होली का हुड़दंग, विक्की मीडिया के संग

Holi's ruckus, with Vicky Media

विनोद कुमार विक्की

डिस्क्लेमर- क्षमायाचना के साथ इस आलेख को प्रस्तुत करने का उद्देश्य किसी भी सजीव की भावना को आहत करने की बजाय मनोरंजन मात्र है। अतः अपने मन पर पूर्वाग्रह का रंग चढ़ाएं बिना आलेख के हास्य रंग का आनंद लीजिए क्योंकि बुरा न मानो होली है…

विक्की मीडिया पड़ताल के तहत होली 2026 के अवसर पर अतरंगी साहित्यकारों के सतरंगी कारनामों का सीधा प्रसारण लेकर आपका मित्र विनोद विक्की हाज़िर है। आइए, आपको सीधे सोशल मीडिया नामक उस पवित्र स्थल पर ले चलते हैं जहाँ रंग से ज़्यादा पोस्ट, और गुलाल से ज़्यादा ‘टैग’ उड़ रहे हैं।

जैसा कि दर्शक देख पा रहे हैं, व्यंग्य पुरोधा सुभाष चन्दर सर माइक और मुँह—दोनों सक्रिय अवस्था में लेकर मैदान में अवतरित हो चुके हैं। ऐसा लगता है उनके अल्पकेशी मस्तक पर इस बार भी साहित्यिक होली मिलन समारोह की अध्यक्षता का भार आ चुका है।

“हैप्पी होली, सुभाष सर!”

“अरे विक्की, तुम्हें भी… रंगों से भरी, विमर्शों से सजी होली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएं !”

मैंने धीरे से टटोला—“सर, लगता है इस बार होली में कल्लू मामा का जलवा रहेगा। मंच बड़ा सजा-धजा दिख रहा है…”

सुभाष सर आभासी मुद्रा में मुस्कराए—“हें-हें-हें… यह मंच होली का नहीं, ‘पुस्तकनामा’ चर्चा-श्रृंखला का है। अब हम रंग कम, विमर्श अधिक उड़ाते हैं। इस उम्र में कल्लू मामा और होली—दोनों प्रतीकात्मक रह जाते हैं।”

इतने में अर्चना चतुर्वेदी मैम घूँघट को साहित्यिक परंपरा की तरह आधा गिराए, भुल्लो बुआ के अवतार में प्रकट हुईं— “लल्ला, इस बार ब्रज भाषा में सास-बहू की होली पर ऐसा वीडियो बनाया है कि टीआरपी रंग छोड़ दे! फुर्सत हो तो सुनाऊँ?”

मैंने विनम्रता से मोबाइल सँभालते हुए कहा—“मैम, अभी तो साहित्यकारों के इनबॉक्स में होली की शुभकामनाएँ कॉपी-पेस्ट कर वितरित करनी हैं। फिर कभी… ।” और अवसर देखकर वहाँ से खिसक लिया। आगे का दृश्य इस प्रकार है।

अरविंद तिवारी सर का दरबार सजा हुआ है—रंग-गुलाल की जगह ‘आज का ज्ञान’ प्रसाद स्वरूप वितरित हो रहा था। हम अपने पाठकों को बता दें कि “व्यंग्य कभी पुराना नहीं होता” के सूत्रधार तिवारी जी बागेश्वर धाम बाबा और अनिरुद्धाचार्य महाराज के बगल में अपना बंगला खड़ा करने के लिए वर्षों से प्रयासरत हैं।

थोड़ा आगे बढ़ें तो एक कोने में भाई रंगनाथ दूबे भाई उदास खड़े मिले।

“हैप्पी होली भाई” कहते ही भावनाएँ फूट पड़ीं— “काहे की होली विक्की भाई… बड़े संपादक अच्छी रचना प्रकाशित नहीं कर रहे हैं, यूजीसी नीति अलग सता रही है… लगता है सरकार और संपादक दोनों का जायका बिगड़ गया है, इस बार अकेले ही आत्मनिर्भर होली खेलूँगा।” यह कहकर उन्होंने स्वयं को ही गुलाल लगा लिया।

