सुनील सक्सेना
एक समय था जब समाचार सुनने के लिए आकाशवाणी पर रात पौने नौ बजे का इंतजार रहता था । देश में दिन भर में जो कुछ घटा उसका लेखा-जोखा, ब्यौरा देवकीनंदन पाण्डे अपनी खनकदार आवाज में रेडियो पर सुनाते थे । श्रोताओं को समाचार वाचकों के बोलने के अंदाज में विश्वसनीयता नजर आती थी । उद्घघोषक के साथ श्रोताओं का राब्ता हो जाता था । उस दौर में खबरों की सच्चाई का प्रमाण आकाशवाणी ही थी । न्यूज अगर रेडियो पर आगई है तो वो निश्चित मानिए पक्की खबर है । आप बिंदास होकर किसी बहस में शर्त बद सकते थे ।
समय बदला । टीवी आया । दूरदर्शन एक ही चैनल था । मनोरंजन के कार्यक्रमों के साथ ही समाचार के लिए भी स्लॉट निर्धारित हुआ । खबरों के परंपरागत श्रोता अब दर्शक बन चुके थे । टीवी पर समाचारों का प्रसारण हिंदी और अंग्रेजी में शुरू हुआ । अब हम माइक के पीछे छिपे चेहरों को टीवी के पर्दे पर देख सकते थे ।
हिंदी में खबरों के लिए एक ओर जहां जे.वी.रमन, शम्मी नारंग जैसे न्यूज रीडर दूरदर्शन पर प्रमुख चेहरा थे वहीं दूसरी और महिला समाचार वाचकों में सरला माहेश्वरी (विवाह पूर्व सरला जरीवाला), सलमा सुल्तान, मंजरी जोशी सहाय ने अपनी मधुर आवाज और प्रजेंटेशन से दर्शकों को प्रभावित किया ।
दूरदर्शन इकलौता चैनल था । मुक्त बाजार का दौर आया । यकायक चैनलों की बाढ़ आ गई । सबसे तेज, सबसे पहले, सबसे आगे की होड़-दौड़ चैनलों में शुरू हो गई । चौबीस घंटे खबरें ही खबरें । प्रसारण की तकनीकी बढ़ी लेकिन प्रोग्राम की गुणवत्ता घट गई ।
चैनलों पर विश्वसनीय सूत्रों से मिलीं और प्रसारित खबरें अविश्वसनीय हो गईं । सामाचारों की भाषा, उद्घोषकों के शब्दों के उच्चारण, लहजा जिन पर पहले खूब ध्यान दिया जाता था, जो अच्छे न्यूज रीडर की अनिवार्य शर्त हुआ करती थी, का स्तर गिरता चला गया । टीआरपी की प्रतिस्पर्धा ने चैनलों का सत्यानाश कर दिया । खबरें सामान्य ज्ञान कम बढ़ातीं, सनसनी ज्यादा फैलाने लगीं । दर्शक छिटकने लगे ।
पुरूष समाचार वाचकों का खबरें पढ़ना कम और चीखना चिल्लाना ज्यादा शुरू हो गया । एंकर्स किसी तात्कालिक घटना पर तुर्श ज़हर बुझी परिचर्चा में उपस्थित विशेषज्ञों को आपस में लड़वाने का काम करने लगे ।
जनोन्मुख होने का दावा करने वाले न्यूज चैनल अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता में ऐसे जकड़े कि सच कहने और दिखाने का साहस ही उनमें खत्म हो गया । विचार और विवेचना की चोंध जाती रही जो किसी समय खबरों का मुख्य आकर्षण हुआ करती थी । मीडिया “हिज मास्टर्स वॉइस” बनकर रह गया । फलस्वरूप इन दिनों सच फरार हो गया है और जनता सच जानने से वंचित हो गई है ।
रही सही कसर सोशल मीडिया ने पूरी कर दी । आधी-अधूरी, सुनी-सुनाई बातों को झटपट सोशल मीडिया पर पोस्ट करके लाइक्स बटोरने का जो चलन शुरू हुआ उससे सही खबरों की नब्ज पकड़ पाना और कठिन हो गया । खोजी पत्रिकारिता तो कब की हाशिए पर चली गई । वातानुकूलित कमरों में बैठकर न्यूज तैयार करने वाले चटपटी खबरों को लपकने का अवसर नहीं चूकते हैं । तुरत-फुरत सोशल मीडिया से खबरें उठाकर, बिना सच्चाई की पुष्टि किए चैनल पर चला देते हैं । हाल ही में अभिनेता धर्मेन्द्र की मौत की गलत खबर प्रसारित करने का उदाहरण सबके सामने है ।
अस्सी के दशक की वो शालीन परिधानों में सजीधजी, धीर-गंभीर आवाज में समाचार पढ़ने वाली न्यूज रीडर्स धीरे-धीरे दृश्य से गायब हो गईं । उनकी जगह मुर्दाशंख चेहरे पर पोते, खबरें पढ़ते वक्त घड़ी-घड़ी अपनी जुल्फें संवारती हुईं , ग्लैमरस न्यूज रीडर आ गईं । जिनकी तवज्जो खबरों को सलीके से पढ़ने पर कम स्वंय को संवारने में अधिक रहती है ।
निजी चैनल के शरूआती दिनों में आजतक चैनल के एस पी के नाम से प्रसिद्ध सुरेंद्र प्रताप सिंह ने जरूर समाचार वाचन की गरिमा को बनाए रखा था । लोग उन्हें गंभीरता से सुनते थे । दुर्भाग्यवश वे भी जल्दी ही इस दुनिया से चले गए । महिला एंकर में एनडीटीवी की निधि कुलपति ने भी अपने रिटायरमेंट तक संजीदगी और सादगी को कायम रखा ।
ये सच है कि अतीत से जुड़े रहने पर चेतना का विकास नहीं होता, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अतीत के परित्याग के लिए वर्तमान आशाओं और संभावनाओं से भरा होना जरूरी है , जो खबरों की दुनिया के मामले में फिलहाल दूर-दूर तक कहीं नजर नहीं आता है ।
सरला महेश्वरी के जाने से टीवी एंकरों की स्मृतियों से गुंथी किताब का एक पन्ना और चला गया । सरला माहेश्वरी की शीरीं आवाज कानों में ओस की तरह धीरे-धीरे उतरती थी । उनकी ओजस्वी गूंज हमेशा दर्शकों के अंतर्मन में सुनाई देती रहेगी । सरला माहेश्वरी ने जो मयार हासिल किया वो बिरलों को ही नसीब होता है ।





