अजय कुमार बियानी
“ये कश्मीर नहीं… इंदौर है..!”
एक समय था जब सड़कों पर उतरने का अर्थ था—जनता की आवाज़ बुलंद होना। आटा, शक्कर या दाल के दाम चवन्नी-दो रुपये भी बढ़ते तो जमीनी नेता तुरंत सक्रिय हो जाते थे। नारे लगते थे, कविताएँ और व्यंग्य गूंजते थे, और सत्ता को आईना दिखाने की परंपरा जीवंत रहती थी। विरोध में तीखापन जरूर होता था, पर संयम भी साथ चलता था। पुलिस को भी भरोसा रहता था कि प्रदर्शन उग्र नहीं होंगे और शहर की शांति बनी रहेगी।
लेकिन आज तस्वीर बदलती दिख रही है। महंगाई लगातार लोगों की जेब पर बोझ बढ़ा रही है, मगर उस स्तर का जनाक्रोश सड़कों पर कम दिखाई देता है। इसके विपरीत, कई जगह आंदोलनों का स्वरूप जनहित से अधिक शक्ति प्रदर्शन जैसा प्रतीत होने लगा है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारे विरोध की संस्कृति अपनी मूल भावना से भटक रही है?
हाल में शहर में प्रदर्शन के दौरान हुई पत्थरबाजी ने इसी चिंता को और गहरा कर दिया। सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएँ आईं और लोगों ने व्यथा के साथ कहा—“ये इंदौर है… कश्मीर नहीं।” यह वाक्य केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि शहर की उस पहचान की याद दिलाता है जिस पर यहाँ के नागरिक गर्व करते रहे हैं।
इंदौर लंबे समय तक अपनी जीवंत सामाजिक संस्कृति, व्यापारिक ऊर्जा और संवाद की परंपरा के लिए जाना जाता रहा है। यह वही शहर है जिसने राजनीति में कई स्वस्थ उदाहरण दिए, आर्थिक प्रगति के नए मानक स्थापित किए और पत्रकारिता की दुनिया को अनेक सशक्त नाम दिए। यहाँ की मिट्टी में बहस है, असहमति है, लेकिन साथ ही एक संतुलन भी रहा है—विरोध हो, पर वैमनस्य नहीं।
यही कारण है कि जब किसी आंदोलन के नाम पर हिंसक दृश्य सामने आते हैं, तो चिंता स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। लोकतंत्र में विरोध अनिवार्य है—बल्कि स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान ही यह है कि जनता अपनी असहमति खुलकर दर्ज कर सके। लेकिन विरोध और हिंसा के बीच की रेखा जब धुंधली होने लगे, तो आत्ममंथन आवश्यक हो जाता है।
वर्तमान समय की एक विडंबना यह भी है कि कई बार आंदोलनों की दिशा और प्रभाव पहले से तय प्रतीत होते हैं। जनहित की वास्तविक पीड़ा पीछे छूट जाती है और राजनीतिक लाभ-हानि की गणना आगे आ जाती है। किसकी छवि बनेगी, किसकी बिगड़ेगी—इस पर अधिक चर्चा होती है, जबकि आम नागरिक की समस्या हाशिये पर चली जाती है। यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए शुभ संकेत नहीं मानी जा सकती।
शहर ने हाल के वर्षों में कई पीड़ादायक घटनाएँ भी देखी हैं—ऐसी घटनाएँ जिन पर व्यापक संवेदनशीलता और सामूहिक जवाबदेही अपेक्षित थी। लेकिन जब गंभीर मुद्दों पर सामाजिक ऊर्जा कम दिखे और शक्ति प्रदर्शन के क्षणों में उग्रता अधिक नजर आए, तो यह असंतुलन चिंता पैदा करता है। जनता के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि हमारी प्राथमिकताएँ क्या हो गई हैं?
सोशल मीडिया के दौर ने प्रतिक्रियाओं को तत्काल और तीखा बना दिया है। कुछ मिनटों में वीडियो वायरल होते हैं, बयान आते हैं और आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो जाता है। आशंका यही रहती है कि आने वाले दिनों में भी वही पारंपरिक राजनीतिक बयानबाजी दोहराई जाएगी—एक पक्ष दूसरे पर उंगली उठाएगा, दूसरा पलटवार करेगा। कुछ दिन तक “बयानों की पत्थरबाजी” चलेगी और फिर शहर अपनी रोजमर्रा की रफ्तार में लौट जाएगा। लेकिन मूल सवाल वहीं रह जाएगा—क्या हमने कुछ सीखा?
यह भी सच है कि हर प्रदर्शन उग्र नहीं होता और हर प्रदर्शनकारी हिंसा का समर्थक नहीं होता। शहर की बड़ी आबादी आज भी शांतिपूर्ण और जिम्मेदार नागरिकता में विश्वास रखती है। इसलिए किसी एक घटना से पूरे सामाजिक ताने-बाने पर प्रश्नचिह्न लगाना उचित नहीं होगा। फिर भी, चेतावनी के संकेतों को अनदेखा करना भी समझदारी नहीं है।
आवश्यकता इस बात की है कि आंदोलन की संस्कृति को पुनः उसकी मूल भावना से जोड़ा जाए—जहाँ मुद्दा केंद्र में हो, न कि मांसपेशियों का प्रदर्शन; जहाँ तर्क आगे हों, पत्थर नहीं; और जहाँ असहमति लोकतांत्रिक मर्यादा के भीतर व्यक्त की जाए। प्रशासन, राजनीतिक नेतृत्व और नागरिक समाज—तीनों की साझा जिम्मेदारी है कि विरोध की परंपरा को रचनात्मक दिशा दी जाए।
साथ ही नागरिकों को भी यह समझना होगा कि शहर की छवि केवल सरकारों से नहीं बनती, बल्कि हर निवासी के आचरण से बनती है। इंदौर की पहचान स्वच्छता, सौहार्द और सक्रिय नागरिकता से बनी है। यदि सड़कों पर असहिष्णुता और आक्रोश की छवि उभरने लगे, तो इसका असर केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहता—यह निवेश, पर्यटन और सामाजिक विश्वास—तीनों पर पड़ता है।
समय आ गया है कि हम रुककर सोचें। विरोध जरूरी है, आवाज उठाना जरूरी है, लेकिन किस तरीके से—यह उससे भी ज्यादा जरूरी है। यदि हम अपनी असहमति को संयम और संवाद के साथ व्यक्त करें, तो लोकतंत्र मजबूत होता है। लेकिन यदि आंदोलन केवल शक्ति प्रदर्शन या टकराव का माध्यम बन जाए, तो नुकसान अंततः समाज को ही होता है।
इंदौर की आत्मा अभी भी जीवंत है, उसका विवेक भी जागृत है। जरूरत केवल इतनी है कि हम उस परंपरा को याद रखें जिसने इस शहर को अलग पहचान दी—संवाद की, संस्कार की और सभ्य असहमति की।
क्योंकि सच यही है—
यह कश्मीर नहीं… इंदौर है।





