‘संतोषः परमं धनम्’-संतोष ही सबसे बड़ा धन है

‘Santosh: Param Dhanam’ – Contentment is the greatest wealth

सुनील कुमार महला

संस्कृत साहित्य में यह बात कही गई है कि- ‘संतोषः परमं धनम्’, अर्थात संतोष मनुष्य का सबसे मूल्यवान धन है। इससे बड़ा धन दुनिया में कोई और नहीं है।इसका सीधा सा मतलब यह है कि जो हमारे पास है, उसमें प्रसन्न रहना ही सच्ची समृद्धि है। आज की तेज़ भागदौड़, तनाव और अवसाद भरी दुनिया में लोग अधिक से अधिक धन, सुख-सुविधाएँ और प्रतिष्ठा पाने के पीछे दौड़ रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि बाहरी संपत्ति हमें केवल थोड़े समय का सुख(क्षणिक सुख) दे सकती है, स्थायी मानसिक शांति नहीं।पाठक जानते हैं कि मनुष्य की इच्छाएँ कभी समाप्त नहीं होतीं। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी पैदा हो जाती है। यदि व्यक्ति केवल इच्छाओं के पीछे ही भागता रहे, तो वह कभी संतुष्ट नहीं हो सकता। इसलिए कहा गया है कि जिसके पास बहुत धन है लेकिन संतोष नहीं, वह भी मन से गरीब ही रहता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति संतोषी है, वह सीमित साधनों में भी सुखी और शांत जीवन जी सकता है। संस्कृत में कहा गया है कि -‘यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥’ इसका तात्पर्य यह है कि जो व्यक्ति सहज प्राप्त वस्तु में संतुष्ट रहता है, ईर्ष्या से मुक्त होता है और सफलता-असफलता में समान रहता है, वह कर्म करते हुए भी बंधन में नहीं पड़ता। वास्तव में, संतोष का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य महत्वाकांक्षा छोड़ दे या प्रगति करना बंद कर दे। इसका सही अर्थ है- प्रयास करते हुए भी मन में लोभ, ईर्ष्या और असंतोष को स्थान न देना। संतोषी व्यक्ति दूसरों की सफलता देखकर जलता नहीं, बल्कि उनसे वह प्रेरणा लेता है। उसका जीवन सरल, संतुलित और तनावमुक्त होता है। यही कारण है कि संतोष मानसिक स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाता है और मनुष्य मन को शांति भी देता है।वास्तव में संतोष का भाव व्यवहार से जुड़ा है- संतोषी व्यक्ति सबका प्रिय बनता है। इसीलिए संस्कृत में कहा गया -“न कश्चित् कस्यचिद् मित्रं न कश्चित् कस्यचिद् रिपुः।व्यवहारेण जायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा॥’ संतोष मनुष्य को नैतिक और ईमानदार भी बनाता है। असंतोष ही वह कारण है, जिसके कारण व्यक्ति लालच में पड़कर गलत रास्ता अपनाता है। यदि व्यक्ति संतोषी हो, तो वह अनुचित तरीकों से धन कमाने की कोशिश नहीं करेगा। इस प्रकार संतोष समाज में नैतिकता और सदाचार को भी बढ़ावा देता है।संतोष का संबंध केवल धन या वस्तुओं से नहीं, बल्कि जीवन की परिस्थितियों से भी है। जीवन में कठिनाइयाँ और असफलताएँ आती हैं, लेकिन यदि व्यक्ति धैर्य और संतोष बनाए रखे, तो वह उन्हें आसानी से पार कर सकता है। संतोष मानसिक शक्ति देता है और निराशा से बचाता है। संतोषी व्यक्ति वर्तमान में जीना जानता है — वह न अतीत के पछतावे में उलझता है और न भविष्य की चिंता में, बल्कि वर्तमान क्षण का आनंद लेता है।इसके अलावा, संतोष का संबंध कृतज्ञता से भी है। जो व्यक्ति अपने जीवन की छोटी-छोटी खुशियों के लिए आभारी रहता है, वही सच्चा संतोष अनुभव करता है। उसका सुख बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि उसके भीतर से उत्पन्न होता है।अंततः, यह बात कही जा सकती है कि धन-दौलत जीवन को सुविधाजनक बना सकते हैं, पर सच्चा सुख केवल संतोष से मिलता है। जिस व्यक्ति के पास संतोष का खजाना है, वह हर परिस्थिति में आनंद और शांति महसूस करता है। इसलिए हमें अपने जीवन में संतोष और कृतज्ञता को विकसित करना चाहिए।वास्तव में, संतोष सुखी जीवन का मूल मंत्र है।वास्तविक समृद्धि बैंक खाते में नहीं, बल्कि मन की तृप्ति और शांति में होती है। जो व्यक्ति संतोष सीख लेता है, वही सच में सबसे धनी और सुखी होता है।