(डीजे संस्कृति और अशोभनीय प्रस्तुतियों के बीच बच्चों के संस्कार, अनुशासन और शिक्षा के मूल उद्देश्य पर गंभीर चिंता)
डॉ. प्रियंका सौरभ
विद्यालय किसी भी राष्ट्र की आत्मा का निर्माण करते हैं। यही वे स्थान हैं जहाँ से समाज की दिशा तय होती है और आने वाली पीढ़ियों के विचार, मूल्य तथा व्यवहार गढ़े जाते हैं। एक सभ्य समाज की पहचान उसके विद्यालयों से होती है, क्योंकि यहीं बच्चों को केवल अक्षर ज्ञान ही नहीं, बल्कि अनुशासन, नैतिकता, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का बोध कराया जाता है। ऐसे में यदि विद्यालय परिसरों में अशोभनीय गीतों पर नृत्य, फूहड़ मनोरंजन और मर्यादा-विहीन प्रस्तुतियाँ सामने आती हैं, तो यह केवल किसी एक संस्था की चूक नहीं, बल्कि पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।
हाल के वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसे दृश्य सामने आए हैं, जहाँ विद्यालयों में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों के दौरान ऐसे गीत और नृत्य प्रस्तुत किए गए, जिनका शिक्षा और संस्कार से कोई संबंध नहीं है। ये घटनाएँ यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या हम विद्यालयों को भी उसी बाज़ारू संस्कृति के हवाले कर रहे हैं, जिसने मनोरंजन को मर्यादा से ऊपर रख दिया है? क्या बच्चों की मासूम मानसिकता को हम अनजाने में ऐसे प्रभावों के हवाले कर रहे हैं, जिनका दीर्घकालिक असर उनके चरित्र और सोच पर पड़ सकता है?
आज यह सत्य है कि डीजे संस्कृति, सोशल मीडिया और त्वरित लोकप्रियता की दौड़ ने समाज के हर वर्ग को प्रभावित किया है। गीतों और मनोरंजन की भाषा बदली है, प्रस्तुति का स्तर बदला है और ‘वायरल’ होने की होड़ ने विवेक को पीछे छोड़ दिया है। लेकिन विद्यालय कोई सार्वजनिक मंच या मनोरंजन स्थल नहीं है। यह वह स्थान है जहाँ बच्चों को यह सिखाया जाना चाहिए कि क्या उचित है और क्या अनुचित, क्या स्वीकार्य है और क्या नहीं। यदि विद्यालय ही इस भेद को मिटाने लगें, तो बच्चों के मन में नैतिक सीमाओं की समझ कैसे विकसित होगी?
इस पूरे प्रश्न का एक पक्ष यह भी है कि कई बार ऐसे कार्यक्रमों में बाहरी डीजे या आयोजनकर्ताओं की भूमिका होती है। संभव है कि किसी विद्यालय में ऐसा संगीत बिना पूर्व योजना के बज गया हो या बच्चों ने उत्साह में कोई अनुचित गीत चुन लिया हो। परंतु ऐसे हर परिदृश्य में सबसे बड़ी जिम्मेदारी विद्यालय प्रशासन और शिक्षकों की होती है। शिक्षक केवल पाठ्यपुस्तक पढ़ाने वाले कर्मचारी नहीं होते; वे आदर्श, अनुशासन और मर्यादा के जीवंत उदाहरण होते हैं। उनकी चुप्पी या लापरवाही बच्चों के लिए मौन स्वीकृति बन जाती है।
विद्यालयों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का उद्देश्य बच्चों की रचनात्मकता को सकारात्मक दिशा देना होता है। नृत्य, संगीत और नाटक बच्चों के आत्मविश्वास को बढ़ाते हैं, उनकी प्रतिभा को मंच देते हैं और उन्हें अपनी संस्कृति से जोड़ते हैं। लेकिन जब यही मंच फूहड़ता का माध्यम बन जाए, तो उसका उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। लोकनृत्य, देशभक्ति गीत, शास्त्रीय या सुगम संगीत, प्रेरक नाटक—ये सब न केवल मनोरंजन करते हैं, बल्कि बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं। इसके विपरीत, अश्लीलता आधारित प्रस्तुतियाँ केवल क्षणिक तालियाँ तो बटोर सकती हैं, पर वे किसी भी तरह से बच्चों के व्यक्तित्व को समृद्ध नहीं करतीं।
यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि समाज और अभिभावकों की भूमिका क्या है। आज कई बार अभिभावक भी विद्यालयों से केवल परिणाम और प्रतियोगिता की अपेक्षा रखते हैं, जबकि मूल्य-आधारित शिक्षा पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है। यदि किसी विद्यालय में ऐसी घटनाएँ होती हैं, तो केवल शिक्षकों या प्रशासन को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं। समाज को भी यह तय करना होगा कि वह अपने बच्चों को किस तरह का वातावरण देना चाहता है। क्या हम चाहते हैं कि विद्यालय भी उसी संस्कृति को अपनाएँ, जो टीवी और मोबाइल स्क्रीन पर परोसी जा रही है, या हम उनसे कुछ बेहतर, कुछ अधिक जिम्मेदार अपेक्षा रखते हैं?
