भारतीय लोकतंत्र में विकल्प की पुनर्स्थापना

Restoring choice in Indian democracy

संतोष सिंह

वर्ष 2014 का वह समय भारतीय राजनीति के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ की तरह दर्ज है। चुनावी सभाओं की गूंज, मीडिया की बहसें और जनमानस की चर्चाएँ—सबके केंद्र में एक ही वाक्य तैरता था: “मोदी का कोई विकल्प नहीं है।” उस दौर में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व ने एक ऐसी राजनीतिक लहर को जन्म दिया, जिसने केवल सत्ता परिवर्तन ही नहीं किया, बल्कि राजनीतिक विमर्श की दिशा भी बदल दी। एक सशक्त, निर्णायक और करिश्माई नेतृत्व की छवि ने जनता के भीतर स्थिरता और विकास की आकांक्षाओं को स्वर दिया। विपक्ष बिखरा हुआ था, नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता थी, और परिणामस्वरूप “विकल्पहीनता” एक राजनीतिक सत्य की तरह स्थापित हो गई।

परंतु लोकतंत्र किसी एक क्षण की स्थिर तस्वीर नहीं, बल्कि निरंतर बदलती हुई चलचित्र है। समय का पहिया घूमता है, परिस्थितियाँ करवट लेती हैं और जनमत की धाराएँ नए मार्ग तलाशती हैं। पिछले दस-बारह वर्षों में भारतीय राजनीति ने अनेक रंग देखे—उम्मीद, उत्साह, असहमति, विरोध और पुनर्विचार। यह वही कालखंड है जिसमें राजनीति का केंद्रबिंदु “अपरिहार्य नेतृत्व” से हटकर “संभावित विकल्प” की ओर मुड़ता दिखाई देता है।

इसी बदलते परिदृश्य में राहुल गांधी का राजनीतिक व्यक्तित्व नए आयामों के साथ उभरता है। एक समय था जब उन्हें राजनीतिक व्यंग्य का विषय बनाया जाता था, उनकी गंभीरता पर प्रश्न उठाए जाते थे और उन्हें अपरिपक्व नेतृत्व का प्रतीक बताया जाता था। किंतु राजनीति में समय सबसे बड़ा शिक्षक होता है। जनसंवाद की निरंतरता, पदयात्राओं की तपस्या और मुद्दा-आधारित राजनीति की प्रतिबद्धता ने उनकी छवि को धीरे-धीरे पुनर्निर्मित किया है।

उनकी देशव्यापी यात्राएँ केवल राजनीतिक कार्यक्रम नहीं रहीं; वे एक प्रकार का सामाजिक संवाद बन गईं। धूल भरी सड़कों पर पैदल चलते हुए, किसानों से बातचीत करते हुए, युवाओं की आकांक्षाएँ सुनते हुए और महिलाओं की समस्याओं पर चर्चा करते हुए उन्होंने यह संदेश देने का प्रयास किया कि राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि संवेदनाओं का सेतु भी है। इस प्रक्रिया ने उनके समर्थकों में एक नई आशा जगाई है—कि वे एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में उभर सकते हैं। धीरे -धीरे भारतीय राजनीति के परिदृश्य में विपक्ष की शैली भी समय के साथ कहीं अधिक आक्रामक, धारदार और मुखर होती चली गई। कभी संकोच और बचाव की मुद्रा में दिखने वाला विपक्ष अब सीधे टकराव की रणनीति अपनाता दिखाई देता है। इस परिवर्तन के केंद्र में यदि किसी एक चेहरे को रखा जाए, तो वह हैं राहुल गांधी।

कभी उपहास का पात्र बनने वाले राहुल गांधी आज खुले मंचों से सरकार को ललकारते हुए दिखाई देते हैं। संसद हो या सड़क, प्रेस वार्ता हो या पदयात्रा—उनकी भाषा में अब हिचक नहीं, बल्कि सवालों की स्पष्टता और आरोपों की तीक्ष्णता दिखाई देती है। हालात इस हद तक बदले हैं कि सत्ता पक्ष के कई नेता अब राहुल गांधी के सीधे सवालों से बचने की कोशिश करते नज़र आते हैं। राजनीतिक विमर्श में यह बदलाव केवल व्यक्तित्व का नहीं, बल्कि विपक्ष की आत्मविश्वासपूर्ण वापसी का संकेत है।