उधर शिखर चंद जैन पाठकों पर आलेख, लघुकथा, व्यंग्य और मोटिवेशनल विचारों के नन-स्टॉप बैलून ऐसे फेंक रहे थे, मानो भारतीय सेना पाकिस्तान पर मिसाइलें दाग रहा हो। प्रभाशंकर उपाध्याय एवं शांति लाल जैन ने संयुक्त कलर स्ट्राइक की तर्ज़ पर ड्राय कचरे को शिखर जी के सिर पर मुट्ठी से उड़ेलते हुए उद्घोष किया—“व्यंग्यारा सा रा रा रा…!”

इस होली बुलाकी शर्मा हिंदी और राजस्थानी के संयुक्त उपक्रम में फगुआ गा रहे हैं। धर्मपाल महेंद्र जैन उस पर विदेशी धुन चढ़ाने को तत्पर हैं। नृपेन्द्र अभिषेक नृप भांग घोंटने की जगह अगले दिन के अख़बार में छपने के लिए कॉलम घोंट रहे हैं।
सुरेश मिश्रा ‘उरतृप्त’ और रेखा शाह आरबी हाथों में कुछ छिपाए हुए फेसबुक पर प्रकट हुए। सूर्यदीप कुशवाहा और टीका राम साहु आजाद ने उत्सुकतावश पूछा— “कौन सा रंग छिपा रखा है?”

सुरेश और रेखा मुस्कुराते हुए संयुक्त स्वर में बोले— “रंग नहीं, व्यंग्य है… छपवाने के लिए नई पत्रिकाओं की मेल आईडी ढूँढ़ रहे हैं।”

साहित्य जगत को व्यंग्य के रंग में रंगने की प्रतिज्ञा लेकर प्रेम जनमेजय सर व्यंग्य यात्रा पर निकल ही रहे थे कि हरीश नवल जी व्यंग्य का गुलाल और सुर्य बाला मैम तथा ममता कलिया जी व्यंग्य की पिचकारी लेकर उनकी टोली में शामिल हो गए। प्रेम जी हाथों में बड़ा सा ध्वज थाम कर लगातार आगे बढ़ रहे हैं, जिस पर ‘हैप्पी होली’ की जगह ‘व्यंग्य यात्रा’ अंकित है। पीछे से रणविजय राव जी और समीक्षा तैलंग जी चिल्लाते हुए दौड़े — “दद्दा रुको, हम भी आ रहे हैं…”

अरुण जैमिनी और अशोक चक्रधर एक- दूसरे पर पिचकारी ताने हुए हैं। हर साल की तरह इस साल भी रमेश तिवारी तथा अविनाश अमेय आलोचना की टीन और राहुल देव तुरही फूँकने में मस्त हैं।

हायला, यह क्या फारूक आफरीदी साहब सभी छोटे-बड़े व्यंग्यकारों को पकड़-पकड़ कर गले‌ लगाते हुए “ईद मुबारक” बोल रहे हैं। मैंने उन्हें ईद नहीं होली का बोध कराया तो बोले -” विक्की भाई क्या ही फर्क पड़ता है…ईद या होली, आखिर दोनों का उद्देश्य तो प्रेम और भाईचारा ही है न।” उनके इस भारी भरकम संदेश ने उनके नशे में होने की मेरी गलतफहमी को दूर कर दिया। निर्मल गुप्त और अतुल चतुर्वेदी की पीठ पर बैलून मारकर व्यंग्य के रंग का चकल्लस लेते हुए असीम चेतन को उछलते हुए देख पाठक समुदाय ठहाका लगा रहे हैं।

श्रवणकुमार उर्मलिया अपनी धुन में लगे हुए हैं। जोगीरा की बजाय शायरी सुनाएं जा रहे हैं और उनकी शायरी पर सुरेंद्र सार्थक ,अनंत आलोक, प्रो.नवसंगीत सिंह एवं कैलाश मंडलेकर गुलाटी मारते हुए वाह-वाह कर रहे हैं। इन सबकी अतरंगी हरकतों को श्री प्रभात गोस्वामी बॉक्स एफएम के लिए रिकॉर्ड कर रहे थे कि पीछे से गिरीश पंकज सर ने सिर पर हरा रंग डालते हुए धीरे से पूछा — “किरीस का सुनेगा गाना… किरीस का…”

