प्रेम प्रकाश
दुनिया ने सॉफ्ट पावर के रूप में खड़े हो रहे भारत के सांस्कृतिक बोध और परंपरा को मौजूदा देशकाल के फ्रेम में देखना-समझना खासा दिलचस्प है। महाशिवरात्रि से पहले कर्नाटक के विजयनगर स्थित ऐतिहासिक कोट्टरेश्वरा रथोत्सव की भव्यता को बड़े फ्रेम के साथ देश-विदेश के अखबारों में जगह दी गई। पांच सौ वर्ष पुरानी इस परंपरा में शिरकत करते हुए तीन लाख से ज्यादा भक्तों ने नंथी का रथ खींचकर अपनी आस्था और श्रद्धा को प्रकट किया। दुनियाभर में बड़े से बड़े म्यूजिकल कंसर्ट करने वाले कलाकारों की लोकप्रियता के हिस्से इस तरह की दिव्यता और भव्यता दुर्लभ है। होली तक अलग-अलग रूपों में भारत में लोक आस्था की यह दिव्यता अलग-अलग स्थानों पर दिखेगी। दरअसल, यह उस भारत की तस्वीर है ,जहां संघवादी ढांचे के बीच आस्था का घोष और सुशासन का मंत्र साथ-साथ गूंजता है।
मौजूदा दौर में सांस्कृतिक दिव्यता और उसकी लोक गूंज ने भारत-बोध का एक नया नैरेटिव गढ़ा है। इस नैरेटिव के बूते देश का आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक चरित्र बीते दो दशकों में पूरी तरह बदल गया है। यह स्वाधीन भारत में आया सबसे बड़ा परिवर्तन है, जिसका मस्तूल भारत का सांस्कृतिक वैभव है, उससे जुड़ी अस्मिता और बोध है। 21वीं सदी में तय हो रही नए भारत की यह यात्रा आज एक ऐसे मोड़ पर है, जहां यह जरूरी है कि हम इससे जुड़े कुछ जरूरी सरोकारों पर अधिक गंभीरता से विचार करें। ये वे ओझल रहे सांस्कृतिक सरोकार हैं, जिन पर न तो अब तक ढंग से बात हो पाई है और न इस बारे में कोई ताकतवर मुहिम ही अब तक खड़ी हो पो पाई है।
हमें यह बात समझनी होगी कि भारत के सांस्कृतिक बोध की जो गूंज अभी देश और देश के बाहर गूंज रही है, उसमें एक इकहरापन है। दरअसल, जब हम सुशासन के संकल्प के साथ विरासत और विकास की बात करते हैं तो इससे जुड़े राजनीतिक और प्रशासनिक तर्क के बारे में ही ज्यादा सोच पाते हैं, जबकि इससे जुड़ी सांस्कृतिक मूल्यनिष्ठा की अहमियत ज्यादा बड़ी है। अच्छी बात है कि देश के जिस सूबे के मुख्यमंत्री को कभी सुशासन बाबू कहा गया, आज उसी प्रदेश में इस मूल्यनिष्ठा का शानदार भाषाई सर्ग रचा जा रहा है।
अच्छी बात यह है कि इस चरह की तमाम चिंताओं को बीच खासतौर पर होली पर द्विअर्थी गीतों पर सख्ती की सराहनीय कोशिश भी दिख रही है। बड़ी बात यह है कि यह कवायद उस बिहार में खासतौर पर हो रही है जहां लोक गीतों पर फूहड़ता के हावी ने एक सांस्कृतिक चिंता की शक्ल ले ली है। मागधी भाषा परिवार से जुड़ी कई लोक भाषाओं से जुड़े इस प्रदेश में सार्वजनिक स्थानों और वाहनों में अश्लील एवं द्विअर्थी गाने बजाने वालों के खिलाफ राज्य सरकार ने पूरी तरह से कमर कस ली है।
