प्रमोद भार्गव
अमेरिका के विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय के भौतिकशास्त्री प्रो जॉर्ज और तंत्रशास्त्र की प्रोफेसर डॉ कैथी भगवान शिव के अर्ध-नारीश्वर स्वरूप की कल्पना में धनात्मक और ऋणात्मक गुणों के प्रतीक देखते हैं। शिव जो ऊर्जा के देवता हैं, वह धनात्मक गुण और पार्वती जो प्रकृति की उर्वरा शक्ति हैं, वे ऋणात्मक गुण की प्रतीक हैं। इसे ही सापेक्षता सिद्धांत के रूप में भौतिक विज्ञानियों ने देखा है। दरअसल, प्रकाश में कण और तरंग एक साथ समाहित रहते हैं, इसी तरह इलेक्ट्रान भी एक कण और एक तरंग का रूप धारण कर लेता है। सापेक्षता का सिद्धांत इन स्वरूपों को साकार करता है, क्योंकि ये एक ही शक्ति के दो स्वरूप हैं। शिव और पार्वती का समन्वित रूप अर्ध-नारीश्वर भी इसी सिद्धांत को भौतिक रूप में प्रतिबिंबित करता है।
शिव की उपस्थिति ऋग्वेद में रुद्र के रूप में है,परंतु अन्य वेदों और पुराणों में इन्हीं रुद्र शिव की कल्पना एक ऐसे रूप में की गई है, जिसका आधा शरीर स्त्री तथा आधा पुरुष का है। शिव के इस स्त्री मिश्रित शरीर को हम अर्ध-नारीश्वर नाम से जानते हैं। शिव-पुराण के अनुसार शिव के इस रूप-विधान में पुरुष को ब्रह्मात्मक मानकर, ब्रह्म से भिन्न उसकी शक्ति माया को स्त्री के आधे रूप में चित्रित किया गया है। शिव का रूप अग्नि एवं सोम अर्थात सूर्य एवं चंद्रमा के सम्मिलन का भी रूप है। यानी पुरुष का अर्धांश सूर्य और स्त्री का अर्धांश चंद्रमा के प्रतीक हैं। सृष्टि के आरंभ में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन शिव और शक्ति-रूपा पार्वती उत्पन्न हुए थे।
अर्ध-नारीश्वर के संदर्भ में जो कथा प्रचलन में है, वह है, जब ब्रह्मा ने सृष्टि के विधान को आगे बढ़ाने की बात सोची और इसे साकार करना चाहा, तो उन्हें इसे, अकेले पुरुष रूप से आगे बढ़ाना संभव नहीं लगा। तब उन्होंने शिव को बुलाकर अपना मंतव्य प्रगट किया। शिव ने ब्रह्मा के मूल भाव को समझते हुए उन्हें अर्ध-नारीश्वर में दर्शन दिए। अर्थात स्त्री और पुरुष के सम्मिलन से सृष्टि के विकास की कल्पना दी। यह भी माना जाता है कि जब बरसात में बिजली दमकती है, तब उसकी रेखामयी आकृति अर्ध-नारीश्वर संरचना जैसी दिखती है। इस सूत्र के हाथ लगने के बाद ही ब्रह्मा ने सृष्टि के क्रम को निरंतर गतिशील बनाए रखने का विधान रचा।
सच्चाई भी है कि स्त्री व पुरुष का समन्वय ही सृष्टि का वास्तविक विधान है। इसीलिए स्त्री को प्रकृति का प्रतीक माना है। अर्थात प्रकृति में जिस तरह से सृजन का क्रम जारी रहता है, मनुष्य-योनी में उसी सृजन प्रक्रिया को स्त्री गतिशील बनाए हुए है। अर्ध-नारीश्वर यानी आधे-आधे रूपों में स्त्री और पुरुष की देहों का आत्मसात हो जाना। शिव-गौरी का यही वह महा-सम्मिलन है, जो सृष्टि के बीज को स्त्री की कोख, अर्थात प्रकृति की उर्वरा भूमि में रोपता है। सृष्टि का यह विकासक्रम अनवरत चलता रहे, इसीलिए सृष्टि के निर्माताओं ने इसमें आनंद की सुखानुभूति भी जोड़ दी है। सृष्टि के इस आदि-भूत मातृत्व व पितृत्व को पुराणों की प्रतीकात्मक भाषा में पार्वती-परमेश्वर या शिव-पार्वती कहा गया है। अर्थात शिव-शक्ति के साथ संयुक्त होकर अर्ध-नारीश्वर बन जाते हैं। इसलिए शिव से कहलाया है कि शक्ति यानी स्त्री को स्वीकार किए बिना पुरुष अपूर्ण है। स्त्री के बिना कोई कल्पना फलित नहीं हो सकती। अतएव पुरुष रूपी शिव और प्रकृति रूपी स्त्री जब अर्ध-नारीश्वर के रूप में एकाकार होते हैं तो सभी भेद और विकार स्वतः समाप्त हो जाते हैं।अर्थात जब पति-पत्नी के रूप में स्त्री-पुरुष एक दूसरे को आंतरिक रूप से तृप्त करते हैं, तभी अर्धनारीश्वर स्वरूप सार्थक होता है जीव रुपी सृष्टि का क्रम अनवरत रहता है।अतएव काम-भाव को धिक्कारना और योनि को नर्क का द्वार कहना जैसी उलाहनाएं शिव के अर्ध-नारीश्वर रूप की अवमानना है। वैसे भी मानव काया में काम का जो भाव है,वह मनुष्य द्वारा निर्मित कृत्रिम भाव नहीं है,वह स्त्री और पुरुष की प्राकृतिक प्रक्रिया है।