यह सुन शशांक दुबे सर अपने बालों से गुलाल झाड़ते हुए उलझ गए—“भाई गिरीश जी, फिल्मी गानों और समीक्षा के लिए मैं, वागीश और अशोक वाधवाणी ही काफी हैं। आप तो ‘किरीस’ की बजाय ‘गिरीश’ की कवितावली से कुछ कविता ही सुना दीजिए।” उनकी बात सुनकर संजीव जायसवाल संजय 17 भाषाओं में हँसने लगे।

इधर सुरेश सौरभ, विजयानंद विजय जी , मुनेश कुमार शक्ति एवं दिलीप तेतरवे जी सहित कुछ साहित्यकार अपनी शाब्दिक पिचकारी की धार से साहित्यकार की बजाय सरकार को रंगने और घेरने की पूरी तैयारी कर चुके हैं।

दूसरी ओर दो अतिरिक्त पैग का सेवन कर व्यंग्य के उच्छृंखल विद्यार्थी सुनील जैन राही जी व्यंग्यलोक’ में रामस्वरूप दीक्षित जी को नंगी आँखों से ढूँढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। रास्ते में लालित्य ललित जी एक दर्जन होली-कविताएँ लेकर रंदी सत्यनारायण राव जी को ऐसे घेर लिये हैं जैसे बंगाल में राजनेताओं को ईडी की टीम। राव जी गिड़गाड़ाए, ललित नहीं माने।

आखिरकार “आपकी सारी कविताएँ सुनेंगे, पर बदले में मानदेय देने वाली पत्र-पत्रिकाओं की मेल आईडी चाहिए।” की शर्त पर काव्य पाठ प्रारंभ हुआ।

विनोद साव जी मुस्कराते हुए सभी की हरकतों को देख रहे थे।

वंदे व्यंग्यम् की गति से लेखन हेतु राजशेखर चौबे सर ,राजेश सेन, डॉ. मुकेश असीमित और अभिषेक अवस्थी व्यंग्य लेखन के लिए गहरी सोच और मोबाइल लेकर कीचड़ वाले गड्ढे में उतर चुके हैं। पत्रकारिता के अलावा व्यंग्य विमर्श के लिए राजेंद्र यादव अहीर जी एवं भोजपुरी व्यंग्य सोचने के लिए हम प्रभुनाथ शुक्ला जी सेप्टिक टैंक में उतर चुके हैं। राजेंद्र कुमार सिंह आज भी गुजिया और मालपुआ की तस्वीरें फॉरवर्ड करने की बजाय साहित्यिक ग्रूप में समाचार-पत्रों की पीडीएफ शेयर करने में तल्लीन हैं।

होलिका-दहन के मौके पर अभिजित दुबे जी ने धतूरा का सेवन करते हुए माह के दूसरे और चौथे शनिवार (बैंक-अवकाश) को व्यंग्य लेखन के लिए समर्पित कर दिया, तो दूसरी ओर चोरका दारू की दो घूँट लगाकर राजेश मंझवेकर जी हिंदुस्तान में सत्य की मशाल जलाने की प्रतिज्ञा ले चुके हैं। कपिल शास्त्री और जवाहर सिंह जी उसी मशाल से भोपाल में प्रतीकात्मक होलिका-दहन की योजना बना रहे हैं। ‘समय सुरभि अनंत’ के संपादक नरेन्द्र कुमार सिंह जी दिनकर माटी में लोट-लोटकर जोगीरा गा रहे हैं, जबकि पंकज प्रसून मंच और माइक के रंग में इस कदर सराबोर थे कि उन्हें सूखा रंग भी ‘लाइव’ लग रहा है।