बिहार के उपमुख्यमंत्री सह गृह मंत्री सम्राट चौधरी ने इस बाबत पुलिस मुख्यालय को सख्त निर्देश जारी करते हुए कहा है कि भोजपुरी, मगही, मैथिली या किसी भी भाषा के फूहड़ गानों पर तत्काल रोक लगाने की बात कही है। उन्होंने इस निर्णय के पीछे सामाजिक मर्यादा और सुरक्षा का तर्क दिया है। सरकार की सख्ती के बाद बिहार पुलिस ने ‘अश्लील गाने नहीं, सभ्य समाज बनाएं’ के संकल्प के साथ एक व्यापक अभियान और आधिकारिक अपील जारी की है। लगातार दो वर्षों से खासतौर पर होली से पूर्व प्रदेश सरकार की इस सजगता और सतर्कता का समाज के हर वर्ग ने स्वागत किया है। अलबत्ता यह कवायद अब भी एक पहल भर ही है, इसे एक बड़ी सांस्कृतिक सवाल का हल बनना बाकी है।
नोबेल विजेता साहित्यकार वीएस नायपॉल ने भोजपुरी डायस्पोरा का जिक्र करते हुए बताया है कि कैसे भोजपुरी भाषी क्षेत्र की परंपरा, मान्यताएं और गहन मन:स्थितियों ने युगीन यात्रा की है। भोजपुरी लोकसंगीत जब मॉरीशस में चटनी म्यूजिक के रूप में आधुनिक वाद्य यंत्रों के साथ रंग बिखेरती है, तो लगता है कि पीढ़ियों की संवेदना आधुनिक दरकारों और सरोकारों से गले मिल रही है। पर आज भोजपुरी को अपने घर में शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही है। गुलशन कुमार के जमाने में जब कैसेट क्रांति हुई तो यह चलन पहली बार तेजी से जोर पकड़ा। आज तो आलम यह है कि यूट्यूब से लेकर इंस्टाग्राम और सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर भोंडे और द्विअर्थी मायने वाले भोजपुरी गीत लाखों-करोड़ों के व्यूज बटोर रहे है। भाषाई मर्यादा को तार-तार करने से भी आगे ऐसे गीत अब जाति और वर्ग का नाम लेकर लैंगिक टिप्पणियों की इंतिहा तक पहुंच गए हैं। ऐसे कुछ मामलों में बात अदालत तक पहुंची और कई बार सामाजिक तनाव की भी स्थिति पैदा हुई।
बिहार के कई जिले ऐसे हैं जहां भोजपुरी प्रमुखता के साथ बोली जाती है। उत्तर प्रदेश के बलिया, बनारस और गोरखपुर से लेकर छपरा, सिवान और आरा-बक्सर का पूरा क्षेत्र सांस्कृतिक तौर पर बृहत भोजपुरी अंचल है। लिहाजा इस तरह की पहल का असर और संदेश तो बड़ा है ही, इसका प्रभाव भी कारगर और व्यापक हो सकता है। भूले नहीं हैं लोग कि दो साल पहले दो साल पहले शारदा सिन्हा का जब निधन हुआ तो देश-दुनिया ने एक लोकगायिका के सम्मान और उसकी लोक स्वीकार्यता को जीवंत रूप से देखा और महूसस किया। संयोग से हम जिस सांस्कृतिक मूल्यनिष्ठा और उससे जुड़ी भाषाई अस्मिता की बात कर रहे हैं, शारदा सिन्हा ने भी उस बारे में अपने कई साक्षात्कारों में बात की है। होली के मौके पर बजने वाले अश्लील और द्विअर्थी भोजपुरी गीतों पर रोक की कवायद ने सुशासन की चिंता और उसकी वैचारिक चौहद्दी को नया विस्तार दिया है।
बिहार को लेकर यह तथ्य में नीतीश सरकार ने पहले से ही शराबबंदी लागू कर रखी है। लिहाजा होली पर नशे के बीच अश्लील गीतों के कारण होने वाले हुड़दंग पर नकेल कसने की कोशिश कारगर रहेगी, ऐसी संभावना है। इस तरह की सांस्कृतिक पहल की अहमियत इसलिए भी है कि जिस उत्तर प्रदेश और बिहार ने राष्ट्रीय आंदोलन के दिनों से देश के राजनीतिक और सांस्कृतिक धज को तय किया है, उसका संस्कृति और समाज की भाषाई संवेदना के रूप में बने और टिके रहना जरूरी है।





