कन्हैया झा
पुस्तक: सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति
लेखक: योगेश कुमार गोयल
प्रकाशक: मीडिया केयर नेटवर्क, नई दिल्ली-110043.
मूल्य : 695 रुपये
पृष्ठ संख्या: 300
वर्ष 1947 में जब हमारा देश ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से मुक्त हुआ था, तब नए राष्ट्र के लिए सुरक्षा का प्रश्न अत्यंत गंभीर और जटिल था। स्वतंत्रता के साथ ही देश विभाजन का दंश भी झेल रहा था, जिससे सीमाओं और सुरक्षा संसाधनों की बुनियादी समस्या सामने आई। उस दौर में भारत ने बेहद चुनौतीपूर्ण रक्षा परिस्थितियों का सामना किया। वस्तुतः ब्रिटिश काल में भारतीय सेना सीमित भूमिका निभा रही थी और तकनीकी दृष्टि से पिछड़ी हुई भी थी।
ऐसे में भारत की सैन्य शक्ति को नया आकार देने में वैज्ञानिक संस्थानों की निर्णायक भूमिका रही। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने भारत की रक्षा नीतियों को वैज्ञानिक दृष्टि से संपुष्ट किया है। आज जब हम ‘ब्रह्मोस’ जैसी विश्व की सबसे तीव्र सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, ‘आकाश’ जैसी आधुनिक वायु रक्षा प्रणाली, ‘तेजस’ जैसे हल्के एवं सक्षम लड़ाकू विमान और ‘अग्नि’ जैसी दूर तक मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों की बात करते हैं तो यह केवल सामरिक अस्त्रों की नहीं बल्कि भारत की सामूहिक वैज्ञानिक चेतना एवं आत्मबल की विजयगाथा है।
ऐसे जटिल ऐतिहासिक संदर्भ में लिखी गई पुस्तक “सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति” भारतीय रक्षा विकास की उस लंबी यात्रा को सजीव रूप में प्रस्तुत करती है, जो संघर्ष, संकल्प और वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता की कहानी है। लेखक योगेश कुमार गोयल ने अपनी इस पुस्तक में देश में डीआरडीओ के गठन के बाद से रक्षा क्षेत्र में हुए विकास को व्यापक रूप से दर्शाने का प्रयास किया है। पुस्तक का मूल स्वर यह स्पष्ट करता है कि भारत की सैन्य शक्ति का विकास केवल हथियारों की संख्या बढ़ाने का परिणाम नहीं है बल्कि यह वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी नवाचार और रणनीतिक सोच के संयोजन से संभव हुआ है।
पुस्तक 18 अध्यायों में है, जिसमें भारतीय वायुसेना, थलसेना और नौसेना समेत प्रमुख लड़ाकू विमानों के अलावा भारत की मिसाइल शक्ति, प्रमुख एयर डिफेंस सिस्टम सहित प्रमुख युद्धपोत और पनडुब्बियों को शामिल किया गया है। साथ ही इसमें बढ़ती ड्रोन शक्ति, अन्य हथियार प्रणालियों एवं उपग्रह शक्ति को भी दर्शाया है। लेखन शैली सरल, प्रवाहपूर्ण और तथ्यात्मक है, जो पाठक को विषय की गहराई तक ले जाती है। लेखक ने जटिल तकनीकी विषयों को भी सहज भाषा में प्रस्तुत किया है, जिससे यह पुस्तक सामान्य पाठकों से लेकर रक्षा अध्ययन में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों तक के लिए उपयोगी बन जाती है। यह पुस्तक उन युवाओं के लिए प्रेरणा बन सकती है, जो देश के विज्ञान, रक्षा और सामरिक भविष्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का स्वप्न देखते हैं।
(कन्हैया झा दैनिक जागरण के वरिष्ठ उपसंपादक हैं)