‘अट्टहास’ के संपादक रामकिशोर उपाध्याय सर, सुधीर ओखदे सर, राकेश सोहम सर, मुकेश नेमा सर, बी.एल.आच्छा सर और विवेक रंजन श्रीवास्तव जी ने वादा किया कि होलिका-दहन से रंगपंचमी तक की हर तस्वीर समय से फेसबुक पर चढ़ेगी—और फिर वे विजय माल्या की तरह विदेश प्रस्थान कर चुके हैं, ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होली का हुड़दंग मचाया जा सके।

मुकेश राठौर और सौरभ जैन ने भांग छोड़ ‘भास्कर’ के हास्य-भाष्य पर ध्यान केंद्रित कर लिया है।

पिलकेंद्र अरोड़ा जी व्यंग्य की उल्टी नाला बहाने को तैयार हैं। के.पी. सक्सेना दूसरे, सुभाष जैन जी, शशिकांत सिंह ‘शशि’ जी, महावीर राजी , के.के. अस्थाना जी, अनूप मणि त्रिपाठी जी, वीरेंद्र सरल जी और आशीष दशोत्तर जी व्यंग्य का मालपुआ तलते हुए कैमरे में कैद हो चुके हैं। दिनेश रस्तोगी जी, प्रभाशंकर उपाध्याय जी, केदार शर्मा जी, अशोक व्यास जी, गुरमीत बेदी जी, राजेंद्र वर्मा जी, महेंद्र अग्रवाल जी, पंकज साहा जी और सुधाकर आशावादी जी व्यंग्य के पकौड़े सेक रहे हैं, जबकि हरीश कुमार सिंह जी, अनूप शुक्ल जी और सुमित प्रताप सिंह उन पर जीरा-काला नमक का तड़का लगाने में जुटे हुए हैं।
महेश कुमार केशरी व्यंग्य का बड़ा बनाकर पाठकों के दिमाग़ की दही करने मेरा मतलब दही में परोसने की तैयारी कर चुके हैं। अमित शर्मा इस होली लानत की बजाय पकवान की होम डिलीवरी करने में लगे हुए हैं।

इन सबसे हटकर डॉ. प्रमोद शर्मा ‘साहित्य समागम एवं सम्मान समारोह’ के नाम पर विश्व-दर्शन का सशुल्क रंगीन पैकेज लेकर साहित्यकारों को लुभाने का प्रयास करते हुए दिखाई दे रहे हैं। सबसे भयावह स्थिति कॉलेज गेट पर देखने को मिल रही है, जहाँ परीक्षा में निश्चित सफलता के लिए अनिता यादव जी गार्गी की छात्राओं को बस इतना सा ख्वाब है… अरूण अर्णव खरे सर ‘कोचिंग@कोटा’ एवं अलंकार रस्तोगी जी अपने छात्रों को घातक कथाएँ पढ़ने की टिप्स दे रहे हैं। राजेंद्र ओझा, सुधीर केवलिया, दिलीप कुमार, अंशुमान खरे, विनय विक्रम सिंह और संदीप भटनागर एक-दूसरे को रंग लगाने की बजाय अपनी नयी रचना सुनाने में मस्त हैं।

पिथौरागढ़ से ललित शौर्य बाल्टी में नाले का पानी भरकर होली खेलने के लिए निकले ही थे कि पीछे से जवाहर चौधरी ने उन्हें सिल्वर रंग से रंगकर ‘बाबा इलायची’ बना दिया।

जवाहर अपनी पीठ खुजाते हुए बोले— “ललित भाई! वह गंदा पानी मेरे ऊपर डालो। इंदौर के स्वच्छ पानी से नहाकर खुजली होने लगी है।”

ललित ने दृढ़ता से कहा— “यह जल साहित्यकारों के लिए नहीं, नेताओं और मंत्रियों के लिए सुरक्षित है। और बुरा न मानो होली है!” कहकर निकल लिए।

