुड़ी है। करीब 1.5 करोड़ परिवार ही सहकारी दुग्ध उत्पादकता से जुड़े हैं, जबकि 6.5 करोड़ ग्रामीण परिवार आज भी सहकारिता के दायरे से वंचित हैं। दूध उत्पादन में ग्रामीण महिलाओं की अहम् भूमिका रहती है। रोजाना दो लाख से भी अधिक गांवों से दूध एकत्रित करके डेयरियों में पहुंचाया जाता है। बड़े पैमाने पर ग्रामीण सीधे शहरी एवं कस्बाई ग्राहकों तक दूध बेचने का काम करते हैं।

इसी दूध के बाजार में अमेरिका हस्तक्षेप के लिए लंबे समय से लालायित है,लेकिन उसकी दाल इस बार भी नहीं गाल पाई। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने दस हजार नई कृषि सहकारी समितियों को हरी झंडी दिखाई है। अगले पांच साल में इनकी संख्या दो लाख तक पहुंचाने की है। इन्हीं सहकारी संस्थाओं के जरिए कृषि और दुग्ध उत्पादों को भारत से लेकर एशिया और यूरोप तक बाजार में पहुंचाने की है। ऐसे में यदि अमेरिकी दुग्ध उत्पादों के लिए भारतीय बाजार खोल दिए जाते तो इन समितियों की मुश्किलें तो बढ़ती ही, दुग्ध उत्पादक आठ करोड़ लोगों की आजीविका पर भी संकट के बादल गहरा जाते।