सदाबहार देव आनंद: ज़िंदगी का साथ निभाने वाले एक ‘चिरयुवा’ दर्शन की दास्तां

The evergreen Dev Anand: The story of an ever-young Darshan who stood by his side throughout his life

राजदीप जोशी

भारतीय सिनेमा के आकाश पर कई सितारे चमके और ओझल हो गए, लेकिन एक शख्सियत ऐसी थी जिसने ‘वक्त’ की बेड़ियों को तोड़कर खुद को ‘चिरयुवा’ बनाए रखा—वे थे देव आनंद। हाल ही में लेखक, कवि और फिल्म समीक्षक दिलीप कुमार पाठक की नई पुस्तक “मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया” प्रकाशित हुई है, जो देव साहब के इसी अदम्य साहस और जिंदादिली को समर्पित है। ‘जन सरोकार’ पत्रिका के संपादन से जुड़े दिलीप जी ने इस पुस्तक के शीर्षक को पूरी तरह सार्थक करते हुए इसे देव साहब के चाहने वालों के लिए एक अनमोल सौगात बना दिया है। यह किताब केवल एक अभिनेता की जीवनी नहीं, बल्कि उनके विचारों, आदर्शों और उन अनकहे किस्सों का संग्रह है, जिनसे आम दर्शक अब तक अपरिचित रहे हैं।

लेखक ने बहुत ही खूबसूरती से देव साहब के वैचारिक धरातल को टटोलते हुए बताया है कि उनके व्यक्तित्व की नींव उनके पिता के गांधीवादी संस्कारों में छिपी थी। देव साहब स्वयं महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर के दर्शन से गहरे प्रभावित थे। यही कारण था कि वे ताउम्र एक ‘पॉजिटिव’ और सजग प्रहरी की तरह समाज और राजनीति पर नजर रखते थे। वे गांधी और नेहरू के अनन्य भक्त थे, तो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के परम मित्र भी। राजनीति में वैचारिक मतभेद होने के बावजूद वे इंदिरा गांधी के ‘दुश्मन’ नहीं थे और सोनिया गांधी के प्रति भी उनके मन में गहरा सम्मान था। लेखक ने उनकी विश्वव्यापी सोच का जिक्र करते हुए महान चार्ली चैप्लिन से उनकी ऐतिहासिक मुलाकात का भी सजीव वर्णन किया है, जिसने उनके अभिनय और जीवन के प्रति नजरिए को एक नई ऊंचाई दी।

किताब देव साहब के निजी जीवन के उतार-चढ़ाव और उनकी रूहानी प्रेम कहानियों को भी पूरी संजीदगी से बयां करती है। सुरैया के साथ उनका वह अधूरा लेकिन अमर प्रेम, जिसने एक पूरे दौर को भावुक कर दिया था, और पत्नी कल्पना कार्तिक के साथ उनके वैवाहिक जीवन के उतार-चढ़ाव को दिलीप जी ने बहुत ही शालीनता से पिरोया है। इसके साथ ही, सिनेमाई त्रिकोणीय मित्रता—राज कपूर, दिलीप कुमार और देव आनंद—के उस सुनहरे दौर का भी जिक्र है, जहाँ प्रतिस्पर्धा तो थी लेकिन ईर्ष्या का कोई स्थान नहीं था। इन दिग्गजों के बीच की आत्मीयता आज के दौर के कलाकारों के लिए एक मिसाल है।

संगीत देव साहब की फिल्मों की जान रहा है। लेखक ने मोहम्मद रफ़ी साहब के साथ उनकी जादुई ट्यूनिंग और एस.डी. बर्मन (बर्मन दादा) के साथ उनके ‘अनंत साथ’ पर विशेष अध्याय रखे हैं। उनके भाई विजय (गोल्डी) आनंद को लेखक ने देव साहब की सफलता की ‘मास्टर चाभी’ बताया है। इस पुस्तक में उनकी कल्ट फिल्मों जैसे ‘गाइड’, ‘ज्वेल थीफ’, ‘हरे रामा हरे कृष्णा’, ‘जॉनी मेरा नाम’, ‘सीआईडी’, ‘पेइंग गेस्ट’ और ‘हम दोनों’ से जुड़े ऐसे रोचक किस्से शामिल हैं जो पाठकों को रोमांचित कर देते हैं। साथ ही, ‘मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया’, ‘अभी ना जाओ छोड़ कर’, ‘गाता रहे मेरा दिल’ और ‘फूलों के रंग से’ जैसे कालजयी गीतों के सृजन की कहानियाँ भी इसमें शामिल हैं।

दिलीप कुमार पाठक जी की लेखन शैली इतनी सरल और प्रवाहपूर्ण है कि यह किताब एक ‘व्यक्तिगत डायरी’ की तरह महसूस होती है। देव साहब का ‘मौत’ को लेकर जो दर्शन था—कि अंत भी एक नई शुरुआत है—उसे लेखक ने बहुत ही मर्मस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत किया है। हालांकि, देव साहब और किशोर दा की जुगलबंदी पर एक और विस्तृत अध्याय की कमी खलती है, फिर भी यह संक्षिप्त पुस्तक देव साहब के विराट व्यक्तित्व को पूरी तरह से पकड़ कर रखती है। यदि आप उस दौर की खुशबू और देव साहब की ‘सादगी भरे स्टाइल’ को फिर से जीना चाहते हैं, तो यह किताब आपके संग्रह में अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। देव साहब के चाहने वालों को यह पुस्तक न केवल पसंद आएगी, बल्कि उन्हें अपने प्रिय नायक के और करीब ले जाएगी।

पुस्तक का नाम: मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया
लेखक: दिलीप कुमार पाठक
प्रकाशक: शब्दगाथा अविरल प्रकाशन मुंबई
कीमत: 290
उपलब्धता: (अमेज़न/प्रमुख बुकस्टोर)