पीएम मोदी की मलेशिया यात्रा ने दोनों देशों के बीच संबंधों की लिखी नई पटकथा

PM Modi's visit to Malaysia has written a new script for relations between the two countries

बिशन पपोला

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मलेशिया यात्रा कई स्तरों पर महत्वपूर्ण रही। यह वर्ष 2026 की उनकी पहली विदेश यात्रा थी, और सात वर्षों के अंतराल के बाद वे कुआलालंपुर पहुंचे। प्रतीकात्मक रूप से भी यह दौरा खास रहा। मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम स्वयं एयरपोर्ट पर उनकी अगवानी के लिए उपस्थित थे। कूटनीति में ऐसे संकेत केवल शिष्टाचार नहीं होते, बल्कि वे राजनीतिक प्राथमिकताओं और भविष्य की दिशा का संकेत देते हैं।

यह यात्रा इसलिए भी अहम है, क्योंकि अक्टूबर 2025 में आसियान शिखर सम्मेलन के दौरान भारत की अनुपस्थिति और पहलगाम हमले के बाद पैदा हुई कूटनीतिक ठंडक ने दोनों देशों के रिश्तों में हल्की खटास पैदा कर दी थी, हालांकि मलेशिया ने पहलगाम हमले की निंदा की थी, लेकिन भारत-पाकिस्तान तनाव में मध्यस्थता की पेशकश ने नई दिल्ली को असहज किया था। ऐसे परिदृश्य में यह दौरा संबंधों की मरम्मत भर नहीं, बल्कि उन्हें नई रणनीतिक ऊंचाई देने का प्रयास है।

इस यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि संयुक्त बयान में सीमा पार आतंकवाद का स्पष्ट उल्लेख माना जा रहा है। इससे पहले भी 2015, 2017 और 2024 में आतंकवाद की निंदा के संयुक्त वक्तव्य आए थे, लेकिन पहली बार सीमा पार शब्दावली का उपयोग हुआ है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह भारत की महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता है। भारत लंबे समय से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के मुद्दे को वैश्विक मंचों पर उठाता रहा है। मलेशिया जैसे प्रभावशाली आसियान देश द्वारा इस शब्दावली को स्वीकार करना दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की बढ़ती स्वीकार्यता और कूटनीतिक प्रभाव का संकेत है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि भारत और मलेशिया 2027 तक आसियान की आतंकवाद-रोधी उपसमिति के सह-अध्यक्ष हैं। ऐसे में, आतंकवाद के एजेंडे को क्षेत्रीय मंचों पर प्राथमिकता देना पाकिस्तान के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे भारत को आसियान मंचों पर सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे को संस्थागत रूप देने में सुविधा होगी। भारत-मलेशिया संबंधों में उतार-चढ़ाव का इतिहास रहा है। महातिर मोहम्मद के कार्यकाल में कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में उठाना और नागरिकता कानून को लेकर सार्वजनिक टिप्पणियां करना दोनों देशों के बीच तनाव का कारण बना। भारत ने उस समय कूटनीतिक असंतोष भी दर्ज कराया था, लेकिन वर्तमान परिदृश्य अलग है। विशेषज्ञों के अनुसार, अनवर इब्राहिम की सरकार भारत के साथ संबंधों को नई दिशा देना चाहती है। इसके पीछे केवल द्विपक्षीय कारण नहीं, बल्कि व्यापक भू-राजनीतिक समीकरण भी हैं। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच मलेशिया संतुलित रणनीति अपनाना चाहता है। भारत एक उभरती आर्थिक शक्ति और इंडो-पैसिफिक में संतुलनकारी कारक के रूप में उसके लिए स्वाभाविक साझेदार बन रहा है।

अगस्त 2024 में भारत और मलेशिया ने अपने संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी का दर्जा दिया था। यह यात्रा उसी साझेदारी को ठोस आधार देने का प्रयास है। 11 समझौते और एमओयू, जिनमें रक्षा, ऊर्जा, डिजिटल प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्र शामिल हैं, इस बात का संकेत हैं कि दोनों देश केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहना चाहते।
संयुक्त बयान में सार्वजनिक रूप से विवादास्पद मुद्दों—जैसे ज़ाकिर नाइक के प्रत्यर्पण का उल्लेख न होना भी परिपक्व कूटनीति का संकेत है। दोनों पक्षों ने सहमति के क्षेत्रों पर जोर देते हुए असहमति के मुद्दों को सार्वजनिक विमर्श से दूर रखा।

सेमीकंडक्टर उद्योग इस यात्रा का आर्थिक केंद्रबिंदु रहा। मलेशिया वैश्विक सेमीकंडक्टर निर्यात में शीर्ष देशों में शामिल है, जबकि भारत इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में शुरुआती चरण में है। संयुक्त बयान में इस उद्योग के रणनीतिक महत्व को स्वीकार किया गया, और तकनीकी सहयोग की बात कही गई। विशेषज्ञों के अनुसार, यह समझौता भारत की सेमीकंडक्टर विनिर्माण महत्वाकांक्षा को गति दे सकता है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के पुनर्संयोजन और चीन पर निर्भरता कम करने की अंतरराष्ट्रीय कोशिशों के बीच भारत-मलेशिया सहयोग क्षेत्रीय उत्पादन नेटवर्क को नया आयाम दे सकता है। यह केवल व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि तकनीकी संप्रभुता की दिशा में कदम है।