शौर्य की बाल्टी से छलके कीचड़ में दीपक गिरकर जी फिसल गए। अब वे गिर-गिरकर सभी को होली की बधाइयाँ दे रहे हैं। उनकी स्थिति देखकर विनय पाठक सर, प्रमोद सागर जी और अंशुमाली रस्तोगी जी, रमेश मनोहरा जी,मनोज लिमये जी ताली पीट रहे हैं, पूरन शर्मा जी , ब्रजेश कानूनगो जी, मुकुल महान जी,असीम अनमोल और सूर्यदीप कुशवाहा मोदी जी द्वारा सुझाई गई थाली बजा रहे हैं। जबकि अतरंगी व्यंग्यकारों की बहुरंगी हरकतों को देखकर पाठक और प्रकाशक अपना सिर और छाती पीट रहे हैं।

महिला व्यंग्यकार फ्लिपकार्ट और अमेज़न पर लेक्मे, पान्डस, मामार्थ,लारियल, मेबीलाइन आदि ब्रांडेड कंपनियों से कास्मेटिक प्रोडक्ट की तरह रंग और गुलाल खरीदने का असफल प्रयास कर रही हैं।

निक्की शर्मा रश्मि भागलपुर से मुंबई तक हरे रंग से होंठों को रंगने और गुलाबी रंग से आंखों की सुंदरता बढ़ाने की टिप्स दे रही हैं।

इंद्रजीत कौर और स्नेह लता पाठक एक दूसरे से गले मिलकर गुलाल लगाने की बजाय अपनी प्रकाशित पुस्तकें सौंप रही हैं। अंशु प्रधान, अलका अग्रवाल सिगतिया एवं वीना सिंह , सुनीता शानू व्यंग्य की बजाय रसोई में पकवान बना रही हैं तथा आरिफा एविस, रंजना जायसवाल एवं शशि पांडेय मोबाइल पर रील बनाने में मग्न हैं। दूसरी ओर रूबी प्रसाद फिलिंग फ्राय करती हुई दिखाई दे रही हैं।

रंग से भरे एक सरोवर में पूजा गुप्ता , छत्तीसगढ़िया डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा, गोपेंद्र सिन्हा गौतम , जयदेव राठी,मोहन मौर्य और संतराम पांडे सर हँस-हँसकर डुबकी लगा रहे हैं। कुछ कवि और साहित्य की अन्य विधा के लेखक भी ऊब-डुब कर रहे थे।
पूछने पर पूजा गुप्ता ने बताया— “विक्की, यह हास्य-व्यंग्य का सरोवर है, जिसमें रंगने के बाद अब हम भी प्रमाणित व्यंग्यकार कहला सकते हैं।”

मोहन मौर्य और संतराम बोले— “भाई, व्यंग्यकार के प्रमाण-पत्र का नवीनीकरण करने के लिए हमने भी डुबकी लगाई हैं।”

सरोवर की पास बने बेंच पर बैठे कर ज्ञान चतुर्वेदी सर, आलोक पुराणिक सर, प्रबोध गोबिल सर, रमेश सैनी सर एवं हरिशंकर राढ़ी जी रहस्यमयी मुस्कान के साथ व्यंग्य-सरोवर में डुबकी लगाकर व्यंग्यकार कहलाने वालों पर पैनी निगाह रखे हुए हैं।

कार्टूनिस्ट कप्तान और कार्टूनिस्ट सागर कुमार एक दूसरे पर स्याही फेंक कर तथा फतुहा के कार्टूनिस्ट अमरेंद्र कुमार और हरिओम जी एक दूसरे पर डिजिटल इंक डाल कर होली महोत्सव का आनंद ले रहे हैं। उन सभी को देखकर वीरेंद्र नारायण झा मैथिली व्यंग्य का छौंक लगा रहे हैं ।