दूसरी ओर, यह भी आवश्यक है कि हर घटना पर प्रतिक्रिया संतुलित हो। किसी एक चूक के आधार पर पूरे शिक्षक समुदाय को कठघरे में खड़ा करना या कठोर दंड की माँग करना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। शिक्षक भी इंसान हैं और उनसे भी भूल हो सकती है। यदि कोई घटना पहली बार हुई है और उसमें दुर्भावना नहीं थी, तो सुधारात्मक चेतावनी, स्पष्ट दिशा-निर्देश और संवेदनशील प्रशिक्षण अधिक प्रभावी हो सकता है। लेकिन यदि ऐसी गतिविधियाँ बार-बार हों, या जानबूझकर मर्यादा को तोड़ा जाए, तो सख्त कार्रवाई भी उतनी ही आवश्यक है, ताकि अनुशासन की मर्यादा बनी रहे।
आज आवश्यकता इस बात की है कि पूरे देश में विद्यालयों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए स्पष्ट और एकरूप दिशा-निर्देश हों। ये दिशा-निर्देश केवल कागज़ों तक सीमित न रहें, बल्कि उनका ईमानदारी से पालन हो। कार्यक्रमों की पूर्व स्वीकृति, गीतों और प्रस्तुतियों की समीक्षा, वेशभूषा की मर्यादा और मंच संचालन की जिम्मेदारी—इन सभी बिंदुओं पर स्पष्ट नियम होने चाहिए। साथ ही शिक्षकों के लिए नियमित प्रशिक्षण भी आवश्यक है, ताकि वे बदलते सामाजिक प्रभावों को समझते हुए बच्चों को सही मार्गदर्शन दे सकें।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि नैतिकता और संस्कृति का अर्थ कठोरता या रचनात्मकता का दमन नहीं है। बच्चों को आधुनिकता से काटना समाधान नहीं, बल्कि उन्हें विवेक के साथ आधुनिकता को अपनाना सिखाना अधिक आवश्यक है। विद्यालयों को ऐसा वातावरण बनाना चाहिए, जहाँ बच्चे खुलकर अपनी प्रतिभा दिखा सकें, पर साथ ही यह भी समझें कि हर मंच की अपनी मर्यादा होती है। स्वतंत्रता और अनुशासन का संतुलन ही स्वस्थ शिक्षा व्यवस्था की पहचान है।
यदि हम व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो यह मुद्दा केवल विद्यालयों तक सीमित नहीं है। यह उस सामाजिक दिशा का प्रतिबिंब है, जिसमें हम आगे बढ़ रहे हैं। जब समाज में फूहड़ता सामान्य होती जाती है, तो उसका असर संस्थानों पर भी पड़ता है। इसलिए इस समस्या का समाधान केवल नियमों से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना से भी जुड़ा है। मीडिया, मनोरंजन उद्योग और डिजिटल प्लेटफॉर्म—सभी की जिम्मेदारी बनती है कि वे बच्चों और युवाओं के लिए जिम्मेदार सामग्री प्रस्तुत करें।
भारत जैसे विविधता और सांस्कृतिक विरासत से समृद्ध देश में विद्यालयों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यहाँ की शिक्षा व्यवस्था केवल रोजगार सृजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक निरंतरता और लोकतांत्रिक मूल्यों की वाहक है। यदि विद्यालयों में ही मर्यादा और संस्कार कमजोर पड़ने लगें, तो इसका असर केवल कुछ कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि धीरे-धीरे समाज के ताने-बाने को भी प्रभावित करेगा।
अंततः, यह आवश्यक है कि हम इस विषय को न तो अतिशयोक्ति में बदलें और न ही हल्के में लें। यह समय आत्ममंथन का है—शिक्षकों के लिए, प्रशासन के लिए, अभिभावकों के लिए और समाज के लिए। विद्यालयों को फिर से उस स्थान के रूप में स्थापित करना होगा, जहाँ ज्ञान के साथ-साथ संस्कार भी दिए जाते हैं। जहाँ मनोरंजन हो, पर मर्यादा के साथ; जहाँ स्वतंत्रता हो, पर जिम्मेदारी के साथ।
विद्यालय वास्तव में मंदिर हैं—ऐसे मंदिर जहाँ भविष्य की पीढ़ियाँ गढ़ी जाती हैं। इन मंदिरों की गरिमा बनाए रखना किसी एक वर्ग की नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि हम यह जिम्मेदारी ईमानदारी से निभा पाए, तभी हम आने वाली पीढ़ियों को एक संतुलित, संस्कारी और जिम्मेदार नागरिक के रूप में विकसित कर सकेंगे।
(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)