दोनों देशों के बीच व्यापार लगभग 8.5 बिलियन डॉलर के आसपास है, जिसे बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई गई है। स्थानीय मुद्राओं भारतीय रुपये और मलेशियाई रिंगित में व्यापार को अद्भुत उपलब्धि बताया गया। विशेषज्ञों के अनुसार, स्थानीय मुद्रा में व्यापार डॉलर निर्भरता को कम करने की व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है। ब्रिक्स और अन्य बहुपक्षीय मंचों पर भी यह विमर्श चल रहा है। भारत इस वर्ष ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता करेगा, ऐसे में मलेशिया की सदस्यता आकांक्षा का संयुक्त बयान में उल्लेख कूटनीतिक संकेत देता है। भारत मलेशिया से पाम ऑयल और इलेक्ट्रॉनिक्स आयात करता है, जबकि एल्यूमिनियम और पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात करता है। व्यापार संरचना को अधिक संतुलित और विविध बनाने की आवश्यकता है।

सेमीकंडक्टर और डिजिटल प्रौद्योगिकी इस दिशा में नए अवसर प्रदान कर सकते हैं। इस यात्रा के समानांतर पाकिस्तान के नौसेना प्रमुख की मलेशिया यात्रा भी हुई। ऐतिहासिक रूप से मलेशिया और पाकिस्तान के बीच रक्षा संबंध रहे हैं। ऐसे में, भारत की सक्रियता को एक संतुलनकारी प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, मलेशिया पाकिस्तान के साथ अपने पारंपरिक संबंध बनाए रखेगा, लेकिन भारत के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाना उसके लिए रणनीतिक विविधीकरण का हिस्सा है। इंडो-पैसिफिक में समुद्री सुरक्षा, सूचना साझा करना और आतंकवाद-रोधी सहयोग जैसे क्षेत्र साझा हितों को मजबूत करते हैं। यह स्पष्ट है कि मलेशिया किसी एक धुरी में बंधना नहीं चाहता, बल्कि बहुध्रुवीय संतुलन की नीति अपना रहा है। आसियान मंचों पर भारत की बढ़ती सक्रियता पाकिस्तान के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकती है। विशेषकर जब आतंकवाद का मुद्दा संस्थागत रूप से उठाया जा रहा हो।

विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे को फिर से उठाने की कोशिश कर सकता है, लेकिन अनवर सरकार के तहत मलेशिया के भारत-विरोधी रुख अपनाने की संभावना सीमित दिखती है। भारत की एक्ट ईस्ट नीति, जो पूर्ववर्ती लुक ईस्ट का विस्तार है, अब केवल आर्थिक पहल नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी का व्यापक ढांचा बन चुकी है। मलेशिया इस ढांचे का महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकता है। इस यात्रा की एक बड़ी विशेषता यह रही कि दोनों देशों ने असहमति के मुद्दों को उछालने से बचते हुए सकारात्मक एजेंडे पर ध्यान केंद्रित किया। कूटनीति केवल मतभेदों को उजागर करने का मंच नहीं, बल्कि साझा हितों को पहचानकर उन्हें आगे बढ़ाने की कला है। भारत और मलेशिया ने यही किया है।

संयुक्त बयान में आतंकवाद, आर्थिक सहयोग, सेमीकंडक्टर, डिजिटल प्रौद्योगिकी और रक्षा सहयोग जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता देना यह संकेत देता है कि संबंध अब भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से आगे बढ़कर रणनीतिक यथार्थवाद पर आधारित हैं। प्रधानमंत्री मोदी की मलेशिया यात्रा को केवल एक द्विपक्षीय घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह इंडो-पैसिफिक की बदलती शक्ति-संरचना, आसियान की भूमिका, पाकिस्तान के साथ प्रतिस्पर्धी विमर्श और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के पुनर्गठन की व्यापक पृष्ठभूमि में घटित हुई है। सीमा पार आतंकवाद का उल्लेख भारत के लिए कूटनीतिक उपलब्धि है, लेकिन असली परीक्षा इसे क्षेत्रीय मंचों पर ठोस नीति में बदलने की होगी। सेमीकंडक्टर सहयोग भारत की औद्योगिक महत्वाकांक्षा को बल दे सकता है, लेकिन इसके लिए दीर्घकालिक निवेश, कौशल विकास और नीति स्थिरता आवश्यक होगी। मलेशिया के लिए भी यह अवसर है कि वह भारत के साथ संबंधों को केवल भावनात्मक या धार्मिक विमर्श से मुक्त कर व्यावहारिक आर्थिक-रणनीतिक साझेदारी में बदले।

कुल मिलाकर, यह यात्रा संबंधों की मरम्मत से आगे बढ़कर उन्हें पुनर्परिभाषित करने का प्रयास प्रतीत होती है। यदि दोनों देश इस गति को बनाए रखते हैं, तो भारत-मलेशिया साझेदारी आने वाले वर्षों में दक्षिण-पूर्व एशिया की कूटनीतिक धुरी को प्रभावित कर सकती है, और पाकिस्तान सहित पूरे क्षेत्रीय समीकरण को नए सिरे से संतुलित कर सकती है।