अजय कुमार
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने सामाजिक न्याय की पूरी बहस को फिर से गरमा दिया है। अदालत ने साफ कहा कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी और धर्म में जाने वाला व्यक्ति अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत खो देता है। यह फैसला आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के पुराने आदेश को बरकरार रखते हुए आया, जिसमें गुंटूर जिले के चिंतादा आनंद नाम के एक पादरी की याचिका खारिज की गई थी। चिंतादा आनंद ने कुछ लोगों पर जातिगत गाली-गलौज और हमले का आरोप लगाते हुए एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून के तहत मुकदमा दर्ज कराया था, लेकिन आरोपियों ने कहा कि वह तो दशक से ज्यादा समय से ईसाई धर्म अपनाकर पादरी का काम कर रहे हैं, इसलिए उन्हें अब वह संरक्षण नहीं मिल सकता। हाईकोर्ट ने इस दलील को माना और अब सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने भी वही रुख अपनाया। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने कहा कि अपीलकर्ता के ईसाई बनने और सक्रिय रूप से प्रार्थनाएं कराने के सबूत साफ हैं, इसलिए एससी का दर्जा खत्म माना जाएगा।यह फैसला कोई नया कानून नहीं बनाता, बल्कि 1950 के संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश की धारा 3 को दोहराता है। उस आदेश में लिखा है कि अनुसूचित जाति का दर्जा सिर्फ उन लोगों को मिलता है जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म मानते हैं। कोई अन्य धर्म अपनाने पर जन्म से मिला यह हक स्वतः खत्म हो जाता है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि यह प्रतिबंध पूर्ण है, इसमें कोई छूट या अपवाद नहीं। चाहे व्यक्ति का जन्म किसी भी दलित परिवार में हुआ हो, अगर वह ईसाई या मुस्लिम बन जाता है तो वह अब अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं रहता। ईसाई धर्म में जाति की कोई व्यवस्था नहीं मानी जाती, इसलिए जातिगत अत्याचार का कानून भी उस पर लागू नहीं होता। चिंतादा आनंद गांव में घर-घर रविवार की प्रार्थनाएं कराते थे, पादरी के रूप में काम करते थे। कोर्ट ने इन तथ्यों को देखते हुए कहा कि घटना के समय वह ईसाई धर्म का पालन कर रहे थे, इसलिए एससी-एसटी एक्ट के तहत शिकायत का आधार ही नहीं बनता।
इस फैसले की गहराई समझने के लिए हमें संविधान की मूल भावना को याद करना होगा। डॉक्टर भीमराव आंबेडकर और संविधान सभा ने अनुसूचित जाति को विशेष दर्जा इसलिए दिया क्योंकि हिंदू समाज में सदियों से छुआछूत और अस्पृश्यता का भयानक अन्याय चला था। यह दर्जा ऐतिहासिक दमन की याद दिलाता है, न कि किसी व्यक्तिगत पसंद का। 1950 का आदेश शुरू में सिर्फ हिंदुओं के लिए था। बाद में सिखों को 1956 में और बौद्धों को 1990 में शामिल किया गया क्योंकि इन धर्मों में भी जातीय संरचना बनी रही। लेकिन इस्लाम और ईसाई धर्म खुद को जातिविहीन बताते हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई इनमें चला जाता है तो ऐतिहासिक पीड़ा का आधार भी खत्म हो जाता है। इसलिए आरक्षण, सरकारी नौकरियां, शिक्षा में सीटें, छात्रवृत्तियां और कानूनी सुरक्षा जैसे लाभ अब नहीं मिल सकते।फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या इससे धर्मांतरण रुकेगा? अनुच्छेद 25 के तहत धर्म बदलना हर भारतीय का मौलिक अधिकार है। कोई भी व्यक्ति अपनी आस्था बदल सकता है, प्रचार कर सकता है। लेकिन क्या यह अधिकार राज्य द्वारा दिए गए आरक्षण जैसे लाभों पर भी लागू होता है? सुप्रीम कोर्ट ने जवाब दिया नहीं। लाभ उस धर्म में झेली गई पीड़ा से जुड़े हैं, न कि व्यक्ति की नई आस्था से। अगर कोई दलित ईसाई बनकर भी पुराना एससी सर्टिफिकेट दिखाकर फायदा उठाता रहे तो असली हिंदू दलितों का हक छिन जाएगा। कोटा सीमित है, संसाधन सीमित हैं। नई आबादी जुड़ने से मौजूदा लाभार्थियों का हिस्सा कम हो जाएगा। राजनीति में भी असर पड़ेगा। आरक्षित सीटों पर उम्मीदवारों का चरित्र बदल सकता है। जो लोग धर्म बदलकर लाभ लेते रहे, उनके लिए अब रास्ता बंद हो गया।