बीते वर्षों में एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन यह हुआ कि भारतीय विदेश नीति, जो प्रायः कूटनीतिक गलियारों तक सीमित रहती थी, अब घरेलू राजनीतिक बहस का विषय बन गई है। अमेरिका के साथ संबंधों की प्रकृति, वैश्विक मंचों पर भारत की भूमिका, और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं में कथित हस्तक्षेप जैसे मुद्दों ने सियासी तापमान को बढ़ा दिया है। विदेश नीति, जो कभी सर्वसम्मति का क्षेत्र मानी जाती थी, अब आरोप-प्रत्यारोप का मैदान बन चुकी है।

इसी क्रम में तथाकथित “एपस्टीन फाइल्स” जैसे प्रसंगों ने सत्तारूढ़ दल को असहज किया। इन मुद्दों को विपक्ष ने केवल राजनीतिक अवसर के रूप में नहीं, बल्कि जवाबदेही के प्रश्न के रूप में उठाया। संसद के भीतर और बाहर, इन घटनाओं को लेकर तीखे सवाल किए गए।

सबसे उल्लेखनीय प्रसंग रहा ‘फोर स्टार्स ऑफ़ डेस्टिनी’ — जो पूर्व सेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे की आत्मकथा है। इस पुस्तक में वर्णित घटनाओं और संकेतों को आधार बनाकर राहुल गांधी ने संसद में जिस कुशलता से सरकार को घेरा, वह उनकी राजनीतिक रणनीति की परिपक्वता का परिचायक था। उन्होंने केवल आरोप नहीं लगाए, बल्कि तथ्यों और उद्धरणों के सहारे सत्ता पक्ष से स्पष्टीकरण माँगा।

यह दृश्य भारतीय लोकतंत्र के लिए एक नए अध्याय जैसा प्रतीत हुआ—जहाँ विपक्ष केवल विरोध के लिए विरोध नहीं कर रहा, बल्कि विमर्श की दिशा तय करने का प्रयास कर रहा है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि जिस “विकल्प” की अनुपस्थिति का दावा कभी बार-बार दोहराया जाता था, वह अब केवल आकार ही नहीं ले चुका है, बल्कि सत्ता से सीधा संवाद—और टकराव—करने के लिए तत्पर भी है।

इस पूरे परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण तत्व है—जनमत। लोकतंत्र की असली शक्ति न तो किसी एक नेता में निहित है और न ही किसी एक दल में; वह निहित है जनता के विश्वास में। यह विश्वास समय के साथ बदलता है, परखा जाता है और पुनर्निर्मित होता है। आज जो नेतृत्व निर्विवाद प्रतीत होता है, वह कल चुनौती के घेरे में आ सकता है; और जो आज चुनौतीकर्ता है, वह कल जनादेश का केंद्र बन सकता है।

भारतीय लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि यहाँ कोई भी सत्ता शाश्वत नहीं और कोई भी विकल्प अंतिम नहीं। राजनीति में “विकल्पहीनता” की धारणा स्वयं लोकतांत्रिक चेतना के विरुद्ध है, क्योंकि लोकतंत्र का अर्थ ही है—चयन की स्वतंत्रता। आज का राजनीतिक विमर्श यह संकेत देता है कि देश में विकल्प की राजनीति पुनः जीवंत हो रही है। यह प्रतिस्पर्धा केवल व्यक्तियों की नहीं, बल्कि विचारों की है; केवल सत्ता की नहीं, बल्कि दृष्टिकोण की है।

अंततः, भारतीय राजनीति एक बहती हुई नदी की तरह है—कभी शांत, कभी प्रबल, परंतु सदैव गतिशील। इस प्रवाह में नेतृत्व उभरते हैं, स्थापित होते हैं और कभी-कभी विलीन भी हो जाते हैं। किंतु लोकतंत्र का प्रवाह निरंतर बना रहता है। यही उसकी शक्ति है, यही उसकी आशा है, और यही उसकी स्थायी सुंदरता।