लुप्त हुए ब्रज के वन!! बांसुरी की तान से कंक्रीट मिक्सचर के शोर तक: उजड़ता ब्रज, सिसकती पावन श्री कृष्ण की लीला भूमि!!

The forests of Braj have vanished!! From the tune of the flute to the noise of concrete mixture: Braj is falling apart, the sacred land of Shri Krishna's play is sobbing!!

बृज खंडेलवाल

टाइम मशीन में बैठकर लौटते हैं पौराणिक काल में। देखते हैं, गोकुल में यमुना किनारे फैला एक हरा-भरा वन। ऊँचे-ऊँचे वृक्षों की छाँव में मोर पंख फैलाए नाच रहे हैं, रंग-बिरंगी तितलियाँ हवा में रेशमी नक़्श बनाती उड़ रही हैं, गायें शांति से चर रही हैं, हिरण चौकड़ी भरते दौड़ रहे हैं। कदंब के पेड़ तले श्रीकृष्ण अपनी बांसुरी की मधुर तान छेड़ते हैं और गोपियाँ मानो किसी रूहानी जादू में डूबी झूम उठती हैं। पूरा ब्रज जैसे संगीत, प्रकृति और भक्ति का एक जीवंत स्वर्ग हो।

ये थी कभी ब्रज मण्डल की हकीकत। भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं की पावन धरती, जो कभी मथुरा के चारों ओर लगभग सौ कोस के दायरे में घने वनों से आच्छादित था। पुराणों, विशेषकर पद्म पुराण में वर्णित द्वादश वन—वृंदावन, मधुवन, तालवन, कुमुदवन, काम्यवन, बहुलावन, खदिरवन, महावन, भांडीरवन, बेलवन, लोहवन और भद्रवन, ब्रज मण्डल क्षेत्र की शान थे। इनके अलावा चौबीस उपवन, असंख्य कुंड, सरोवर, बगीचे और छोटी-छोटी धाराएँ मिलकर एक संतुलित और जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र बनाते थे।

इन्हीं वनों में श्रीकृष्ण की लीलाएँ साकार हुईं; चीरहरण लीला, कालिय नाग दमन, और रास लीला। पेड़ों की छाँव, यमुना के तट, फूलों से लदे कुंज और हरियाली से भरे मैदान, यही ब्रज की आत्मा थे। इस प्राकृतिक और आध्यात्मिक वातावरण ने सदियों तक संतों और कवियों को अपनी ओर खींचा। चैतन्य महाप्रभु वृंदावन आए, वल्लभाचार्य गोवर्धन पहुँचे, स्वामी हरिदास, सूरदास, हित हरिवंश, रसखान और मीरा जैसे भक्तों ने यहीं भक्ति की गंगा बहाई। उनके लिए यह धरती सिर्फ ज़मीन नहीं, बल्कि एक रूहानी एहसास थी।

इतिहास गवाह है कि मुगल काल में भी बाग़-बगीचों और हरियाली को अहमियत दी जाती थी। स्मारकों के आसपास विस्तृत उद्यान और योजनाबद्ध पार्क बनाए जाते थे। विद्वानों के अनुसार उस दौर में प्रकृति और स्थापत्य के बीच एक ख़ूबसूरत तालमेल था।

लेकिन आज हालात बदल चुके हैं। कभी हरा-भरा ब्रज अब कंक्रीट के जंगल में तब्दील होता चुका है। तेज़ी से बढ़ती आबादी, अंधाधुंध शहरीकरण, आलीशान टाउनशिप, रिसॉर्ट, बहुमंज़िला इमारतें और व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स पवित्र स्थलों के इर्द-गिर्द उग आए हैं। गोवर्धन पर्वत के आसपास भी अतिक्रमण बढ़ा है। खनन और पत्थर तोड़ने की गतिविधियों ने पहाड़ियों की हरियाली छीन ली है, मिट्टी का कटाव तेज़ हुआ है और पश्चिम से मरुस्थलीकरण की आहट साफ़ सुनाई दे रही है।

ब्रज की जीवनरेखा यमुना नदी भी गंभीर संकट में है। कभी निर्मल और कल-कल बहने वाली यमुना आज गंदे नाले में बदलती हो चुकी है। असंसाधित सीवेज और औद्योगिक कचरे के कारण पानी में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा कई जगह शून्य तक पहुँच जाती है, और फीकल कोलीफॉर्म का स्तर सुरक्षित सीमा से कई गुना ऊपर पाया गया है। सफाई अभियानों के बावजूद हालात चिंताजनक हैं। कुंड और सरोवर सूख चुके हैं या गाद से भर गए हैं, जिससे भूजल स्तर और जैव विविधता पर भी बुरा असर पड़ा है।

पर्यावरणविद लंबे समय से चेतावनी दे रहे हैं। ‘फ्रेंड्स ऑफ वृंदावन’ जैसे संगठनों का कहना है कि कभी यहाँ पचास से अधिक प्रजातियों की तितलियाँ देखी जाती थीं, आज गिनती की रह गई हैं। अनेक औषधीय पौधे और दुर्लभ वनस्पतियाँ लुप्तप्राय हैं। विशेषज्ञ इसे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गहरा और लगभग अपूरणीय नुकसान मानते हैं।

विडंबना यह है कि कुछ आध्यात्मिक संस्थाएँ भी इस बदलाव में अनजाने सहभागी बन गईं, हरियाली की जगह सीमेंट के आश्रम खड़े हो गए। भूमि के आसमान छूते दामों ने प्रकृति को पीछे धकेल दिया।

फिर भी उम्मीद की एक किरण बाकी है। हाल ही में प्राचीन वनों के पुनर्जीवन की योजनाएँ शुरू की गई हैं, जिनमें देशी प्रजातियों के पौधारोपण का प्रयास शामिल है। यदि संत, महात्मा, समाजसेवी और स्थानीय लोग मिलकर व्यापक वृक्षारोपण अभियान चलाएँ, पारंपरिक कुंडों का जीर्णोद्धार करें और टिकाऊ विकास की राह अपनाएँ, तो ब्रज की हरियाली लौट सकती है।

मुद्दा विकास का विरोध नहीं, बल्कि संतुलन का है। ब्रज की पहचान उसकी पवित्र पारिस्थितिकी से है। अगर वन नहीं बचेंगे, तो ब्रज केवल कथा और किंवदंती बनकर रह जाएगा; उसकी जीवंत रूह कंक्रीट के नीचे दफ़्न हो जाएगी।

राधा-कृष्ण की लीलाएँ प्रकृति से अलग नहीं थीं। ब्रज को बचाना केवल पर्यावरण की हिफ़ाज़त नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत की रक्षा भी है।