लेकिन यह मुद्दा इतना सरल भी नहीं है। लंबे समय से एक बड़ा विवाद चल रहा है क्या ईसाई और मुस्लिम दलितों को भी अनुसूचित जाति का दर्जा देना चाहिए? 2007 में रंगनाथ मिश्रा आयोग ने सिफारिश की थी कि सभी धर्मों के दलितों को आरक्षण मिले क्योंकि सामाजिक पिछड़ापन धर्म बदलने से नहीं मिटता। लेकिन केंद्र सरकार ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया। सरकार का कहना था कि आयोग ने बिना जमीनी अध्ययन के सिफारिश कर दी। अब पूर्व मुख्य न्यायाधीश के जी बालकृष्णन की अध्यक्षता में नया आयोग इस पूरे मसले पर गहराई से विचार कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट में भी कई याचिकाएं लंबित हैं। इस फैसले ने उस बहस को और तेज कर दिया है। फिलहाल कोर्ट ने कहा कि बदलाव अगर करना है तो संसद करे, अदालत नहीं। 1950 का आदेश अभी पूरी तरह लागू है।सामाजिक रूप से देखें तो धर्मांतरण अक्सर बेहतर जीवन की तलाश में होता है। कई दलित परिवार सोचते हैं कि हिंदू समाज में मिलने वाला अपमान ईसाई या मुस्लिम बनकर कम हो जाएगा। लेकिन हकीकत में कई जगहों पर जाति की छाया उन नए धर्मों में भी दिखती है। फिर भी कानून साफ है। अगर कोई व्यक्ति वापस हिंदू हो जाता है और उसका समुदाय उसे स्वीकार कर लेता है तो दर्जा बहाल हो सकता है। लेकिन एक साथ दो धर्मों का पालन करके एससी का दावा नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इस मामले में सबूतों पर जोर दिया। अगर कोई पादरी का काम कर रहा है, प्रार्थनाएं आयोजित कर रहा है तो वह ईसाई ही माना जाएगा। चिंतादा आनंद के मामले में यही हुआ।
आरक्षण का मकसद सामाजिक समानता लाना है, न कि धर्म बदलने को बढ़ावा देना। अगर बदलने से भी लाभ मिलते रहें तो मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा। सरकारी नौकरियों, विधानसभाओं और लोकसभा में सीटें उन लोगों के लिए आरक्षित हैं जिन्होंने हिंदू समाज में दमन झेला। ईसाई या मुस्लिम बनकर वे अब उस दमन की श्रेणी से बाहर हो जाते हैं। हालांकि वे ओबीसी या आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग में शामिल हो सकते हैं अगर उनका समुदाय सूची में है, लेकिन एससी का विशेष दर्जा नहीं मिलेगा। यह फैसला उन लोगों के लिए भी चेतावनी है जो धर्मांतरण को सिर्फ फायदे का साधन बनाते हैं। सच्चा परिवर्तन आस्था से होना चाहिए, आरक्षण के लालच से नहीं।देश की एकता के नजरिए से भी यह फैसला अहम है। भारत विविधताओं का देश है, लेकिन संविधान ने सामाजिक न्याय को कुछ धर्मों तक सीमित रखा है। अगर हर धर्म को एससी दर्जा दे दिया जाए तो पूरी आरक्षण व्यवस्था चरमरा सकती है। कोटा बढ़ाने से पहले आर्थिक और सामाजिक सर्वेक्षण जरूरी है। सरकार ने यही रुख अपनाया है। नया आयोग इसी दिशा में काम कर रहा है। फैसले से दलित समाज में दो धड़ों में बंटाव हो सकता है एक वे जो हिंदू रहकर संघर्ष कर रहे हैं, दूसरे वे जो धर्म बदल चुके हैं। लेकिन कोर्ट ने कहा कि कानून सबके लिए बराबर है। कोई भी व्यक्ति दो श्रेणियों का लाभ एक साथ नहीं ले सकता।
इस फैसले ने एक बार फिर साबित किया कि संविधान सर्वोच्च है। अदालत न भावनाओं से प्रभावित होती है, न राजनीतिक दबाव से। उसने 1950 के आदेश को दोहराया और कहा कि यह पूर्ण प्रतिबंध है। अब अगर बदलाव करना है तो संसद करे। चिंतादा आनंद की याचिका खारिज होने से उनका मुकदमा भी प्रभावित होगा। लेकिन इससे बड़े सवाल पर बहस शुरू हो गई है क्या सामाजिक पिछड़ापन धर्म से ऊपर है? जवाब अभी लंबित है, लेकिन फिलहाल संविधान की मूल भावना जीत गई।भारत जैसे देश में सामाजिक न्याय की राह हमेशा कठिन रही है। एक तरफ आरक्षण जरूरी है पिछड़ेपन को मिटाने के लिए, दूसरी तरफ इसके दुरुपयोग को रोकना भी उतना ही जरूरी। इस फैसले ने दुरुपयोग की एक बड़ी खिड़की बंद कर दी। अब जरूरत है कि सरकार और समाज मिलकर उन दलितों की मदद करें जो बिना धर्म बदले संघर्ष कर रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की योजनाएं और मजबूत हों। जातिगत भेदभाव पर सख्ती बढ़े। तभी सच्चा बदलाव आएगा।सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सिर्फ कानूनी नहीं, नैतिक भी है। यह कहता है कि संविधान की रक्षा करो, उसकी भावना को मत तोड़ो। धर्म परिवर्तन व्यक्तिगत आस्था का मामला है, लेकिन राज्य के लाभ संवैधानिक सीमाओं में बंधे रहेंगे। यह फैसला देश को याद दिलाता है कि न्याय की राह पर चलते हुए संतुलन बनाए रखना होगा न तो धर्म की आड़ में लाभ लूटने दो, न ही असली दलितों का हक किसी को छीनने दो। सामाजिक न्याय की यह लड़ाई अभी जारी रहेगी, लेकिन संविधान की दीवार मजबूत बनी रहेगी।