होली की मौज मस्ती में संपादकीय जगत भी पीछे नहीं है। सिंथेटिक गुलाल,‌ लौंग, इलायची और सौंफ की प्लेट के साथ होली-मिलन स्टॉल सजे हुए हैं। मौके पर अमर उजाला, दैनिक जागरण, प्रभात खबर, राजस्थान पत्रिका, दैनिक ट्रिब्यून, जनसत्ता, हिंदुस्तान, इंदौर समाचार, नवभारत टाइम्स, दिल्ली प्रेस, डायमंड बुक्स, वनिता,गृह लक्ष्मी, नूतन कहानियां, दूरदर्शी दर्पण आउटलुक, इंडिया टुडे, उदय सर्वोदय, हिंदी चेतना, विभोम स्वर, पुस्तक संस्कृति, वागर्थ, भवन्स नवनीत,कथा क्रम, कृति बहुमत सहित अन्य पत्र-पत्रिकाओं की संपादकीय टीम के अलावा यशवंत व्यास सर, देव प्रकाश चौधरी सर, विनय भूषण सर, डॉ. अजय खमेरिया जी, आशुतोष चतुर्वेदी जी , श्री संजय गुप्त सर, डॉ. अजय जोशी जी, विश्व गाथा के पंकज त्रिवेदी सर, सररस्वती सुमन के आनंद सुमन सिंह जी, किशोर श्रीवास्तव जी,सोच विचार के जितेंद्र नाथ मिश्रा सर, गाँव-गिरांव के श्रीधर द्विवेदी जी, अपना बाराबंकी के दिनेश शुक्ला जी, सच बेधड़क के मनोज माथुर जी, विनोद सागर जी, समय प्रसंग के आलोक आशीष जी, रंग चकल्लस के असीम चेतन, अट्टहास से शिल्पा सुधांशु, रामकिशोर उपाध्याय, हैलो इंडिया वाले सुरेश कांत सर, आचार्य राजेश कुमार, इंडिया नेटबुक्स के डॉ. संजीव कुमार जी, सृजन कुंज के कृष्ण कुमार आशु जी, शब्द घोष के अरविंद कुमार संभवम जी, जयवर्धन के लक्ष्मण सिंह राठौर जी, गृह लक्ष्मी की सपना सिंह जी, ककसाड़ की कुसुमलता सिंह जी, प्रखर गूंज की नीलू सिन्हा जी, मेरी निहारिका की मीनाक्षी मोहन मीता, कलम हस्ताक्षर की निरूपमा सिन्हा वर्मा जी, संवदिया के मांगन मिश्र मार्तण्ड जी , नवभारत के शचिंद्र दूबे जी, उदय सर्वोदय के तबरेज खान साहब, साहित्य सरोज के अखंड गहमरी जी , भटनेर पोस्ट के गोपाल झा जी, नूतन कहानियां के सुरेंद्र अग्निहोत्री जी, रविवार के प्रमोद शर्मा जी, सुबह सवेरे के पंकज शुक्ला जी, चाणक्य वार्ता के डॉ.अमित जैन, वनिता के गोपाल सिंहा जी, सर्वेश अस्थाना जी, विशुद्ध स्वर के संजय मिश्रा जी, सुधीर सिंह उजाला जी,एम.एम.चंद्रा जी, हैलो बिहार के बिपिन कुमार सिंह जी, अमृत विचार के पुष्पेंद्र दीक्षित जी, पुनीत कुमार जी,सुमन सागर के संजीव आलोक, खुशबू मेरे देश की गुडविन मसीह सहित बड़े, छोटे और मझौले, हर वेरायटी के संपादक सहित नामी-गिरामी प्रकाशक विभिन्न रंगों से सराबोर होकर झूम रहे हैं। कुछ पत्रिका के संपादक महोदय लेखकों की स्वीकृत रचनाओं की गुजिया बना रहे हैं, जबकि अस्वीकृत रचनाओं को हवा में गुलाल की तरह उड़ा रहे हैं।

संपादकों से गले मिल कर वरिष्ठ साहित्यकार होली की हैप्पीनेस एक्सचेंज कर रहे हैं, जबकि नवोदित साहित्यकार चरण-स्पर्श कर ईमेल की आईडी माँग रहे हैं। छपास के अहम और नशे में मदहोश हो चुके कुछ व्यंग्यकारों के पास ‘जागो इंडिया जागो’ के संदीप पांडेय जाकर “जागो कलमकार ” की दुहाई देकर जगाने की कोशिश रहे हैं। लाल बहादुर लल्लन जी सभी साहित्यकारों के चेहरे रंग की बजाय मुस्कान चिपकाने की कोशिश कर रहे हैं। लोकतंत्र की बुनियाद के गणेश यादव जी आज लोकतंत्र की बजाय रंगतंत्र की बात कर रहे हैं।
‘हंस’ की टीम स्थापित साहित्यकारों के साथ रंगोत्सव का आनंद ले रही हैं, जबकि रामकिशोर उपाध्याय और शिल्पा सुधांशु के नेतृत्व वाली ‘अट्टहास’ की टीम उद्घोष कर रही है— “सबको व्यंग्यकार बना दूँगा!”

कुछ प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाएँ केवल चुनिंदा रचनाकारों को रंग गुलाल लगा रही थीं; कुछ अगले वर्ष रंग लगाने का संपादकीय वादा कर रही हैं। व्यंग्यकार, कवि, समीक्षक, आलोचक और टिप्पणीकार—सबको समान भाव से गुलाल लगाकर युग पक्ष,अजीत समाचार, हिमाचल दस्तक, देशबंधु, जनवाणी, हिंदी मिलाप, पूर्वांचल प्रहरी, लोकसत्य, दैनिक नवज्योति और इंदौर समाचार की टीम के अलावा सुभाष राय जी सौहार्द भरा जन-संदेश दे रहे हैं। नवभारत टाइम्स’ और ‘राजस्थान पत्रिका’ ‘हिंदुस्तान’, ‘भास्कर’, ‘प्रभात खबर’, ‘दैनिक सवेरा’, लोकमत ‘आज, आउटलुक, इंडिया टुडे की संपादकीय टीमें आलेख और समसामयिक टिप्पणी करने वाले स्तंभ कारों तथा लेखकों को रंगने में लगे हुए हैं, हालांकि उनके द्वारा उड़ाए जा रहे रंगों की अल्प बूंदें व्यंग्यकारों के उपर भी गिर रही हैं। ‘दैनिक जागरण’ के राजीव सचान जी एवं नई दुनिया के ईश्वर शर्मा जी टिप्पणीकारों एवं व्यंग्यकारों को समान रूप से गुलाल लगा रही हैं, तो दूसरी ओर‘खरी-खरी’ के कन्हैया झा जी व्यंग्यकारों के साथ घड़ी-घड़ी धूल उड़ा रहे हैं। मुकेश भारद्वाज जी फगुआ बोल की बजाय बेबाक‌ बोल सुना रहे हैं।

कुछ पत्र-पत्रिकाओं की संपादकीय टीम साहित्यकारों को गुलाल लगाने के साथ-साथ ड्राई फ्रूट्स खरीदने के लिए वाउचर भी बाँट रही हैं, जबकि कुछ लघु पत्रिकाओं के संपादक होली की शुभकामनाओं के बहाने लेखकों पर ही पत्रिका की सदस्यता और विज्ञापन का दबाव बनाते दिखाई दे रहे हैं। सबसे रोचक दृश्य कापी-पेस्ट में आस्था रखने वाले ई पेपर/मैगज़ीन के संपादकीय टीम की ओर से देखने को मिल रहा है जो भारत के सभी नागरिकों पर छपास रंग डालते हुए सभी की रचनाओं को बिना पढ़े अपने डिजिटल पेपर में छापने का वादा कर रहे हैं।

संभव है कि विक्की मीडिया के कैमरे में कुछ व्यंग्यकारों की करतूतें कैद न हो पाई हों, तथापि हमारी कोशिश है कि होली के बहाने हम अपने पाठकों को व्यंग्यकारों के कर्मकांड से मुखातिब करवा सकें। जैसा कि हमारे पाठक देख सकते हैं, ‘जात’ और ‘जज़्बात’ से खेलने वाले इस भौतिकवादी युग में एकमात्र व्यंग्यकार वर्ग ही है, जो रंग और व्यंग्य के सहारे होली खेल रहा है।
बहरहाल, वक्त हो चला है कमर्शियल ब्रेक का। इसी प्रकार के सतरंगे दृश्यों का आनंद लेने के लिए आप विक्की मीडिया से जुड़े रहें। ब्रेक के बाद रंग और गुलाल लेकर हम जल्द ही हाज़िर होंगे। तब तक के लिए धन्यवाद।।